शनिवार की शाम उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रहा सस्पेंस खत्म हो गया। इसके पहले केंद्रीय पर्यवेक्षकों की योगी आदित्यनाथ के साथ वीवीआईपी गेस्ट हाउस में लंबी बातचीत की नौटंकी हुई। साथ ही मीडिया को इसी दौरान लीक कर दिया गया कि तमाम जो नाम चल रहे हैं उन्हें परे करके योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाया जा रहा है। इसके लिए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य को भी विश्वास में लिया गया। योगी आदित्यनाथ से वेंकैया नायडू के विचार-विमर्श के समय केशव मौर्य को उपस्थित रखा गया ताकि उन्हें अहसास हो सके कि उत्तर प्रदेश भर को पार्टी ने उऩकी अहमियत का अहसास करा दिया है। केशव मौर्या का अहम संतुष्ट करने के लिए यह पर्याप्त था। इसके साथ ही केशव मौर्या को दिनेश शर्मा के साथ योगी आदित्यनाथ की टीम में डिप्टी सीएम बनाने का भी फैसला घोषित किया गया।
अब इस पर बहस चल रही है कि योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाने की पटकथा यूपी के चुनाव अभियान के शुरू होने के पहले ही तैयार कर ली गई थी या फिर आखिरी समय भाजपा के जीते विधायकों में ठाकुर विधायकों की संख्या ज्यादा होने और उनके द्वारा योगी-योगी का नारा लगाकर बनाये गये दबाव की वजह से पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अपना रुख बदलना पड़ा। इसी संदर्भ में यह भी चर्चा तेज हो गई है कि कोयम्बटूर में चल रही संघ की बैठक में योगी को मुख्यमंत्री बनाने का मेंडेट पीएम मोदी को सुना दिया गया था जिसकी वजह से मोदी के सामने अन्य सारे विकल्पों पर विराम लग गया। मोदी की शख्सियत कितनी भी विराट क्यों न हो गई हो लेकिन संघ के रिमोट कंट्रोल से बगावत कर जाने की हैसियत अभी उनकी भी नहीं बन पाई है। इसलिए मोदी ने खिन्न होेते हुए भी संघ के फैसले को शिरोधार्य कर लिया।
मोदी को योगी आदित्यनाथ को यूपी का सीएम बनाने की बाध्यता नागवार गुजरी। यह सिद्ध करने के लिए कहा जा रहा है कि जब योगी आदित्यनाथ को चार्टर्ड प्लेन से आनन-फानन में दिल्ली बुलवाकर वेंकैया नायडू उनसे अंतिम दौर की बातचीत कर रहे थे उस समय मोदी जानबूझकर दिल्ली में मौजूद नहीं थे। वे उत्तराखंड में नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने मौका बरकाने के लिए चले गये थे। जबसे 24 घंटे के न्यूज चैनल शुरू हुए हैं तबसे मीडिया में लाल बुझक्कड़ों की भरमार हो गई है। वे दर्शकों को अपने चैनल पर अटकाये रखने के लिए कुछ भी बक-बक करने के एक्सपर्ट हैं। इसलिए कई बार आंखों देखी बात पर भी सयानों का भरोसा डिग जाता है। शायद यूपी में सीएम के नाम को तय किये जाने के मामले में भी ऐसा ही हुआ।
गहराई से चुनाव के समय के भाजपा के अंदरूनी घटनाक्रम का फ्लैशबैक देखें तो कुछ चीजें हैं जो इस संदर्भ में नोटिस में लिए जाने योग्य मानी जा सकती हैं। योगी आदित्यनाथ ने पूर्वांचल में भाजपा के समानांतर हिंदू वाहिनी बना रखी थी। पिछले चुनावों में जब भाजपा ने उन्हें बाईपास करने की कोशिश की तो उन्होंने हिंदू वाहिनी को आगे करके बागी तेवर दिखाने में कोई कोताही नहीं बरती लेकिन इस बार भाजपा के उम्मीदवारों का विरोध करने वाले हिंदू वाहिनी के कार्यकर्ताओं को उन्होंने उल्टे लताड़ा और पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के लिए ही काम करने की हिदायत जारी की। उन्होंने भाजपा के पक्ष में बढ़-चढ़कर बहुत मनोयोग से सभाएं कीं। पार्टी के घोषणापत्र के जारी होने के समय उपस्थित चार प्रमुख नेताओं में वे भी शुमार रहे। इन प्रसंगों का कोई संकेत था तो यह कि भाजपा हाईकमान ने चुनाव के समय ही योगी की यह शर्त मंजूर कर ली थी कि बहुमत आने पर पार्टी उनको ही सीएम बनाएगी।
