राजनीति कोई मुलायम सिंह से सीखे

समाजवादी पार्टी के भविष्य को लेकर मुलायम सिंह का पैंतरा गैरों के लिए कम उनके अपनों के लिए ज्यादा चौंकाने वाला होना चाहिए। उन्होंने नई पार्टी बनाने की अटकलों को जिस तरह से सिरे से खारिज किया है उससे अमर सिंह के बाद स्तब्ध होने की  बारी अब शिवपाल सिंह यादव की है, लेकिन उनकी कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया फिलहाल सामने नहीं आ पायी है। अंदरखाने क्या चल रहा है इसे लेकर पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन निश्चित रूप से शिवपाल सिंह को मुलायम सिंह के रुख से सांप जैसा सूंघ गया होगा। उनसे न निगलते बन पा रहा है न उगलते, इसी कारण शिवपाल नेताजी के बयान पर अपनी राय देने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।

मुलायम सिंह जब परिवार और पार्टी में झगड़ा शुरू हुआ था उस समय शिवपाल के पाले में खड़े होने का आभास देते रहे। कई बार उन्होंने उन मंचों पर जिन पर अखिलेश यादव भी मौजूद थे, कहा कि समाजवादी पार्टी को बनाने में शिवपाल का बहुत योगदान है। इसके बावजूद उनकी पार्टी के अंदर तौहीन की जा रही है। अगर यह सिलसिला जारी रहा और शिवपाल ने इसके कारण विद्रोह कर दिया तो कुर्सी पाकर जो लोग मतवाले हो गये हैं उन्हें अपनी हैसियत समझ में आ जाएगी। पार्टी के ज्यादातर लोग शिवपाल के साथ चले जाएंगे। यहां तक कि वे भी शिवपाल के साथ खुलेआम खड़े हो जाएंगे।

पंचायत चुनाव के बाद मुलायम सिंह के इस कटु बयान से सनसनी फैल गई थी। अपने ही पुत्र को नीचा दिखाने का इससे बड़ा कोई काम दूसरा नहीं हो सकता था। लेकिन इसके पीछे मुलायम सिंह की रणनीति थी या वाकई में शिवपाल के प्रति उनका हद से ज्यादा अनुराग, यह अभी भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। लेकिन मुलायम सिंह के ऐसे बयानों से गलतफहमी का शिकार होकर शिवपाल ने जो व्यूह रचनाएं कीं उनमें से कोई इसलिए कारगर नहीं हो पाईं क्योंकि मुलायम सिंह ने अपने बेटे के खिलाफ खड़े होने का कौल नहीं निभाया। मुलायम सिंह ने किसी पतंगबाज की तरह शिवपाल को ढील दी ताकि यह पता चल सके कि वे किस हद तक अखिलेश के खिलाफ उड़ सकते हैं। वे उनकी क्षमताओं को तौलते रहे और इंतजाम करते रहे कि उनकी ऊर्जा और शक्ति से अखिलेश के अनिष्ट की आशंका को किस तरह विफल किया जाए।

अखिलेश ने जब मुलायम सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर पार्टी की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी उस समय मचे घमासान में मुलायम सिंह ने यह जाहिर किया कि अब वे पिता-पुत्र का रिश्ता भूलकर अखिलेश से हर हाल में दो-दो हाथ करेंगे पर जो हुआ वह इस लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभा रहे अमर सिंह के लिए ठगे जाने जैसा अनुभव रहा। आज अमर सिंह बार-बार यही कह रहे हैं कि मुलायम सिंह ने सबको धोखा दिया। अपने बेटे को बढ़त देने के लिए उन्होंने उऩको और शिवपाल को इस्तेमाल करके कहीं का न छोड़ने का प्रयास किया।

