कांग्रेस के साथ गठबंधन पर अड़े रहकर अखिलेश ने जो कामयाबी पाई है उससे उनकी राजनीतिक सूझबूझ का सिक्का जम गया है। परिवार के तमाम बुजुर्ग यहां तक कि सपा के संस्थापक सुप्रीमो और उनके पिता मुलायम सिंह भी सौ से ज्यादा सीटें देकर कांग्रेस से गठबंधन के खिलाफ थे और आज तक उन्होंने इस पर अखिलेश को कोसना बंद नहीं किया है। लेकिन इस गठबंधन की बदौलत मुसलमानों को ज्यादा टिकट देकर उनका एकमुश्त समर्थन हासिल करने का मायावती का मंसूबा जिस तरह से ताश के पत्तों की मानिंद बिखरा नजर आने लगा है उससे मीडिया के तमाम सर्वे में सपा बसपा से बहुत आगे दिखाई देने लगी है।
कांग्रेस ऐसा वृहद राजनीतिक प्लेटफार्म रहा है जिस पर परस्पर विरोधी विचारधारा के नेता साथ खड़े होते रहे हैं। कांग्रेस में एक ओर धर्म-निरपेक्षता के लिए मजबूती से प्रतिबद्ध नेताओं की कतारें रहीं दूसरी ओर दक्षिणपंथी और साम्प्रदायिक नेताओं को भी इसके मंच पर प्रभावी स्थान मिलता रहा। इसलिए मलयाना कांड और अयोध्या में विवादित स्थल का ताला साजिशन खुलवाने से लेकर विवादित ढांचा ढहवाने में मूक सहमति देने जैसे दाग कांग्रेस के दामन पर हैं, जिसकी कचोट मुसलमानों को हमेशा सालती रहती है।
इसके बावजूद वे कांग्रेस को अपने लिए सबसे भरोसेमंद पार्टी मानते हैं तो उसकी ठोस वजहें हैं। सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम जनाधार पर एकक्षत्र कब्जे के लिए कितने ही मर्यादाहीन बोल समय-समय बोले लेकिन मुसलमानों का कांग्रेस जैसा विश्वास उन पर कभी नहीं जम सका। बाबरी मस्जिद को गिराये जाने के बाद राव सरकार को बचाने की भूमिका मुलायम सिंह ने कितने भी पोसीदा तरीके से निभाई हो लेकिन मुसलमानों की आंखों से उनका रोल ओझल नहीं रह पाया। अपने पौत्र तेजप्रताप उर्फ तेजू की शादी में पीएम नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत सम्बंधों के नाम पर बुलाकर मुलायम सिंह पूरे परिवार के साथ उनके कदमों में बिछ गये थे। यह रवैया मुसलमानों को इतना नागवार गुजरा कि आज तक मुलायम सिंह को लेकर वे सावधानी का रुख अख्तियार करना जरूरी समझते हैं।
मुलायम सिंह भी मुसलमानों के इस रुख को भांपने से नहीं चूके। इसलिए यूपी में नये चुनाव की दस्तक होते ही उन्होंने जेहादी भाषा बोलनी शुरू कर दी थी। कारसेवकों पर गोली चलवाने का उनके मुंह से बेमौके जिक्र इसी रणनीति का हिस्सा था। उन्हें उम्मीद थी कि भड़काऊ शैली से वे 90 के दशक की तरह मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित कर सकेंगे लेकिन तबसे प्रदेश के हर दरिया में न जाने कितना पानी बह चुका है मुसलमान जज्बाती होकर ठगे जाने की गलती करने को अब तैयार नहीं हैं। जिसकी वजह से उन्होंने मुलायम सिंह की इस क्रांतिकारिता को कोई भाव नहीं दिया।
