उरई। बुंदेली को सार्वभौम भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए सभी विधाओं में इसका प्रयोग कर साहित्य में नया इतिहास रचने वाले कवि महेश कटारे ‘सुगम’ को इस बार हिंदी अकादमी ने स्वभाषा सम्मान 2016-17 के लिए चुना है। इसके तहत उनको एक लाख रुपये नगद और शाॅल व श्रीफल देकर सम्मानित किया जायेगा। एक निजी कार्यक्रम में यहां पहुंचे सुगम जी ने कहा कि बुंदेली ठसक और लालित्य दोनों से ही परिपूर्ण अनूठी भाषा है जिसकी विशेषताओं को कभी पूरी तरह प्रचारित नही किया गया। बुंदेलीसेवी रचनाधर्मी अगर ठान लें तो इस बोली का साहित्य एक नई क्रांति रच सकता है।
महेश कटारे ‘सुगम’ ने बुंदेली में गजलें रचकर एक नया प्रयोग किया जिसे सभी जगह सराहना मिली है। उन्होंने दावा किया कि बंुदेली हर विधा में सक्षम और उपयुक्त है। उनकी बुंदेली में लिखी आठ पुस्तकें अभी तक सामने आ चुकी हैं। जिनमें गांव के ड़योढ़े के नाम से शुरुआत में उन्होंने एक गजल संग्रह लिखा था। अब उनकी बुंदेली गजल संग्रह की नई किताब ‘अब जीवैं को एकई चारो’ के नाम से प्रकाशित हुई है। इसके अलावा उनकी अन्य किताबों में ‘हरदम हंसता गाता नीम’ नाम से बालगीत संग्रह ‘तुम कछू मौं से कहो’ नाम से नवगीत संग्रह, ‘वैदेही विषाद’ के नाम से एक लंबी कविता और प्यास शीर्षक से कहानी संग्रह शामिल हैं।
पिछले चार दशकों से साहित्य साधना में जुटे महेश कटारे ‘सुगम’ मूल रूप से ललितपुर जिले के रहने वाले हैं लेकिन वे मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य विभाग की सेवा में रहे इसलिए उनका ज्यादातर लेखन मध्यप्रदेश में हुआ है। सेवा निवृत्त होने के बाद वे ललितपुर के बीना कस्बे में आकर बस गये। लगभग 65 वर्ष की आयु के बावजूद सुगम जी का दावा है कि अभी पूरी तरह तरोताजा हैं। उनका कहना है कि बुंदेली को ऊंचाईयों तक ले जाने के लिए उन्हें अभी बहुत काम करना है।







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