उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा चरण 19 फरवरी को हो जाएगा। प्रदेश में कुल मिलाकर 7 चरणों में मतदान कराया जाना है। पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बाहुल्य इलाके शामिल रहे हैं इसलिए सपा, बसपा से लेकर हर दल की जिज्ञासा यह टोह लेने में है कि मुसलमानों ने किनका साथ दिया है। इस दृष्टि से देखें तो दो चरणों के चुनाव में मुसलमानों का बहुतायत में समर्थन बसपा को मिला है लेकिन अगर इसकी व्याख्या और सटीकता के तौर पर करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि बसपा मुसलमानों की पहली पसंद नहीं है। चूंकि पश्चिम में बसपा ने ज्यादातर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। इनमें ज्यादातर उम्मीदवार दबंग हैं और लोकतंत्र के बावजूद भारतीय समाज का ढांचा फासिस्टवादी होने की वजह से मुसलमान ही नहीं हर हिंदुस्तानी कौम में हीरो दबंग होते हैं इसलिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान बसपा को जाने-अनजाने में वोट देने का काम कर रहे हैं।
तीसरे चरण में कानपुर क्षेत्र में चुनाव होना है। यहां भी सीधे-सीधे भाजपा और सपा के बीच मुकाबला है। भाजपा के पक्ष में ब्राह्मण, ठाकुर और कायस्थों के वोटों का जबर्दस्त ध्रुवीकरण है। इसके अलावा ओबीसी का भी लाइन शेयर भाजपा के पक्ष में है। इस अंचल में मुसलमान सपा-कांग्रेस गठबंधन को तरजीह दे रहा है इसलिए एक ही जिला होते हुए भी कालपी तक आते-आते चुनावी मंजर बदला नजर आता है। दूसरी ओर इस बार जाति का कार्ड ज्यादा इफेक्टिव नहीं लग रहा। इसी नाते ओबीसी लगभग पूरा राष्ट्रवाद की मृग-मरीचिका में उलझकर भाजपा के खेमे में साष्टांग हो गया है। ठाकुर-ब्राह्मण तो पहले से ही थे। कमोवेश यही हालत मध्य उत्तर प्रदेश की है। कहने का मतलब यह है कि यूपी का कोई अंचल हो चुनावी मुकाबले में भाजपा नंबर एक पर है।
ऐसा होने की कई वजहें हो सकती हैं। जनरल कास्ट के साथ-साथ ओबीसी भी पूरी तरह से भाजपा के पाले में खड़ा हो गया तो उसकी मुख्य वजह यह है कि अपने आपको सामाजिक न्यायवादी कहने वालों की पार्टियों में उनके साथ न्याय नहीं हुआ। इसलिए यह जातियां भाजपा की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई हैं। भाजपा का पलड़ा इसके चलते बहुत भारी लगने लगा है। कभी ओबीसी की जातियां सपा और बसपा की मजबूती का आधार स्तम्भ थीं लेकिन इनके खिसक जाने से भाजपा की प्रतिद्वंद्वी उक्त दोनों पार्टियों की हालत खस्ता हो गई है। जो ऊपरी तौर से भले ही नजर न आ रही हो लेकिन अंदर ही अंदर इससे कितना नुकसान हो चुका है, यह अंदाजा राजनीति के सयानों को भलीभांति है।
बसपा द्वारा ज्यादा मुसलमानों को टिकट देने का भी असर उलटा हुआ है। बसपा ने कैडर क्लास खत्म कर दिये थे इसलिए ओबीसी की मानसिकता भी हिंदुत्ववादी सम्मोहन के पाश में जकड़ गई। उन्हें मुसलमानों को जरूरत से ज्यादा टिकट दिया जाना इतना अखरा कि वे राजनीतिक प्रतिबद्धताएं भूलकर भाजपा के साथ जुड़ने में सुकून महसूस करने लगे। चुनावी बिसात को पलटने में मुस्लिम समाज की अंदरूनी स्थिति ने भी एक बड़ी भूमिका अदा की है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा ने जिन मुस्लिम नेताओं को अपना उम्मीदवार बनाया है वे ज्यादातर पठान हैं। उन्हें घमण्ड है कि वे इस देश के असली हुक्मरान हैं इसलिए उन्हें हिंदू समाज के सफेदपोश तबकों से तो तालमेल करना बहुत अच्छा लगता है लेकिन जमींदार होने के नाते दलितों को वे भी अपना दुश्मन समझते हैं। उन्हें लगता है कि यह खेतिहर वर्ग बराबरी पर आ गया तो उनके लिए खेती महंगा सौदा साबित हो जाएगी। इस मानसिकता ने स्थिति को उलझा दिया है। अगर पश्चिम में बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार जीत भी गये तो वे कितने दिनों तक बसपा के साथ टिकाऊ रह पाएंगे, यह सोचने का विषय है।
अपने आपको हिंदुस्तान में हुकूमत करने वाली कौम समझने की वजह से पश्चिम के पठान मुसलमान दलितों का साथ बहुत दिनों तक नहीं पचा सकते। हाजी याकूब कुरैशी जैसे लोग इसी खींचतान के चलते बसपा शासनकाल में बागी हो गये थे। फिर भी हालातों से सबक नहीं लिया गया। कांशीराम ने बुंदेलखंड में अकबर अली जैसे लोगों को मुस्लिम प्रतिनिधित्व के लिए आगे बढ़ाया था। सामाजिक धरातल पर मुसलमानों की यह जातियां भी दलितों की तरह ही तिरस्कृत थीं इसलिए दलितों के प्रति उनके मन में आत्मीयता होना स्वाभाविक था। पर आज वह बात नहीं रह गई। इसलिए खतरा यह है कि अगर बसपा को सरकार बनाने का अवसर न मिला तो उसके टिकट पर विधायक बनने वाले दबंग मुसलमान उसके नेतृत्व को स्वीकार न कर पाने की वजह से बगावत कर दें। अगर ऐसा हुआ तो यह बसपा के लिए बेहद अशुभ सूचना होगी। लेकिन कैर-बैर का जो जोड़ा बसपा का वर्तमान नेतृत्व मिला रहा है उसमें ऐसे जोखिम लाजिमी हैं।
हाजी याकूब कुरैशी इसके उदाहरण हैं। जिन्होंने पिछले चुनाव में बसपा की दम पर विधानसभा में स्थान पाया था लेकिन बाद में उन्होंने ठसक के चलते बसपा से ही बगावत कर दी थी। आशंका यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा को हुकूमत न मिलने पर उसके विधायक इसी तरह बगावत का झण्डा बुलंद करेंगे। बसपा के बेतुके मुस्लिम कार्ड का नतीजा कहीं से उसके लिए लाभदायक साबित होने की बजाय भाजपा को मजबूती देने का काम कर रहा है।
जो भी हो उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनावी परिदृश्य इस बार गूढ़ पहेली बन चुका है। मुसलमानों की पहली पसंद सपा-कांग्रेस गठबंधन है लेकिन बसपा ने ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार बनाकर इसमें बंटवारा करा दिया है। ओबीसी जो कि सपा की या बसपा की मुख्य ताकत हुआ करती थी उसका डायवर्जन पूरी तरह से भाजपा की ओर हो चुका है। ऐसी हालत में अगर भाजपा को अकेले दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने का गुमान हो गया है तो इसे खोखला नहीं कहा जा सकता। भाजपा का यह गुमान काफी हद तक वस्तुपरक है इसलिए यूपी विधानसभा के चुनाव के परिणाम उम्मीद से परे होंगे, ऐसा कहने वालों में कोई गलत नहीं है।







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