चर्चा यह है कि भाजपा हाईकमान ने दो विकल्प रखे थे। अगर यूपी में पार्टी की सीटें 210 तक आतीं तो योगी को सीएम नहीं बनाया जाता। वजह यह है कि पार्टी टेस्ट कर रही थी कि हिंदुत्व के नाम पर ध्रुवीकरण में वह ओबीसी और एससी को कितना समेट पाई है। वीपी सिंह ने मंडल बनाम कमंडल के नारे से ओबीसी के बड़े तबके में यह भावना भर दी थी कि कमंडल की शरण में जाना किसी धर्म की शरण में जाना न होकर अपने को सामाजिक औपनिवेशवाद की ऐसी व्यवस्था में गर्क करना है जिसका उद्देश्य उन्हें अपमानित करने के सिवाय कुछ नहीं है। यह अकेले यूपी की बात नहीं है। राजनीतिक पंडित अभी तक यही मानते रहे थे कि हिंदू समाज में इतना विभाजन है कि उनमें सम्पूर्ण एकजुटता कभी भी सम्भव नहीं होगी। ऐसे में मुसलमानों को अलग-थलग करके राज करने का सपना देख रही भाजपा जैसी पार्टी के मंसूबे कभी पूरे नहीं हो पाएंगे।
उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव का अभियान जब चल रहा था तो पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी इस आशंका से परे नहीं थे। उनके लिए यह चुनाव हिंदुत्व के मुद्दे पर लिटमस टेस्ट जैसा था। वे मुस्लिम विरोधी भावनाओं के तहत सम्पूर्ण हिंदू समाज को एकजुट करने का पासा फेंक रहे थे लेकिन साथ में उन्होंने यह भी सोच रखा था कि अगर यह पासा पूरी तरह कामयाब नहीं होता तो हिंदुत्व की कट्टर लाइन अख्तियार करने की बजाय अटल बिहारी वाजपेई की तरह वे समझौतावादी फार्मूला अपनाएंगे। मतलब कि वे मुसलमानों की भावनाओं की परवाह करते हुए काम करेंगे। इसलिए कामचलाऊ बहुमत की हालत में योगी की कट्टर छवि के चलते उन्हें सीएम बनाने का जोखिम मोल न लेने की अंडरस्टैंडिंग भाजपा में थी, लेकिन इसी के साथ यह भी तय कर लिया गया था कि अगर पार्टी ने यूपी में ढाई सौ से ज्यादा सीटें प्राप्त कर लीं तो मुसलमानों की परवाह करने की कोई जरूरत नहीं समझी जाएगी।
लोकसभा चुनाव में यूपी में मिली 73 सीटों से उनका हौसला बुलंद था और उन्हें यह उम्मीद थी कि परम्परागत धारणा के विपरीत मुसलमानों से परहेज करके भी भाजपा न केवल कामयाब हो सकती है बल्कि अभूतपूर्व बहुमत तक हासिल कर सकती है। लेकिन विधानसभा चुनाव में जितनी सीटें मिलीं वह तो भाजपा के अतिवादी शिल्पकारों के अनुमान से कहीं बहुत ज्यादा थीं। उनके मनोबल को बुलंद करने का इस मामले में एक बड़ा कारण यह भी था कि जानबूझकर उन्होंने प्रदेश में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार अपनी पार्टी से नहीं होने दिया था। वे जानते थे कि इसके बाद उन्हें हराने वाले दल या मोर्चा की ओर मुसलमानों का जबर्दस्त ध्रुवीकरण होगा और वे इसका नतीजा देखना चाहते थे। भाजपा की नई रणनीति के शिल्पकारों ने देखा कि मुस्लिम ध्रुवीकरण सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर हुआ लेकिन इसके बावजूद गठबंधन की हालत पतली रही क्योंकि मुसलमानों के समर्थन से हवा बन जाने के बावजूद हिंदुओं की जातियों का बहुतायत में रुख उनसे विमुख रहा इसलिए भाजपा हाईकमान के सामने खुला खेल फर्रुखाबादी खेलने में कोई दुविधा नहीं रह गई।