ऐसा नहीं है कि अमर सिंह के इस आंकलन से शिवपाल सिंह अप्रभावित रहे हों। उन्हें भी नेताजी का खेल पहले ही समझ में आ गया होगा लेकिन उनकी मजबूरी यह है कि वे न तो राजनीति में मुलायम सिंह की तरह दूर की कौड़ी फेंकने वाला कोई कदम उठा सकते हैं और न ही वे थिंक टैंक हैं, न ही अच्छे वक्ता हैं। जो कि सार्वजनिक जीवन में अपना मजबूत नेतृत्व स्थापित करने के लिए बुनियादी अर्हता में शुमार है। इसलिए वे अखिलेश की बिमाता साधना का साथ लेकर आखिर में मुलायम सिंह के रुख को पलट पाने की झूठी आशा में फंसे रहे। जबकि उन्हें पता होना चाहिए था कि मुलायम सिंह कितने घाघ हैं। जिसकी वजह से वे हर चुनौती का काट कर जाएंगे।

यह शिवपाल का ही उकसावा था जिससे विधानसभा चुनाव के आखिरी चरण के मतदान के पहले साधना ने टीवी कैमरों के सामने आकर अखिलेश पर नेताजी का बहुत अपमान करने का आरोप लगाया और प्रतीक को राज्यसभा का सदस्य बनवाने व चुनाव बाद स्वयं राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने की इच्छा जाहिर की। साधना का मंतव्य इसके पीछे आखिरी चरण में अखिलेश की हवा खराब करने का था। यह तो हुआ भी लेकिन इससे भी आगे जाकर अखिलेश के लिए बड़ा खतरा यह नजर आ रहा था कि मुलायम सिंह पर साधना का जिस तरह प्रभाव हो चुका है उसके चलते वे अखिलेश से चुनाव बाद उग्र टकराव के लिए विवश हो जाएंगे। मुलायम सिंह इसे लेकर अखिलेश के खिलाफ बहुत तल्ख तो नहीं बोले लेकिन उन्होंने साधना को मुगालते में रखने के लिए संकेतों में उनकी बात का यदा-कदा समर्थन अवश्य किया।

इसी के चलते शिवपाल की गलतफहमी बढ़ती गई। उनकी दम को आजमाने के लिए मुलायम सिंह ने उनको जानबूझ कर योगी आदित्यनाथ से मिलने की छूट दी लेकिन जिस तरह से योगी ने उनसे बेहद संक्षिप्त और शुष्क मुलाकात की उससे मुलायम सिंह को निश्चिंत होने का मौका मिल गया। योगी ने इस मुलाकात में यह स्पष्ट कर दिया कि उन्हें शिवपाल में कोई दिलचस्पी नहीं है। इस तरह शिवपाल ने जान लिया था कि भाजपा में इंट्री की आशा करना उनके लिए फिजूल है। इसलिए वे नया पासा फेंकने के लिए इस बात का इंतजार कर रहे थे कि कब नेताजी अखिलेश पर निर्णायक हमला बोलते हुए नई पार्टी का ऐलान करके अपनी राजनीतिक विरासत उन्हें सौंपने की भूमिका तैयार करते हैं।

पर मुलायम सिंह ने शिवपाल के दिमाग की पूरी फिल्म ही रद्द कर दी। उन्होंने ऐलान कर दिया कि कोई नई पार्टी नहीं बनेगी और न ही वे फिर से समाजवादी पार्टी के फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे। यही नहीं वे समाजवादी पार्टी की नई सदस्यता भी इसके लिए चल रहे अभियान में लेंगे। साथ ही उन्होंने शिवपाल का भी ठेका ले लिया कि वे भी पार्टी और परिवार से अलग नहीं होंगे। अखिलेश के नेतृत्व वाली पार्टी में ही काम करेंगे।

शिवपाल ने कहा था कि समाजवादी पार्टी की हार अखिलेश के घमंड की वजह से हुई है लेकिन निर्णायक दौर में मुलायम सिंह ने अखिलेश को हार की जवाबदेही से एकदम बरी कर दिया। उन्होंने कहा कि 2007 में मायावती की लहर चली तो यूपी में उन्हें बहुमत मिल गया। इसके बाद 2012 में उनकी लहर चल गई जिससे समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल गया। अब मोदी की लहर की बारी थी इसलिए भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। इसमें अखिलेश या किसी का कोई दोष नहीं है।

