बसपा में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही हलचलें तेज हैं। पार्टी अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है। विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली सीटों की संख्या इतनी कम है कि अपने बूते न तो वह राज्यसभा में एक सीट जीत सकती है और न उत्तर प्रदेश की विधान परिषद में। लोकसभा चुनाव में उसका पहले ही पूरी तरह सफाया हो गया था। भाजपा की सरकार आने के बाद दलितों के साथ जो बर्ताव हो रहा है उसे देखते हुए दलित केंद्रित अलगाववादी मूवमेंट खत्म हो जाएगा, यह बात तो कोई नादान ही कह सकता है। सही बात यह है कि यूपी में ठाकुरपरस्ती की जड़ों को अगर और मजबूत किया गया तो दलित मूवमेंट इतना ताकतवर हो सकता है कि देश की राजनीति का नक्शा ही बदल दे पर इसमें संदेह है कि आने वाले समय में किसी आतिशी दलित मूवमेंट की अगुवाई के लिए बसपा पर भरोसा किया जा सकता है। स्थिति यह बन रही है कि दलित समाज अस्मिता की लड़ाई के लिए कोई नये शक्ति केंद्र का निर्माण कर लेंगे और बसपा का विसर्जन हो जाएगा।
बसपा की जिजीविषा की लड़ाई के इस दौर में मायावती द्वारा नसीमुद्दीन को पार्टी से अलग किया जाना सचमुच एक चौंकाने वाली घटना है। बसपा के बुंदेलखंड कोआर्डिनेटर नौशाद पर दलितों की ओर से अपने लिए वसूली कर पार्टी को पलीता लगाने के गम्भीर आरोप लगाये गये। फिर भी मायावती ने उनके कद में कोई कटौती नहीं की। अपने बेस वोट को नाराज करने का जोखिम मोल लेते हुए मायावती द्वारा नौशाद पर की जा रही मेहरबानी को लेकर यह दलील पेश की जा रही थी कि प्रदेश में जल्द ही स्थानीय निकाय के चुनाव होने वाले हैं। बसपा का उभार नारायणदत्त तिवारी सरकार द्वारा प्रदेश में 14 साल बाद कराये गये स्थानीय निकाय चुनाव की ही वजह से हुआ था। जिसमें बसपा ने नगर निकायों में चेयरमैन के लिए थोक के भाव मुसलमान उतारे थे। बसपा के उम्मीदवार भले ही बड़ी संख्या में न जीते हों लेकिन कांग्रेस की खाट खड़ी करते हुए नगरीय क्षेत्रों में बसपा ने राजनीतिक कुरुक्षेत्र में बड़े खिलाड़ी के रूप में अपना प्रस्तुतिकरण करके सनसनी फैला दी थी। जाहिर है कि बसपा के इस इतिहास को देखते हुए मायावती पार्टी के रिवाइवल के लिए एक बार फिर स्थानीय निकाय चुनाव पर गौर रखें और इन चुनावों के संपन्न न हो जाने तक मुसलमानों के मन में पार्टी के लिए कोई दुराव पैदा न होने दें। तो जब स्थिति यह हो ऐसे में नौशाद अली को भी नगर निकाय चुनाव तक पार्टी को सहन करना है और नसीमुद्दीन के बारे में तो कोई इफ-बट था ही नहीं कि उनकी हैसियत में मायावती कोई घटोत्तरी करने की सोच भी सकती हैं।
इसलिए जब मायावती ने उन्हें और उनके पुत्र अफजल को बसपा से बाहर का रास्ता दिखाने का ऐलान सतीश मिश्रा के जरिये करवाया तो भूचाल आ गया। इसके कारणों की पड़ताल के लिए मीडिया के सारे लालबुझक्कड़ मैदान में कूद पड़े। किसी ने यह कहा कि मायावती ने यह कदम इसलिए उठाया है कि उन्होंने अपने भाई आनंद को अपने उत्तराधिकारी के रूप में तराशना शुरू कर दिया है। जिसमें नसीमुद्दीन बड़ी बाधा साबित हो सकते थे। मायावती ने उनको बसपा में नंबर दो की हैसियत पर स्थापित कर रखा था। एक दशक में नसीमुद्दीन के न चाहने की वजह से मायावती ने बसपा के दद्दू प्रसाद और बाबूसिंह कुशवाहा जैसे सितारों को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। इससे बसपा में उनका मजबूत दबदबा बन गया था और जिसके रहते आनंद की उतनी मजबूती से स्वीकार्यता संदिग्ध थी। तो मायावती ने सोचा कि नसीमुद्दीन को बाहर करके आनंद का रास्ता क्लियर करा दिया जाए।
