कोंच-उरई । देश अपनी तरक्की के कितने भी दावे कर ले और खुद ही अपनी पीठ थपथपा ले लेकिन सियासी तौर पर घोर पिछड़े बुंदेलों को चुनावों के वक्त केवल ‘वोटÓ बनाये जाने को लेकर उनके मन में खटास भरी है। भले ही वोट पाने के लिये लोगों के मन की पीड़ा को समझते हुये बुंदेलखंड अलग राज्य के गठन को लेकर प्रत्याशियों या दलों की ओर से बुंदेलों को भरोसा दिया जाता रहा हो इस मांग पर अपना सकारात्मक रुख जरूर दिखायेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और चुनावी समरों के युद्घ विराम के बाद प्रथक् बुंदेलखंड राज्य निर्माण का मुद्दा राजनैतिक परिदृश्य से हमेशा ही गायब रहा। इस चुनाव में तो यह मुद्दा पूरी तरह से हाशिये पर चला गया है, कोई भी दल या प्रत्याशी बुंदेलखंड की बात नहीं कर रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह मुद्दा आम जन का मुद्दा बनने में पिछड़ता ही रहा है।
बुंदेलखंड अलग राज्य निर्माण की बर्षों से चली आ रही मांग को लेकर पिछले चुनावों में अच्छी खासी चर्चा रही, यहां तक कि इस राज्य के निर्माण के लिये बर्षों से संघर्ष कर रहे सिने अभिनेता राजा बुंदेला ने अपनी अलग पार्टी ‘बुंदेलखंड कांग्रेसÓ का गठन तक कर डाला था और 2012 के विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी तक लड़ाये थे। इसके बाद वे भाजपा से अलग बुंदेलखंड राज्य बनाये जाने के मिले आश्वासन पर भाजपा में चले गये। इतना ही नहीं, यूपी की पूर्व सीएम मायावती ने तो बाकायदा बुंदेलखंड समेत पूरी यूपी को टुकड़ों में बांट कर विधानसभा में प्रस्ताव तक कर डाला था लेकिन बात बनी नहीं और बुंदेलखंड अलग राज्य का मुद्दा अभी भी हाशिये पर जहां का तहां पड़ा नजर आ रहा है। बुंदेलों में इस बात को लेकर भारी टीस है कि विभिन्न दलों के नेता जातिवाद, वर्गवाद और साम्प्रदायिकता जैसे तथा कथित मुद्दों को लेकर समाज को तो बांटने में लगे हैं और इस चुनाव में डर्टी स्पीचिज की होड़ सी लगी है लेकिन यूपी और एमपी में दूर तक पसरे बुंदेलखंड को एक अलग पहचान देने में किसी भी दल या नेता ने रुचि नहीं दिखाई और यह मुद्दा सियासी परिदृश्य से पूरी तरह नदारत रहा। बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा, बुंदेलखंड इंसाफ सेना, बुंदेलखंड अधिकार सेना, लक्ष्मीबाई ब्रिगेड जैसे तमाम अराजनैतिक संगठनों ने अपनी-अपनी तरह से बुंदेलखंड अलग राज्य के लिये संघर्ष किया लेकिन उनका लक्ष्य एक ही रहा, बुंदेलों का अलग बुंदेलखंड राज्य। इस संघर्ष में अगर सबसे बड़ी कमी कहीं रही तो वह है इस मसले को आम जन का मसला बना पाने में सभी संगठन विफल रहे हैं जिसका फायदा सियासी दलों ने उठाया और वे अपना उल्लू सीधा करने तक सीमित रह कर भी इस मुद्दे पर किसी तरह की जबाबदेही से साफ बच निकलते रहे हैं।
बताना समीचीन होगा कि आजादी के पहले मुगलों और अंग्रेजों ने तो बुंदेलखंड को अलग राज्य माना लेकिन आजाद हिंदुस्तान के हुक्मरानों ने इस मसले पर कभी भी गंभीरता नहीं दिखाई जिसके चलते देश की स्वतंत्रता के सत्तर साल का लंबा समय बीत जाने के बाबजूद यह मुद्दा अभी भी मुद्दे के ही रूप में नमूदार है, जबकि हकीकत यह है कि 1948 में पेंतीस देसी राजाओं-रजवाड़ों ने अपने अधीन का भूभाग इस शर्त पर भारत गणराज्य के हवाले किया था कि उनकी अलग न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका होगी। उन राजाओं के शर्तनामे की बात कौन कहे, आजादी के बाद बुंदेलखंड के दो टुकड़े करके उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बांट कर इस अति पिछड़े भूभाग के साथ सांस्कृतिक बलात्कार जैसा किया गया। बुंदेलों में इस बात को लेकर गहरा मलाल है कि लगभग हर क्षेत्र में पिछड़े इस बुंदेलखण्ड की तस्वीर बदलने के लिये कभी भी कोई गंभीर राजनैतिक पहल नहीं की गई बल्कि इसे महज चुनावी मुद्दा बनाया जाता रहा और चुनाव बाद भुलाया जाता रहा। आज तो स्थिति यह हो गई है कि यह मुद्दा पूरी तरह से विसरा दिया गया है।
इंसेट में-
विकास से कोसों दूर है बुंदेलखंड
कोंच। जहां कहीं भी अलग राज्य की मांग उठती है तो इसका मतलब साफ होता है कि उस क्षेत्र में विकास के वायदे भले ही बेशर्मीपूर्ण ढंग से किये जाते रहे हों लेकिन इन वायदों का हकीकत से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं रहा होगा। कमोवेश ऐसे ही हालात बुंदेलखंड के हैं जहां किसी भी सत्ता में विकास के काम नहीं कराये गये और राजनैतिक रूप से यह इलाका हमेशा से हुक्मरानों के सौतेलेपन के नजरिये का शिकार रहा है। यही कारण हैं कि इस इलाके में गरीबी, भुखमरी और कुपोषण जैसी समस्यायें तो हैं ही, यहां सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतों का अभी भी टोटा है। कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्यायें राष्टï्रीय पटल पर भी चर्चा में रहीं हैं लेकिन उनकी किस्मत के आगे लगा फुल स्टाप और भी गहरा होता गया। शहरी अंचलों में दूषित पानी अगर बड़ी समस्या है तो ग्रामीण अंचलों में पानी नहीं होना सबसे बड़ी समस्या है। घरेलू कामों से ज्यादा इस इलाके के गांवों की औरतों को पानी की जुगत बनाने की चिंता रहती है। हालात तो यहां तक खराब हैं कि कई इलाकों में पानी का गंभीर संकट है और महिलाओं तथा बच्चियों को कोसों दूर से पानी ढोना पड़ता है, तो कई इलाकों के युवा महज इस लिये क्वांरे रह जाते हैं कि कोई भी अपनी बच्चियों की शादी ऐसे इलाके में करने को राजी नहीं है जहां पानी ढोने में ही उनकी बेटियों की जिंदगी गुजर जाये।







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