0 होली मिलन कार्यक्रम में काव्य गोष्ठी का हुआ आयोजन
कोंच-उरई। होली मिल कार्यक्रमों की कड़ी में यहां अंतर्राज्यीय मंचों के अभिनंदित कवि रामरूप स्वर्णकार श्पंकज्य के आवास पर जुटे कवियों और साहित्यकारों ने जहां रंग और गुलाल से एक दूसरे के चेहरे पोते वहीं अपनी अनूदित रचनाओं और शे्यर-ओ-शायरी के माध्यम से वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक परिवेश में आम चलन पर अपना मत अभिमत प्रकट किया।
पूर्व बारसंघ अध्यक्ष संतलाल अग्रवाल की अध्यक्षता तथा लोकतंत्र सेनानी ब्रजेन्द्र मयंक के मुख्य अतिथ्यि व पालिका चेयरपर्सन प्रतिनिधि विज्ञान विशारद सीरौठिया के विशिष्ट आतिथ्य में नगर व जिले के कवियों और साहित्यकारों ने होली मिलन समारोह में हिस्सा लिया। पंकज परिवार ने सभी अतिथियों व कवियों-साहित्यकारों का स्वागत किया। अतिथियों ने मां वीणापाणि का अर्चन वंदन कर कार्यक्रम को गति प्रदान की, मन्नू पेंटर ने वाग्देवी का शब्द प्रसूनों के माध्यम से आह्वान किया। इसके बाद काव्य रचनाओं ने वहां उपस्थित लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। नवोदित कवि संजीव सरस ने अपनी अंतस की पीड़ा को शब्दों में कुछ इस तरह से गूंथा, मेरी आंखों को मुझ पर रहम आ गया, मेरे आंसू मुझे चुप कराने लगे….। आनंद शर्मा ने रचना पाठ किया, सच और एक हजार के नोट में ज्यादा अंतर नहीं दोनों चलन के बाहर, कोई लेना नहीं चाहता और कोई रखना..। ब्रजेन्द्र यादव ने अपना नजरिया दिया, आगे तो निकल आये बहुत पर बाकी हैं कई सवाल, काम ऐसे करो दिल में न रहे कोई मलाल..। भास्करसिंह माणिक्य की सम सामयिक रचना श्होली के हुड़दंग में न होये कोई भंग, ऐसी खेलें होली सब रह जायें दंग..्य ने लोगों को खूब गुदगुदाया। उर्दू अदब के नामचीन शायर प्रेम चैधरी नदीम ने कविता पाठ किया, दिलों में दरारें गवारा न करना, अगर कर चुके फिर दोबारा न करना..। संचालन कर रहे हरपालसिंह यादव ने कहा, होरी में सब करत ठिठोली बूढे वारे लरकईंयां..। नामवर साहित्यकार नरेन्द्र मोहन मित्र ने आशावादी दृष्टिकोण देते हुये कहा, कितने भले लोग दुनिया में उनकी ओर निहारो तुम, संघर्षों से क्या घबराना सत्यम् शिवम् विचारो तुम..। सुरेन्द्र नायक, डॉ. हरिमोहन गुप्त, प्रमोद सोनी, संतोष तिवारी, सुकदेव व्यास, वीरेन्द्र तिवारी, दिनेश मानव, सावित्री शर्मा गुरसरांय, कृपाराम कृपालु, राजेशचंद्र गोस्वामी, राजेन्द्र निगम, पारसमणि अग्रवाल, राघवेन्द्र चिंगारी, कालीचरन सोनी, मोहनदास नगाइच, आदि की भी रचनायें खूब सराही गईं। आभार भास्करसिंह ने जताया।





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