कुछ लाल बुझक्कड़ों ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित समाज ने नसीमुद्दीन के रवैये के खिलाफ बगावत कर दी थी। जिसकी वजह से मायावती को उन्हें निकालने का कड़ा फैसला लेना पड़ा। लेकिन इसके जवाब में नसीमुद्दीन ने जो किया उससे यह साबित हो गया कि यह सारी अटकलें बेमानी हैं। मायावती की छत्रछाया में बसपा का इतिहास ऐसा बन चुका है कि उसमें जो भी तूफान आता है उसकी वजह रुपया होता है। जबकि कांशीराम हमेशा थ्री-एम से पार्टी लोकतंत्र को बचाने की अपील करते थे। जिसमें एक एम मनी का भी था क्योंकि उनका मानना था कि जब तक थ्री-एम का प्रभाव नहीं घटेगा तब तक संख्या बल में अधिक होने के बावजूद दलित-शोषित तबका राजनीति में अपनी स्थिति को मजबूत नहीं कर पायेगा।
नसीमुद्दीन ने मायावती से हुई टेलीफोनिक वार्ता के आडियो सार्वजनिक किए, जिनके माध्यम से उन्होंने जताया कि मायावती की उनसे 50 करोड़ रुपये की मांग थी। इसके लिए काफी समय से उनका उत्पीड़न किया जा रहा था। मायावती ने भी माना कि मेंबरशिप की हिसाब न देने की वजह से नसीमुद्दीन से वे बेहद नाराज थीं। उन्होंने कई बार नसीमुद्दीन को बुलवाया लेकिन वे कतरा रहे थे। नसीमुद्दीन मायावती से मोबाइल या टेलीफोन पर बातचीत को टेप करा सकते हैं, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लेकिन उन्होंने ऐसा किया जिससे यह जाहिर है कि उनका निष्कासन अचानक नहीं हुआ। काफी समय से उन्हें लेकर बसपा में कुछ ऐसा चल रहा था जिससे बतौर पेशबंदी वे मायावती के खिलाफ सुबूत इकट्ठा करने में जुट पड़े।
नसीमुद्दीन ने केवल 50 करोड़ रुपये का विवाद जताया है। उन्होंने कहा कि वे अपनी सारी जमीन-जायदाद बेच दें तब भी मायावती के इस तगादे को चुकता नहीं कर सकते थे। लेकिन उनकी इस बात पर शायद ही कोई विश्वास करे। जनमानस में उन्हें हजारों करोड़ रुपये का आदमी आंका जाता है। उनके बारे में जनमानस यह भी भरोसा करता है कि मायावती से सिर्फ 50 करोड़ रुपये के लिए उनकी अदावत नहीं हो सकती थी। ऐसे में यह तो स्पष्ट है कि नसीमुद्दीन की बसपा में उलटी गिनती का कारण हिसाब-किताब ही बना लेकिन हिसाब-किताब 50 करोड़ से बहुत ज्यादा का है। इसमें भी कोई दोराय नहीं है।
कहा यह जा रहा है कि नोटबंदी के दौरान हजारों करोड़ रुपये के नोट जिलों-जिलों में कार्यकर्ताओं से एक्सचेंज कराने का जिम्मा नसीमुद्दीन को सौंपा गया था। इसके बाद नसीमुद्दीन की नीयत बिगड़ी या जिन लोगों को पैसा दिया गया था उनके मन मे बेईमानी आ गयी जो भी हो पर बसपा के खजाने में बहुत बड़े एमाउंट की वापसी न हो पाने से मायावती बौखलाई हुई थीं। इसलिए उन्होंने गुस्से में नसीमुद्दीन को लेकर निर्णायक कदम उठा डाला।
नसीमुद्दीन अब बड़े-बड़े खुलासों की बात कर रहे हैं। उन्होंने पहले दिन कहा कि मायावती उऩकी हत्या करा सकती हैं। उन्होंने ऐसी शख्सियत की हत्या कराई कि अगर वे मुंह खोल दें तो राजनीति में तूफान बरपा हो जाएगा। लेकिन नसीमुद्दीन इसके बाद अपने तेवरों में उतना बागी पुट सहेजे रखने में नाकाम साबित हो रे हैं। इसकी दो वजह हो सकती हैं। एक तो यह कि वे चाहते हों कि मायावती डरकर जो हुआ सो हुआ मानकर हिसाब-किताब को भूल जाएँ और उन्हें यथावत अपना लें। या मायावती में सचमुच ऐसा है जो उन्हें आगा-पीछा सोचना पड़ रहा हो। इसलिए वे केवल आत्मरक्षा तक सीमित रहना चाहते हों। उनसे एक अखबार ने दीनानाथ भास्कर द्वारा मायावती पर उनकी एक बेटी होने का आरोप लगाने के बारे में पूछा था तो उन्होंने कहा कि वे किसी की निजी जिंदगी में नहीं जाना चाहते। स्पष्ट है कि मायावती से वे सिर्फ राजनीतिक लड़ाई लड़ना चाहते हैं लेकिन वे मायावती के विरोध का निजी लड़ाई के रूप में प्रस्तुतिकरण न होने देने के लिए सतर्क हैं। इसके पीछे या तो उनके मिशनरी संस्कार हो सकते हैं या फिर देश-प्रदेश की राजनीति में भाजपा के खिलाफ होने वाले ध्रुवीकरण में मायावती की संभावित महत्वपूर्ण भूमिका का आंकलन करके वे अपने पत्ते खेल रहे हैं।
नसीमुद्दीन ने अपनी सुरक्षा के लिए मुख्यमंत्री योगी से मिलने की बात कही है। लेकिन उन्हें मालूम है कि योगी उनको बिल्कुल भी एडजस्ट नहीं कर पाएंगे। इस समय क्षत्रिय अस्मिता पर चोट करने वाले एक-एक शख्स को सबक सिखाने में कसर नहीं छोड़ी जा रही। गायत्री प्रसाद प्रजापति ने अमेठी घराने को नीचा दिखाने की हिमाकत की थी इसलिए रेप मामले में जेल से बाहर निकलने की उनकी सारी तिकड़में बेकार करा दी गईं। निश्चित रूप से अब गायत्री प्रसाद प्रजापति और अन्य लोगों को पता चल गया होगा कि राजघरानों को लेकर बड़ा बोल बोलने का नतीजा क्या होता है। नसीमुद्दीन ने भी स्वाति सिंह के मामले में ऐसा ही कुफ्र किया है इसलिए उन्हें माफी कैसे सम्भव है। हालांकि स्वाति सिंह अब अपने मामले में मायावती को नामजद करने की बात कहकर उन पर मलहम लगा रही हैं। लेकिन सीएम साहब ढीले पड़ जाएंगे इसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं है। इसके चलते नसीमुद्दीन को अपना ठौर तो भाजपा विरोधी खेमे में ही तलाशना पड़ेगा।
नसीमुद्दीन ने मायावती पर मुसलमानों को अपमानित करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा है कि उन्होंने दाढ़ी वाले मुसलमानों के लिए बहुत भला-बुरा कहा। कहा होगा लेकिन अगर मायावती उन्हें नहीं निकालतीं तो उनको तो यह सुन ही लेना था। जब उनका किरदार यह है तो मुसलमान उन्हें कौम का हीरो तो मानेंगे नहीं। नसीमुद्दीन का यह रहस्योद्घाटन इसलिए बचकाना है कि जब उन्होंने विधानसभा के 2002 के चुनाव में एक जगह यह कह दिया था कि इस बार उनकी पार्टी मुसलमानों को 125 टिकट देगी और इसके बाद मायावती ने उनकी दुर्गति कर दी थी। फिर भी उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा था। क्योंकि उनके सामने तो आखिरी तक न मौं को और न तौं को ठौर वाली हालत रही थी। फिर मायावती ने तो विधानसभा चुनाव में अपेक्षित मुस्लिम समर्थन न मिलने की भड़ास मंच से यूपी को पाकिस्तान न बनने देने का ऐलान करके निकाल ही दी थी। तब नसीमुद्दीन का खून क्यों नहीं खौला था।
मायावती ने इसके बाद अपने को संभाला तो उसकी वजह स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर उन्हें समझाया गया गणित है। नसीमुद्दीन मारा गया ब्रह्मचारी की हालत में हैं। मुसलमानों के नेता न तो कल थे और न आज बन पा रहे। उन्हें और लोग भी पसंद नहीं करते क्योंकि बसपा में साहब कल्चर इतना प्रचंड तरीके से पनपा कि हर साहब लोगों की निगाह में विलेन बन गया। कांशीराम का बोलचाल अक्खड़ था लेकिन साहब इसलिए चल जाते थे क्योंकि अपने लोगों के लिए वे लड़ने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते थे। पर कार्यकर्ताओं और आम लोगों से नौकरों की तरह पेश आने का अंदाज चाहे वह दद्दू प्रसाद का रहा हो या नसीमुद्दीन का, लोगों को कभी गंवारा नहीं हुआ। इसलिए लोगों की हमदर्दी नसीमुद्दीन हासिल कर पाएंगे इसकी