धर्म की शऱणस्थली और शिवपाल यादव

धर्म का रहस्यवादी रुख उन मनोविकारों के उत्प्रेरण का कारण सिद्ध हुआ है जिनसे चित्तशुद्धि धर्म का लक्ष्य है। इससे उत्पन्न आडम्बरी कर्मकांडों ने बहुधा दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को अपनी धार्मिक छवि बनाकर समाज को गुमराह करने में सहायता प्रदान की है। साथ-साथ उनका मनोबल बढ़ाया है कि रहस्यवादी शक्तियां प्राप्त हो जाने से वे अब मनमानी के लिए ईश्वरी कोप से सर्वथा सुरक्षित हैं।

हालांकि वृंदावन में गोविंद मठ में उत्तर प्रदेश के जीवित महान नेताओं में से एक शिवपाल सिंह यादव द्वारा कराए गये दुर्गा महायज्ञ का इस संदर्भ से कोई लेना-देना नहीं है। फिर भी जब कोई चर्चित व्यक्ति अपनी सुपरिचित छवि से अलग हटकर एकाएक धर्मोन्मुख हो उठता है तो ऐसे प्रश्न बरबस याद आने लगते हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर श्रीराम शर्मा तक आधुनिक काल में ऐसे धार्मिक सुधारक उल्लेख योग्य रहे हैं जिन्होंने कर्मकांडों और आडम्बरों के घटाटोप में धर्म की तात्विकता को बचाने के लिए सार्थक प्रयास किया। पूर्व से सतयुग के कार्यकाल में जब-जब होय धर्म की हानि के मौके पर सुधारवादी की शक्ल में आये संत और पंथ के अवतारों की तो लम्बी श्रंखला है। आज इसकी चर्चा क्यों प्रासंगिक है, यह बात उत्तर प्रदेश के समकालीन राजनीतिक प्रसंगों को याद दिलाते हुए बात को आगे बढ़ाने पर स्पष्ट हो पाएगी।

शिवपाल सिंह यादव के बारे में मुलायम सिंह यादव बताते हैं कि किस तरह से उन्होंने इमरजेंसी के पहले से राजनीति में समाजवादी मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष किया। प्रभु सत्य वचन आपके, लेकिन शिवपाल सिंह की सार्वजनिक जीवन में पहचान वास्तविक तौर पर जिस प्रसंग से हुई उसके गवाह अभी मौजूद हैं। इनमें रिटायर्ड डीजीपी बृजलाल भी हैं जो चुनाव के काफी पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गये थे। हालांकि इसके पहले उन्हें बहिनजी यानी बसपा सुप्रीमो मायावती का नजदीकी माना जाता था।

लेकिन बृजलाल शुरू से ऐसे नहीं थे। वे विशुद्धतम प्रोफेशनल पुलिस अफसर थे। जालौन जिले से उऩकी नौकरी की शुरुआत ज्वाइंट एसपी के रूप में हुई। नया अफसर ऐसी जोखिम मोल लेता नहीं है जैसा कि बृजलाल ने किया था। अपने समय के सबसे दुर्दांत दस्यु सरगनाओं में से एक घनश्याम को बिना शर्त पुलिस के सामने समर्पण करने की भूमिका उन्होंने तैयार कर ली थी। तत्कालीन आईजी गोविल साहब हेलीकॉप्टर से देखने आये थे कि वास्तव में घनश्याम का हृदय परिवर्तन हुआ है कि नहीं और पचनद क्षेत्र में बनाये गये पीस जोन में घनश्याम से मुलाकात के बाद उन्होंने बृजलाल को बहुत सराहा था। लेकिन तत्कालीन एसएसपी जालौन की ईर्ष्या का शिकार होकर घनश्याम के समर्पण के लिए तय किया गया आपरेशन वन डाउन भी धराशायी हो गया और बृजलाल को भी लगभग बेआबरू होकर जालौन के कूचे से बाहर जाना पड़ा।

लेकिन पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं, सो बृजलाल की क्षमताएं जालौन में पहली पोस्टिंग में ही उजागर हो गई थीं। इस नाते जब उनको लखनऊ में एसपी सिटी का चुनौतीपूर्ण दायित्व मिला तो उस समय केपी सिंह और बख्शी के गिरोहों का गैंगवार लखनऊ की सड़कों पर होता था और पुलिस केवल उस गैंगवार में मारे जाने वाले माफियाओं की लाशें उठाने का काम करती थी। पर बृजलाल और सूर्यकुमार शुक्ला दो अफसर ऐसे रहे जिन्होंने उस दौर में लखनऊ के एसपी सिटी के रूप में नये पुलिस अफसर होने के बावजूद इन माफियाओं के गुर्गों को सड़क पर दौड़ाकर मारकर दिखाया जिससे यूपी पुलिस की नाक फिर सलामत हो सकी।