इससे यह साफ है कि पारिवारिक कलह के चरमोत्कर्ष के समय अखिलेश ने जो यह कहा था कि उनकी राजनीति के एकमात्र स्वाभाविक उत्तराधिकारी वे हैं, उस पर मुलायम सिंह ने पूरी तरह मुहर लगा दी है। परिवार के अंदर पिछले एक पखवाड़े में ऐसा जरूर कुछ हुआ है जिससे साधना, प्रतीक और अपर्णा भी नया गुल खिलाने से बाज आने को मजबूर हुए हैं। अब शिवपाल को उन्होंने जबर्दस्ती अखिलेश के ही पीछे कर दिया है। शिवपाल इससे चाहे जितना कुढ़ें लेकिन उनके पास कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं है। मुलायम सिंह की अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाते समय ही यह इच्छा थी कि शिवपाल और आजम उनके मंत्रिमंडल में शामिल न होकर सरकार से बाहर रहते हुए उनके संरक्षक की भूमिका निभाएं पर उस समय यह बात न तो शिवपाल ने गवारा की थी न आजम ने। लेकिन अब मुलायम सिंह ने शिवपाल से वही करा दिया जो उनकी मर्जी के मुताबिक है।

मुलायम सिंह का अब अगला अभियान समाजवादी पार्टी के सरपरस्त की हैसियत से इस बात पर है कि अखिलेश की गठबंधन को लेकर जो चूकें हो रही हैं उन्हें अपने हस्तक्षेप से सुधारें और समाजवादी पार्टी की अखिलेश के नेतृत्व में मजबूत हैसियत के लिए स्थितियों को अग्रसर करें। उनकी चुनाव के पहले भी राय थी कि समाजवादी पार्टी को सीटें चाहे जितनी मिलें लेकिन उसे गठबंधन में किसी को सीट नहीं छोड़नी चाहिए। इससे उनकी पार्टी सभी जगह चुनाव लड़ेगी और हर जिले में उसका वर्चस्व बरकरार रहेगा। अखिलेश ने कांग्रेस से गठबंधन किया जिसमें 105 सीटें समाजवादी पार्टी को कांग्रेस के लिए छोड़नी पड़ीं। मुलायम सिंह का मानना है कि इससे जिन जगह समाजवादी पार्टी ने चुनाव लड़ने का अधिकार छोड़ा वहां उसके वजूद को धक्का लगा है। जिसका दूरगामी असर होगा। यह गलती दोबारा न हो इसलिए वे अखिलेश पर इस बात का पूरा प्रेशर बनाने पर आ गये हैं कि वे न केवल बसपा से किसी तरह के गठजोड़ से परहेज करें बल्कि कांग्रेस से भी अपने गठबंधन को रद्द कर दें।

मुलायम सिंह के लिए इस मामले में खुद के द्वारा अपनाई गई रणनीति मॉडल है। उन्होंने संयुक्त मोर्चा की बजाय समाजवादी पार्टी को आगे लाने के लिए कांग्रेस से एचडी देवगौड़ा की सरकार गिरवाने के लिए गोपनीय दुरभिसंधि की लेकिन कांग्रेस से किसी चुनावी तालमेल की रजामंदी उनके द्वारा नहीं की गई। वे चाहते हैं कि चुनाव के बाद कभी सरकार बनाने के लिए तालमेल करना पड़े तब तो गठबंधन ठीक है लेकिन चुनाव के दौरान गठबंधन करके कई स्थानों पर पार्टी को अदृश्य करना बिल्कुल भी मुनासिब नहीं है। मुलायम सिंह अखिलेश की हितचिंता के लिए जिस ईमानदारी से सामने आये हैं उससे अखिलेश को भी उनके सामने अब दबना पड़ेगा और उनके अनुभव पर आधारित फैसले को मानना पड़ेगा। इसलिए यूपी में महागठबंधन की सम्भावनाएं आकार लेने के पहले ही अस्त होती नजर आने लगी हैं। मुलायम सिंह ने प्रत्यक्ष तौर पर पार्टी में निर्णायक भूमिका से अपने को अलग करने की स्थिति स्वीकार की है लेकिन सही बात यह है कि औपचारिक अध्यक्ष न रहते हुए भी समाजवादी पार्टी का अब आगे का रास्ता वे इसी तरह की हैसियत के दखल के साथ खुद तय करेंगे। इसलिए मुलायम सिंह के अगले कदम को राजनीति के पंडित बहुत गौर से भांपने की कोशिश कर रहे हैं।

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