कोई गुंजाइश नहीं है। मायावती ने नसीमुद्दीन की भरपाई के लिए अनीस अहमद उर्फ फूलबाबू की बसपा में वापसी करा ली है। पार्टी में शामिल होते ही उन्होंने नसीमुद्दीन पर जमकर जहर बुझे तीर चलाये। नसीमुद्दीन जो मुसलमानों में बसपा का नुकसान करने की कोशिश कर रहे हैं उसके डैमेज कंट्रोल के लिए मायावती द्वारा ऐसे कदम उठाना लाजिमी था। इस बीच मायावती लालजी वर्मा को विधानसभा में पार्टी नेता बना चुकी हैं जबकि उन्होंने नसीमुद्दीन की जगह सुनील कुमार चित्तौड़ को विधान परिषद में पार्टी का नेता बना दिया है।
सर्वजन से बहुजन की ओर मायावती फिर सरपट भागने की कोशिश कर रही हैं। दूसरी ओर सतीश मिश्रा पर मिशन को बर्बाद करने का आरोप लगाकर नसीमुद्दीन अलग पैंतरेबाजी कर रहे हैं। लेकिन सही बात यह है कि मायावती न तो मुसलमान और किसी अन्य की विरोधी हैं न वफादार। कोई भी मूवमेंट तब कामयाब होता है जब उसको चलाने वाले लोग अपने से ज्यादा लक्ष्य के लिए समर्पित रहें। भाजपा इसलिए आगे बढ़ी क्योंकि पर्दे के पीछे उसे संचालित करने वाले आरएसएस ने यह ख्वाहिश नहीं पाली कि अमुक व्यक्ति भले ही संघ की बागडोर किसी भी हद तक उसके हाथ में हो उसके वर्चस्व को सबसे महत्वपूर्ण माना जाये। इस माहौल के चलते ही लालकृष्ण आडवाणी अचानक प्रधानमंत्री पद की दौड़ में बाईपास कर दिये गये। फिर भी पार्टी में कोई बड़ी उथल-पुथल नहीं हुई। खुद आडवाणी ने अलग कोई झंडा नहीं गाड़ा। दूसरी ओर बसपा में मायावती के लिए मिशन नहीं अपना झंडा सबसे महत्वपूर्ण रहा इसलिए उन्होंने सारे विकल्प खोले रखे। अपने वर्चस्व के लिए उन्हें बहुजन को किनारे करके सर्वजन के नाम पर वर्ण व्यवस्था वादी ताकतों को प्रमुखता देने की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने कोई परहेज नहीं किया। इसी तरह की उनकी दृष्टि मुसलमानों को लेकर रही। नसीमुद्दीन अपने मन में खुद को अंग्रेजी का संसार का सबसे बड़ा विद्वान मानते हैं लेकिन सही बात यह है कि उनमें कोई बौद्धिक प्रतिभा नहीं है। दलित-मुस्लिम समीकरण को मजबूती प्रदान करने वाला बहुजन समाज पार्टी में सबसे बड़ा कोई शख्स था तो आरिफ मुहम्मद खान लेकिन मायावती ने उन्हें भी धकिया कर एक ओर कर दिया।
मायावती को किसी आइडियोलाजी की जरूरत है ही नहीं और इसके बावजूद वे कामयाब रही हैं तो उनका आत्मविश्वास तब तक बुलंद रहना लाजिमी है जब तक कि वे अपनी सारी कामयाबियों को बेतुके फैसलों से दफन नहीं कर लेंगी। आज भी वे नीतियों और प्रतिबद्धता के स्तर पर बहुत ईमानदारी से काम करने के मूड में नहीं हैं। लेकिन दूसरी ओर बहुजन मूवमेंट के लिए भाजपा की सरकार रहते हुए जितनी उर्वरा जमीन तैयार होती जा रही है उतनी शायद कभी न रही होगी। यूपी में दलितों के साथ जो हो रहा है उससे उनकी आंखें खुलती जा रही हैं जबकि वे भी हिंदुत्व के मोहपाश में जकड़ गये थे। संघप्रिय गौतम हों या उदित राज, सहारनपुर के जातीय दंगों से निपटने की राज्य सरकार की कार्रवाई को लेकर अंदर ही अंदर बहुत घुटन महसूस कर रहे हैं। इस माहौल में भाजपा में काम करने वाले दलित नेताओं को इतिहास के कूड़ेदान में जाना होगा। इसकी बजाय बहुजन मूवमेंट को ऊर्जा देने वाले नये चेहरे सामने आ सकते हैं। यह चेहरे कौन होंगे। नये बहुजन मूवमेंट की प्रसव पीड़ा से गुजर रहे तबकों की आंखों को इसके लिए पढ़ने की जरूरत है जिनकी निगाह मायावती और नसीमुद्दीन से कहीं बहुत दूर तक आसमान टटोल रही है।








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