मुलायम सिंह इसी ख्याति की वजह से पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर 1989 में बहुत आग्रहपूर्वक बृजलाल को इटावा का एसएसपी बनाकर लाये थे। एक दिन बृजलाल को पता चला कि सीएम के भाई ने जमीन-मकानों पर कब्जा करने वाले गिरोह के लोगों को पकड़कर हवालात में बंद करने की वजह से थाने के भीतर घुसकर इटावा के सिविल लाइंस थाने के प्रभारी और पूरे स्टाफ को मारापीटा और जबर्दस्ती हवालात तोड़कर अपने गुर्गों को बाहर निकाल ले गये। इससे बृजलाल का पारा चरम सीमा पार कर गया और उन्होंने सीएम के भाई की गिरफ्तारी के लिए खुद दबिश का नेतृत्व करने का फैसला लिया। इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। कुछ ही घंटों में उन्हें निलंबित कर दिया गया। इसके साथ कानपुर के डीआईजी को हटाकर सिलेक्शन ग्रेड के एसएसपी घुंघेश को कानपुर का प्रभारी डीआईजी इस शर्त पर बना दिया कि वे ऐसी जांच तैयार करें जिससे बृजलाल को इस हिमाकत का मजा नौकरी से बर्खास्त कराकर चखाया जा सके। यह दूसरी बात है कि बृजलाल की किस्मत बुलंद निकली। मुलायम सिंह की सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी।  बाद में जब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बनकर आये तो मेरठ में चल रहे माफियाराज को खत्म करने के लिए उन्होंने अपनी ओर से बृजलाल को वहां एसएसपी बनने का अॉफर दिया। इसके बावजूद बृजलाल अपनी शर्तों पर मेरठ गये। जिसमें कल्याण सिंह द्वारा उनसे यह वायदा किया जाना शामिल था कि भाजपा का कोई नेता कितना भी बड़ा क्यों न हो, उऩके काम की टोकाटोकी करने नहीं आयेगा। पर कल्याण सिंह की सरकार भी ज्यादा दिन नहीं रह सकी। बृजलाल को शिवपाल से अदावत इतनी महंगी साबित होने लगी कि आखिर में जब पहली बार मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो सरकार के संरक्षण की जरूरत तीव्रता से महसूस होने की वजह से उन्होंने पार्टीबंद होना स्वीकार किया। आगरा के डीआईजी के रूप में पहली बार उन पर आरोप लगा कि उन्होंने रेंज के सारे थानेदारों से बसपा के लिए चंदा उगाहा है।

बहरहाल जो भी हो लेकिन कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि बृजलाल कांड की वजह से पहली बार लोग शिवपाल का नाम और उनकी हैसियत जाने थे। हो सकता है कि इमरजेंसी के पहले से डॉ. लोहिया उनके बहुत मुरीद रहे हों और अपने साहित्य में उन्होंने शिवपाल का बहुत सराहनापूर्वक उल्लेख किया हो। इसके बाद लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इमरजेंसी के प्रतिकार में शिवपाल की भूमिका को लेकर बहुत गर्व जताते हुए लेखन किया हो लेकिन दुर्भाग्य से यह लेखन अनुपलब्ध है। मुलायम सिंह को चाहिए कि अपने परिवार के प्रबंधन में चलने वाले तमाम कॉलेजों के मेधावी छात्रों से इस बारे में शोध प्रबंध लिखवाएं जिससे भारतीय लोकतंत्र को समृद्ध करने में शिवपाल सिंह का अतुलनीय योगदान इतिहास में दर्ज हो सके।

शिवपाल सिंह की बृजलाल कांड जैसी ख्याति मुलायम सिंह के तीन मुख्यमंत्रित्व काल में लगातार मजबूत हुई। फिर चाहे वह इटावा में चुनावी नामांकन के समय उन्नाव निवासी दरोगा आरपी सिंह की गोली लगने से मौत का मामला हो और चाहे एमएलसी अजीत सिंह की उन्नाव में एक निजी समारोह में रहस्यमयी परिस्थितियों में हत्या का मामला, शिवपाल सिंह का दबदबा इस शोहरत की वजह से जितना बुलंद हुआ उतना किसी आतंकवादी का भी दबदबा उसके कार्यक्षेत्र में न रहा होगा।

