सहारनपुर में असाध्य बनता जा रहा जातीय दंगा योगी सरकार की वर्ण व्यवस्थावादी दृष्टि का परिणाम है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने पहले नौकरशाही की मनमानी को बल देने की नीति अपनायी थी, जिसके तहत वे एक ही बात कह रहे थे कि उनकी पार्टी के सांसद और विधायकों की राजनीतिक दखलंदाजी भी प्रशासन में सहन नहीं की जाएगी। गोरखपुर में भाजपा के कई बार के ईमानदार छवि वाले विधायक राधामोहन अग्रवाल और ट्रेनी आईपीएस चारू निगम के बीच जो झगड़ा हुआ उसे मीडिया ने भले ही किसी रूप में प्रचारित किया हो लेकिन पारस्थितिक साक्ष्य राधामोहन अग्रवाल को सही ठहरा रहे थे। फिर राधमोहन अग्रवाल की प्रकृति-प्रवृत्ति क्या है, इसे योगी तो बहुत बेहतर जानते हैं। इसके बावजूद उन्होंने राधामोहन अग्रवाल को ही चेताने का काम किया। नौकरशाही के हौसले इससे और बुलंद हुए।
मायावती और मुलायम सिंह या अखिलेश की सरकार में सत्तारूढ़ पार्टी के अदने से कार्यकर्ता बड़े से बड़े नौकरशाहों का भीषण मान-मर्दन करते थे। फिर भी किसी आईएएस, आईपीएस एसोसिएशन की हिम्मत नहीं होती थी कि वह सरकार के खिलाफ आवाज उठा सके। गोरखपुर के मामले में आईपीएस एसोसिएशन ने जिस तरह अपना कोप दिखाया उससे सरकार की हनक जनमानस के बीच तार-तार सी नजर आयी। बलिया में भी भाजपा के ही विधायक को नौकरशाही की मनमानी के खिलाफ धरने पर बैठना पड़ा। योगी के प्रवचनों से कमोवेश कल्याण सिंह के पहले राज जैसी स्थिति प्रदेश में पैदा हो गई। नेताओं का अंकुश न रह जाने से नौकरशाही ने आम लोगों के प्रति जवाबदेही की भावना को भुलाकर रख दिया। अधिकारियों ने यह मान लिया था कि सीएम योगी उनके खिलाफ शिकायतों पर आसानी से कोई कार्रवाई करना तो दूर उनका तबादला तक नहीं करेंगे और इस तरह की उनकी धारणा गलत भी नहीं थी।
लेकिन नौकरशाही को पूर्ण अभयदान का वचन तोड़कर सीएम योगी ने सहारनपुर के डीएम, एसएसपी को दंगे नियंत्रित करने में नाकाम रहने पर निलंबित कर दिया जिससे पता चलता है कि सहारनपुर की स्थिति ने सीएम को किस कदर विचलित कर दिया है। लेकिन सहारनपुर के मामले में गलती अधिकारियों की उतनी नहीं रही जितनी खुद सीएम योगी की है। अधिकारियों को तो सरकार की मंशा के मुताबिक काम करना पड़ता है और योगी सरकार पहले ही दिन से सहारनपुर के दंगों को लेकर एकतरफा नीति का परिचय दे रही है इसलिए सहारनपुर का बवाल अधिकारियों के निलंबन मात्र और अंधाधुंध गिरफ्तारियों से समाप्त होने वाला नहीं है। सीएम योगी को अपनी सरकार के प्रति दलितों में भरोसा जगाने के लिए कार्ययोजना को सामने लाना पड़ेगा। अन्यथा पूरे प्रदेश में दलित अलगाववादी रुख अख्तियार करने के अंजाम पर पहुंच जाएंगे जो राष्ट्रीय और सामाजिक हित की दृष्टि से बहुत खतरनाक होगा।
अधिकारियों की नियुक्ति में जिस तरह से दलितों को हाशिये पर रखा गया है उससे सरकार की मानसिकता अपने आप उजागर हो जाती है। प्रदेश में गृह सचिव सवर्ण, डीजीपी सवर्ण, एडीजी लॉ एंड आर्डर सवर्ण और सहारनपुर में नये भेजे गये डीएम, एसएसपी भी सवर्ण, यह क्या हो रहा है। इस तरह की स्थिति सिर्फ सहारनपुर और डीजीपी दफ्तर की नहीं है। जिलों से लेकर थानों तक की पोस्टिंग में दलितों का प्रतिनिधित्व न्यूनतम कर दिया गया है क्योंकि वर्ण व्यवस्था मानती है कि दलितों और शूद्रों को महत्वपूर्ण पद देना अधार्मिक है लेकिन गोरखनाथ पीठ का तो नजरिया इस तरह की नहीं रहा। भाजपा में अभी तक यह होता था कि मुसलमान संवेदनशील पदों के लिए भरोसेमंद नहीं माने जाते थे लेकिन आज तो दलितों के प्रति भी ऐसा ही रुख डटाया गया है।