हालत यह थी कि गत वर्ष के दिसम्बर के महीने तक प्रदेश के सारे मुसलमान बसपा की झोली में गिरते नजर आ रहे थे और सपा को हंड्रेड के उस पार पहुंचना भी दुश्वार लग रहा था। लेकिन कांग्रेस से गठबंधन करके अखिलेश ने प्रदेश का सियासी मंजर पलट डाला। मायावती का मुसलमानों को सबसे ज्यादा टिकट देने का हथकंडा इस उथल-पुथल के बाद बेकाम हो गया। पूरे प्रदेश में हर सीट पर मुसलमानों की पहली प्राथमिकता कांग्रेस-सपा गठबंधन के पक्ष में दिख रही है। इसके चलते मायावती की बौखलाहट चरम सीमा पर है। पूर्वांचल के अंसारी बंधुओं को इसी बौखलाहट में उन्होंने इतना महिमामंडित कर डाला कि वे कोर्ट के निशाने पर चढ़ गई हैं। फिर भी मुसलमान बसपा पर रीझने से इंकार कर रहे हैं। ऐसे में मुसलमानों को साम्प्रदायिक आधार पर वोटिंग करने वाली कम्युनिटी ठहराने वाले सयाने अपना मुंह छुपाने को मजबूर हैं। यह साबित हो गया कि मुसलमान पॉलीटिकल स्टैंड के आधार पर वोट करते हैं, साम्प्रदायिक नजरिये से नहीं।
बसपा द्वारा सपा-कांग्रेस गठबंधन के असर की काट के लिए मौलानाओं के प्रायोजित फतवे जारी कराये जा रहे हैं। टिकट कटने से चिढ़े सपा नेता पसमांदा मुस्लिम समाज के ठेकेदार बनकर बसपा के पक्ष में अपील करने में लगे हैं लेकिन मुस्लिम जनभावनाओं पर इसका कोई असर नहीं है। गठबंधन ने सपा का तो फायदा कराया ही है, मरी हुई पार्टी करार दी जा चुकी कांग्रेस भी अपनी हर सीट पर बदले समीकरणों की वजह से मुख्य मुकाबले में नजर आ रही है।
मायावती पर मुसलमानों का विश्वास न जम पाने की वजह तलाशें तो साफ दिखता है कि मुसलमानों की निगाह में मायावती का कोई राजनीतिक नजरिया नहीं है। वे ब्यूरोक्रेटिक एक्सरसाइज की तर्ज पर सुशासन को परिभाषित कर आत्ममुग्ध रहती हैं। जिसके चलते राजनीतिक मोर्चे पर बड़ी भूलें उनकी नियति बन चुकी हैं। गुजरात में नरेंद्र मोदी के लिए उनके प्रचार पर जाने से नरेंद्र मोदी का तो कोई भला नहीं हुआ लेकिन मायावती ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। इसके पहले बीजेपी के सहयोग से सरकार चलाने के उनके कई उदाहरण हैं जिनसे उनकी राजनीतिक साख रसातल में चली गई थी। इसलिए मुसलमान सपा-कांग्रेस गठबंधन से तुलना होने पर उन्हें खारिज कर देने योग्य समझ रहे हैं।
आज हालत यह है कि हर सर्वे समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन को पौने दो सौ से ज्यादा सीटों पर पहुंचा रहा है। कई सर्वे भले ही भाजपा को पहले स्थान पर बता रहे हैं लेकिन गठबंधन से भाजपा की बढ़त को कुछ सीटों से ज्यादा नहीं बता पा रहे हैं। यह हालत तब है जब प्रियंका और डिम्पल की एक भी रैली प्रदेश में नहीं हुई है। अगर दोनों की कुछ ही संयुक्त रैलियां हो गईं तो पूरा प्रदेश उनके प्रभाव से आप्लावित हो सकता है। जाहिर है कि इसके बाद गठबंधन और भाजपा के बीच मामूली फासला रह जाएगा और गठबंधन कब बहुमत के जादुई आंकड़े से आगे निकल जाये, कहना मुश्किल होगा।
गठबंधन और ज्यादा प्रभावी हो सकता था बशर्ते लालू यादव की बात मानने की मजबूरी अखिलेश को न होती। उन्होंने नीतीश कुमार के साथ गठबंधन को निजी स्तर की बातचीत में रोक दिया। उनकी यह बात मानना अखिलेश की मजबूरी थी। सपा और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे पर अभी भी कई जगह द्वंद्व है लेकिन संयुक्त जनसभाओं में राहुल और अखिलेश ने जो आपसी ट्यूनिंग दिखाई है उससे लगता है कि गठबंधन में कोई समस्या अब आने वाली नहीं है।







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