शिवपाल सिंह जैसा कि मुलायम सिंह कहते हैं बहुत ही जुझारू और विद्वान राजनीतिज्ञ हैं और शायद उन्होंने माओत्से तुंग को जितना पढ़ा है उतना हिंदुस्तान के किसी भी राजनीतिज्ञ ने पढ़ा हो लेकिन उन्हें तब अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार के लिए मजबूर होना पड़ा जब आजम खां के मुकाबले उन्हें बढ़ाकर उत्तर प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष बनाने का फैसला लेने वाले मुलायम सिंह ने पहली बार अपनी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार आने पर उनकी जगह अपने  बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री बनवा दिया। साफ था कि शिवपाल यह समझ गये थे कि भारतीय लोकतंत्र में सत्ता बंदूक की नली से निकलती है माओ का यह सूत्रवाक्य सफलता की एक सीमा के बाद करियर पर बोझ की तरह छा जाता है। इसकी धुंध हटाने के लिए शिवपाल सिंह यादव साहब अखिलेश के कार्यकाल में समाजवादी आंदोलन के आचार्य नरेंद्र देव और डॉ. लोहिया जैसे पुरोधाओं के लेख लिखवाकर दैनिक जागरण, अमर उजाला आदि अखबारों के संपादकीय पृष्ठ पर अपने नाम से पूरी कीमत देकर प्रकाशित कराने लगे। थिंक टैंक के रूप में उनके चौंकाने वाले इस अवतार से उन्होंने बहुत दूर के मंसूबे साधने की कोशिश की।

बेचारे बैंड-बाजे वालों की तो नियति है कि अपना पेट पालने के लिए आज इसकी शादी में कल उसकी शादी में पैसे लेकर बजाएं। कमोवेश आज की मीडिया की नियति भी इससे कुछ अलग नहीं है इसलिए मुलायम और शिवपाल के खिलाफ अखिलेश द्वारा किये गये षड्यंत्र से लोकतंत्र को कितनी क्षति हुई है इसकी निष्पत्ति में उसे पूरा जोर लगाना ही था। उक्त प्रसंग मात्र कुछ बानगी हैं जिनसे यह आंका जा सकता है कि लोकतांत्रिक परम्पराओं को उत्तर प्रदेश में समृद्ध करने में शिवपाल सिंह जी ने किस तरह से योगदान किया है। साथ ही उनके प्रेरणापुरुष और उन्हीं के आदरणीय बड़े भाई मुलायम सिंह का योगदान तो स्वतः ही सर्वोपरि है। मुलायम सिंह बहुत ही गुणग्राहक हैं। शिवपाल सिंह की तारीफ के लिए जब-जब उन्होंने कुछ हवाले बताये तब-तब सार्वजनिक जीवन की उच्च मान्यताएं धन्य हुई हैं। अखिलेश की पिछली सरकार में ही वे तब शिवपाल पर लट्टू दिखे थे जब मायावती द्वारा सपा सरकार को बार-बार गुंडों की सरकार बताने पर शिवपाल ने भाषाई शील के प्रतिमान को स्थापित करते हुए बिना यह सोचे कि एक महिला के प्रति भले ही वह विरोधी क्यों न हो, टिप्पणी करने में संयम बरतना कितना आवश्यक है, मायावती को गुंडी कहकर सबक सिखाया था। मुलायम सिंह स्वयं बताते हैं और भाजपा के नेता अपने व्यवहार से जाहिर भी करते हैं कि वे उच्च संसदीय परम्पराओं के महान अनुशीलनकर्ता हैं।  इसलिए जब भी मुलायम सिंह लोकसभा में वर्तमान सांसदों के आचरण से आहत होकर बताते हैं कि कमलापति त्रिपाठी या उसके पहले सदन की चर्चाओं का स्तर क्या होता था तो भाजपा वाले बहुत ही अभिभूत होकर उनकी नसीहत सुनते हैं। सुनना भी चाहिए क्योंकि भाजपा के नेताओं से ज्यादा मुलायम सिंह के गरिमापूर्ण संसदीय आचरण के बारे में कौन जानता होगा। न मानो तो पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी से जाकर पूछ लो, जो विधानसभा अध्यक्ष के रूप में सदन के अंदर मुलायम सिंह का गरिमापूर्ण आदर एक बार प्राप्त कर चुके हैं।

मुलायम सिंह के भाषण पर 13 दिन की सरकार के विश्वासमत के समय अटल जी ने कहा था कि 40 वर्ष के अपने संसदीय जीवन में उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी कि ऐसे लोग भी इस सदन में आ जाएंगे। यह भी अपने आपमें मुलायम सिंह के संसदीय व्यवहार का अकल्पनीय प्रमाणपत्र है और रहेगा। इससे यह साबित होता है कि वास्तव में भारतीय मीडिया कितनी निष्पक्ष और व्यापक दृष्टिकोण वाली है। जिसकी वजह से अखिलेश स्टाइल की बजाय मुलायम-शिवपाल स्टाइल के लोकतंत्र को बचाने के लिए उसने पूरी कटिबद्धता खपा रखी है। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि अगर अखिलेश के नेतृत्व की बजाय मुलायम सिंह या शिवपाल के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव होने की स्थिति बनती तो भारत में लोकतंत्र के स्तर की ऐसी मिसाल कायम होती कि शायद पाकिस्तान के मुकाबले भी यह देश शर्मिंदा होने को अपने को मजबूर पाता तो कुछ आश्चर्य न होता।