योगी उत्तर प्रदेश को कितना सुशासन दे पाएंगे यह आगे गौर करने वाली बात है। उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि वे 1996 से सांसद हो रहे हैं जिसकी वजह से लम्बे समय से वे लाइमलाइट में हैं। फिर भी उन पर बेईमानी और कोई चारित्रिक दोष अभी तक कानाफूसी में भी नहीं लगाया जा सका है। सीएम के ईमानदार होने से यूपी का भ्रष्टाचार में पोल पोर डूब चुका प्रशासन काफी हद तक अपने में बदलाव के लिए बाध्य होगा। लेकिन योगी सबका साथ, सबका विकास के नारे के साथ शायद ही कदमताल कर पाएं। इसलिए आशंका है कि उनके शासन में मुसलमानों को हैसियत में रखने में ही ज्यादा ऊर्जा इस्तेमाल हो, यह अतिवाद अलगाव का खतरा भी पैदा कर सकता है। लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि योगी में यूपी का सीएम बनने की तीव्रतर महत्वाकांक्षा थी जबकि खांटी नेता उन्हें हजम करने की मानसिकता नहीं बना पा रहे थे। इस मुश्किल के बावजूद उन्होंने अपना मंसूबा पूरा कर लिया जो जाहिर करता है कि वे निरे संत नहीं हैं बल्कि खांटी राजनीतिज्ञ भी हैं। इसलिए सत्ता में न आने के पहले उनके जो तेवर रहे हैं जरूरी नहीं है कि वे सत्तासीन होने पर वैसे ही रंग-ढंग अपनाये रहें।
स्थिर सरकार और प्रशासन के लिए सामंजस्य का रुख जरूरी है। शायद योगी भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं इसलिए मुख्यमंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली क्या होगी, इसको लेकर अभी से कोई पूर्वाग्रह पालने की तुक नहीं है। अभी तक यह माना जाता है कि संन्यासी और योगी छुट्टा होते हैं जिसकी वजह से व्यवस्था के मामले में उन पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए लेकिन आदित्यनाथ की सूझबूझ इस धारणा से ऊपर की रही तो वे पहले ऐसे योगी होंगे जो यह विश्वास दिला सकेंगे कि धर्म और अध्यात्म के बादशाह मौका पड़ने पर सांसारिक सत्ता का भी औरों से ज्यादा बेहतर तरीके से संचालन कर सकते हैं।
यह माना जाता है कि गोरखनाथ पीठ ठाकुरों की पीठ है इसलिए व्यापक हिंदुत्व के मामले में इसकी साख संदिग्ध हो सकती है। योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ ने वीरबहादुर और चंद्रशेखर के सामने रहने पर राम जन्मभूमि की लड़ाई में हमेशा अपने रुख को लचीला किया था इसलिए इस धारणा को और बल मिला। योगी आदित्यनाथ के बारे में कहा जाता है कि वे जाति-पाति की संकीर्णता से परे हैं और हिंदू के मान-सम्मान की बात पर बिना किसी की जाति देखे वे किसी भी सीमा तक संघर्ष के लिए तैयार रहते हैं लेकिन प्रसिद्ध कथाकार उदयप्रकाश ने उनके आकर्षण में जब अपनी प्रगतिशील छवि को दांव पर लगाने में हिचक नहीं की थी तब फिर यह प्रश्न उठा था कि गोरखनाथ पीठ का सम्बंध एक जाति की शक्ति से जोड़ा जाना गलत नहीं है। बहरहाल अभी कुछ महीने नई बहुरिया के लाड़-प्यार का माहौल नई नवेली सरकार को लेकर रहेगा लेकिन इसके बाद प्रश्न उठने शुरू होंगे और उन प्रश्नों में जाति से जुड़े प्रश्न न हों इनको मैनेज करना योगी के लिए चुनौती रहेगा।







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