kharab-sadak
उरई। प्रमुख राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं द्वारा भले ही विकास के नाम पर विधानसभा चुनाव लड़ा जा रहा हो पर स्थानीय स्तर पर विकास चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहा है। यहां पर चुनाव लड रहे उम्मीदवार केवल जातीय समीकरण फिट करके चुनाव मैदान में कूदे हैं और इसी को आधार बनाकर वह चुनाव जीतने का प्रयास भी कर रहे हैं जबकि जिले का सबसे बड़ा मुद्दा खराब सड़कों का है। जिले की लगभग सभी प्रमुख सड़केें इन दिनों दुदर्शा का शिकार हैं और इन पर वाहन चलाना तो दूर पैदल चलना भी खतरों से खाली नहीं है। सबसे ज्यादा हालत तो ग्रामीण क्षेत्र के सडकों की खराब है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग इन सड़कों से कैसे गुजरते हैं यह दर्द तो शायद वही बता सकते हैं पर इसके बावजूद भी राजनीतिक दल जिले की खराब सड़कों को मुद्दा नहीं बना रहे हैं जबकि जनता की सबसे बड़ समस्या यही है। जिले की सबसे खराब सड़क कोंच-उरई मार्ग की बात करें तो पांच साल में सपा सरकार केवल इस मार्ग पर मिट्टी डालने का ही काम कर पाई। इसके अलावा और भी कई मार्गों पर काम शुरू किया गया पर चुनाव के ठीक पहले जिससे इन मार्गों पर निर्माण अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। सपा, बसपा से लेकर भाजपा व कांग्रेस तक के शीर्ष नेता विधानसभा का चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ रहे हैं पर स्थानीय स्तर पर विकास मुद्दा नहीं बन पा रहा है। जिले में इन दिनों सबसे बड़ा मुद्दा खराब सड़कों का है। जिले की सबसे खराब सड़क कोंच-उरई मार्ग पिछले विधानसभा चुनाव में भी चुनावी मुददा था। 2012 में सूबे में सपा की सरकार बनी पर इस मार्ग की दिन नहीं बहुर सके। चार साल तक इस मार्ग को लेकर केवल राजनीति ही होती रही। चुनाव के कुछ समय पहले सरकार ने इस मार्ग के निर्माण के लिए बजट पास किया तो समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं में सड़क निर्माण के लिए बजट पास कराने का श्रेय लेने की होड़ सी मच गई पर हकीकत के धरातल पर देखें तो पांच वर्ष के सपा कार्यकाल में इस मार्ग पर केवल मिट्टी ही डाली जा सकी है। अभी सड़क बनाने का काम भी शुरू नहीं हो पाया है। इसके अलावा जिले के ग्रामीण क्षेत्रों की और भी कई सड़केें हैं जो लोगों के लिए जी का जंजाल बनी हुई हैं। कैलिया में सींगपुरा, सलैया, सीतपुरा, ऊमरी-कुठौंद मार्ग की हालत यह है कि यहां पैदल चलना भी दूभर है। पिरौना से बिरगुवां, बसोव होते हुए चांदनी व कोंच जाने वाली सड़क व हरदोई से धंतौली, धनौरा मार्ग पर सड़क का नामोनिशान तक नहीं बचा है। एट-कोंच मार्ग की हालत भी कुछ ऐसी ही है। इन समस्याओं से लोगों को दो-चार होना ही पड़ता है। इसके बावजूद भी चुनावी मौसम में खराब सड़के मुद्दा नहीं बन पा रही हैं। प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रत्याशी केवल जातीय समीकरण फिट करके चुनाव जीतने की जुगाड़ में लगे हैं। इसी को आधार बनाकर हार-जीत का आंकलन भी किया जा रहा है पर जिले के मतदाता जाति धर्म पर वोट देते हैं या फिर विकास के मुद्दे से पीछे हटने वाले प्रत्याशियों को आईना दिखाते हैं? यह आने वाले समय में ही पता चल पाएगा।
इसेट… खनन माफियाओं ने नेशनल हाईवे को भी नहीं बख्शा उरई। सड़कों की दुदर्शा करने में खनन माफिया भी पीछे नहीं रहे हैं। यहां तक कि इन माफियाओं ने नेशनल हाईवे तक को नहीं बख्शा है। हाईवे की हालत यह है कि यहां पर भी कई फीट गहरे गड्ढे हैं जिसके चलते हाईवे पर आए दिन हादसे होते रहते हैं।

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