यह तो अच्छा हुआ कि भाजपा के नेतृत्व को जल्दी समझदारी आ गई। पहले लग रहा था कि भाजपा सैफई परिवार में फूट का मजा उठाने के लिए मुलायम और शिवपाल को शह देगी। हालांकि इसकी कोई जरूरत होनी नहीं चाहिए थी। भाजपा को विधानसभा चुनाव में जितना प्रचंड बहुमत मिला है उसको देखते हुए इस पार्टी की जरूरत प्रतिपक्ष को षड्यंत्रों के माध्यम से पस्त करने की नहीं बल्कि अपनी पार्टी को नियंत्रित करने के लिए रचनात्मक प्रतिपक्ष को संरक्षण और प्रोत्साहन देने की है। प्रतिपक्ष का सफाया करके राजीव गांधी ने 1985 के चुनाव में न भूतो न भविष्यते बहुमत तो हासिल कर लिया था लेकिन यह स्थितियां अंततोगत्वा उन्हें भस्मासुरों से घेर देने का कारण साबित हुईं।

अखिलेश के नेतृत्व में प्रदेश में योगी सरकार के समक्ष कमोवेश स्वस्थ प्रतिपक्ष है। अगर शिवपाल में प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने का हौसला होता तो वे योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी करते न कि सेटिंग की गुंजाइश तलाशने के लिए योगी शरणं गच्छामि होते। पर योगी के सामने दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है की स्थितियां थीं। उन्होंने गौसेवा और व्रत के झांसे में प्रतीक और अपर्णा को लिफ्ट दी लेकिन पता चला कि वे दोनों गौसेवा की आड़ में नगर निगम की खरबों की 54 एकड़ जमीन को हथियाने का बंदोबस्त कर रहे हैं। योगी इसके बाद से सतर्क हैं। उन्होंने शिवपाल के आग्रह पर उनसे मुलाकात तो कर ली लेकिन यह मुलाकात केवल 10 मिनट में निपटा दी। जिससे उन्होंने जाहिर कर दिया कि उनके द्वारा शिवपाल को कोई लिफ्ट नहीं दी गई है। यही नहीं शिवपाल के जाते ही उन्होंने उनकी कमजोर नस गोमती रिवरफ्रंट के उनके चहेते अधिकारियों की करतूतों के खिलाफ हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आलोक सिंह की अध्यक्षता में जांच बैठाने का आदेश जारी कर दिया। उधऱ मथुरा के जवाहर बाग कांड की सुस्त पड़ी सीबीआई जांच भी एकाएक पूरी तरह हरकत में आ गई।

योगी के इन्हीं तेवरों को देखकर उनसे मिलने के बाद शिवपाल ने कहा कि वे भाजपा में शामिल न होकर समाजवादी विरासत की रक्षा करेंगे। जाहिर है कि शिवपाल भाजपा में शामिल होना भी चाहें तो यह काम तो तब हो सकता है जब भाजपा का नेतृत्व इसकी इजाजत दे। मुलायम सिंह ने कितनी भी तारीफ की हो लेकिन वे भी इस हकीकत को जानते हैं कि शिवपाल को कितना भाषण देना आता है और राजनैतिक मामलों में उनकी समझ कितनी पैनी है। ऐसा नहीं कि शिवपाल भी इस मामले में अपनी सलाहियत से अपरिचित हैं इसीलिए वे नेताजी यानी बड़े भैया को उनके कंधे पर बंदूक रखने के लिए आगे करना चाहते हैं। उन्होंने लगातार कहा है कि नेताजी हां कह दें तो पार्टी तो वे एक मिनट में खड़ी कर देंगे। उनकी चहेती मीडिया भी यही जाहिर कर रही है कि शिवपाल में इतना आकर्षण है कि वे जहां खड़े हो जाएंगे वहीं पर जनसैलाब उमड़ पड़ेगा। लेकिन अब नेताजी के बारे में भी जानिए, वे कितने भ्रातृप्रेमी हैं यह अमर सिंह से लेकर उनके सारे नजदीकी जानते हैं। अखिलेश के खिलाफ चाहे साधना गुप्ता जोर लगा लें या शिवपाल यादव, मुलायम सिंह किसी प्लेटफार्म की व्यवस्था करने वाले नहीं हैं। यह समाजवादी पार्टी और उसके सिंबल पर अधिकार की लड़ाई में उजागर हो चुका है कि पुत्र के लिए वे किसी को भी कितना गच्चा दे सकते हैं और आगे भी यही स्थितियां बरकरार रहेंगी।

Leave a comment

Recent posts