0 बारह फीसदी मतदाता नहीं है अपने घरों में
0 ग्रामीण अंचल में हर पांचवे घर के लोग परदेस में, कई घरों में लटके हैं ताले
कोंच-उरई। आसन्न विधानसभा चुनाव में माधौगढ और विधानसभा क्षेत्रों में लगने वाले इलाकों के अधिकांश युवा रोजी कमाने के चक्कर में परदेश में पड़े हैं जिसका अच्छा खासा असर वोटिंग प्रतिशत पर पड़ा है। गांवों में हालत यह है कि हर पांचवां घर ऐसा है जिसमें बूढे मां-बाप या इक्का दुक्का सदस्य ही घरों में हैं, इन घरों के युवा रोजी कमाने के लिये देश के अन्य प्रांतों में अपने परिवारों के साथ डेरा डाले हैं जिसके चलते उन्हें चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं रही। कई घर ऐसे भी जहां ताले लटके हैं, यानी एक तरह से पलायन की स्थिति ने वोटिंग प्रतिशत का सारा गणित बिगाड़ कर रख दिया है। एक अनुमान के मुताबिक तहसील क्षेत्र से लगभग पच्चीस हजार मतदाता बाहर हैं, इनमें से ज्यादातर निचले तबके के हैं।
कोंच तहसील क्षेत्र के विकास खंड नदीगांव का अधिकांश इलाका माधौगढ़ विधानसभा क्षेत्र में लगता है। इस इलाके का पश्चिमी क्षेत्र बीहड़ का है जहां राजी के साधन बिल्कुल भी नहीं हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधायें भी इन इलाकों के बाशिंदों के लिये चंदा मामा दूर के हैं। पेट की आग बुझाने के लिये इन खजुरी, खजुरी डांग, अर्जुनपुरा, भखरौल, कैमरा, सींगपुरा, अनघौरा, परावर की मड़ैंयां, सलैया, महेशपुरा, देवगांव, घमूरी, जगनपुरा, परासनी, रूपपुरा आदि इलाकों में तमाम घर ऐसे हैं जहां ताले लटक रहे हैं। बताया गया है कि इन घरों के लोग बाहर हैं और मतदान के लिये भी नहीं आ सके हैं। विकास खंड कोंच के भी वह इलाके जो माधौगढ विधानसभा के अलावा उरई (सु) विधानसभा क्षेत्र में लगते हैं, कमतरी, भेंपता, बसोव, सुनायां, नरी, पहाडगांव, कौशलपुर आदि में भी पलायन की यही स्थिति है। ऐसे घरों की संख्या भी हजारों में है जिनमें केवल बूढे मां-बाप और एकाध नाबालिग ही मौजूद हैं, उनके कमाने लायक सदस्य गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान यहां तक कि दक्षिण पश्चिम के राज्यों जैसे तमिलनाडु, आंध्रा, बैंगलुरू से लेकर मुंबई तक में डेरा डाले रोजगार कमा रहे हैं। मां-बाप के खर्च के लिये वह समय से पैसा भेजते रहते हैं। ऐसे लोग साल में एक या दो बार ही त्यौहारों के मौकों पर आ पाते हैं, मतदान उनके लिये ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं। गांवों का यही पलायन आसन्न चुनाव में कम मतदान होने का एक बड़ा कारण बन कर उभरा है। कोंच तहसील में 279 गांव हैं जिसमें 202 गांव आबाद हैं और इनकी मतदाता संख्या 2 लाख 21 हजार 421 है। इन गांवों में पहुंचे संवाददाता को जो जानकारी मिली है उसके अनुसार मोटे तौर पर बड़ी आबादी बाले गांवों से औसतन सैकड़ा भर और छोटे गांवों से आधा सैकड़ा लोगों का पलायन है। यह संख्या कोंच कस्बे और नदीगांव टाउन एरिया सहित लगभग पच्चीस हजार है। ऐसे में मतदान प्रतिशत अगर गिरता है तो हैरानी की कोई बात नहीं है।
इंसेट में-
देवगांव निवासी रामसेवक बताते हैं कि यहां रोटी की कोई जुगाड़ नहीं है लेकिन बाल बच्चों का पेट भरने के लिये बाहर जाना मजबूरी है। बताते हैं इनकी बहू और बेटा बाहर गुजरात में रह कर रोजी कमाते हैं और बर्ष में एकाध बार ही आना हो पाता है। इनके पड़ोसी किसुनपाल सिंह के घर में छह मतदाता हैं लेकिन सभी बाहर हैं और घर में ताला लटका है।
इंसेट में-
देवगांव की ही रहने वाली मानकुंवर अपने नाबालिग बेटे छोटू के साथ अकेली ही गांव में रहती हैं। छोटू यहां रह कर पढ़ाई करता है जबकि इनका बड़ा बेटा शिशुपाल व बहू हेमलता महाराष्ट्र में पानी पूरी का धंधा करने गये हैं। इनकी पीड़ा यह है कि यहां रोजगार हैं नहीं और पेट भरने के लिये बाहर जाने के अलावा और कोई चारा भी नहीं है।
इंसेट में-
ग्राम घमूरी निवासी अमृतसिंह के पास खेती बाड़ी के नाम पर भूमिहीन हैं और मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करते रहे। अब इनकी उम्र 65 बर्ष है और शरीर साथ नहीं देता है। इनके पड़ोस के आधा दर्जन घरों में लटके ताले इस बात की चुगली करते दिखते हैं कि सभी रोटी की जुगाड़ में परदेस में हैं। लोगों के पलायन के कारण गांव की रौनक भी गायब है।





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