वर्ण व्यवस्थावादी मानसिकता में यह बात कूट-कूट कर भरी है कि दलितों में योग्यता-क्षमता नहीं होती और उनको जिम्मेदार भी नहीं माना जा सकता। दलित क्या समूचे शूद्रों के लिए वर्ण व्यवस्था की मानसिकता इसी भावना से ग्रसित है जबकि सच्चाई इसके मुताबिक नहीं है। भ्रष्ट और निकम्मे अफसर सवर्णों में भी कम नहीं होते और दलितों में बृजलाल जैसे तमाम पुलिस अधिकारी ऐसे हैं जिन पर भारतीय पुलिस सेवा संवर्ग को गर्व है। हुनरमंद होने की वजह से ही स्व. कालका प्रसाद को इंदिरा गांधी ने चार साल तक अपने निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में डीएम के रूप में पदस्थ रखा। दलितों में बेहतर योग्यता रखने वाले अफसरों में इक्का-दुक्का नाम नहीं हैं बल्कि एक लंबी फेहरिस्त है इसलिए रातोंरात दलितों और ओबीसी के अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों से किनारा कर देने की नीति मान्य नहीं की जा सकती।
सबसे बड़ी बात यह है कि राष्ट्रीय हित के लिए सामाजिक एकता का मजबूत होना सबसे पहली शर्त है। इस कारण प्रशासन में सभी जातियों, वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जानी चाहिए। कांग्रेस के समय हेमवती नंदन बहुगुणा खालिस ब्राह्मण नेता थे लेकिन उन्होंने ही मुख्यमंत्री रहते हुए यह व्यवस्था लागू कराई थी कि प्रदेश के प्रत्येक जिले में डीएम और पुलिस प्रमुख में से एक पद पर दलित अधिकारी नियुक्त किया जाएगा। स्व. वीरबहादुर सिंह ने दलितों का दुराव खत्म करने के लिए सचिवालय के तमाम महत्वपूर्ण पदों पर दलित अधिकारी नियुक्त किए थे। बामसेफ को उत्तर प्रदेश में खड़ा करने वाले माताप्रसाद को स्व. वीरबहादुर सिंह ने ही महत्वपूर्ण पोस्टिंग देकर लाइमलाइट में खड़ा किया था और माताप्रसाद की प्रशासनिक काबिलियत की जब तक वे नौकरी में रहे कोई सरकार रही हो तारीफ करती रही, कायल रही।
केंद्र में भाजपा की सत्ता के आने के बाद ही सोशल मीडिया पर जिस तरह के उद्गार आरक्षण और दलितों व ओबीसी के समुचित प्रतिनिधित्व के मामले में सामने आने लगे थे तभी यह एहसास हो गया था कि पार्टी ने अगर स्थिति नहीं संभाली तो दमन की मानसिकता से प्रेरित जातीय अहंकार के विषधर फुफकार उठेंगे। शुरू में पीएम नरेंद्र मोदी ने भी इस ओर उदासीनता का भाव रखा। जब उन पर आरोप लगा कि राज्यपालों में उन्होंने एक भी दलित को प्रतिनिधित्व देने की जरूरत नहीं समझी है तो उन्होंने रामनाथ कोविद को बिहार का राज्यपाल बनाकर कोटा पूरा दिखाने की कोशिश की। लेकिन दलितों के प्रति उपेक्षा के भाव को बाद में उन्होंने एक चूक के रूप में संज्ञान में लिया। इसलिए अपनी हर सभा में बाबा साहब अंबेडकर के प्रति श्रद्धा निवेदन शुरू करके उन्होंने इसमें बेहतरीन डैमेज कंट्रोल का परिचय दिया। उन्होंने हर सभा में यह भी पूरे बल के साथ ऐलान किया कि जब तक सामाजिक भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता तब तक दलितों और ओबीसी का आरक्षण खत्म नहीं होगा। दलितों और ओबीसी के लिए प्रतिबद्धता को उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में संघ की सहमति से उन्होंने अपने एजेंडे में सबसे ऊपर रखा और इसी नीति की वजह से भाजपा को अभूतपूर्व कामयाबी मिली।
सही बात यह है कि भाजपा को उत्तर प्रदेश में मिली इतनी जबर्दस्त सफलता में योगी का योगदान न के बराबर है। मोदी और केशव प्रसाद मौर्य के चेहरे ने बहुसंख्यक मतदाताओं के भाजपा की ओर ध्रुवीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। मायावती की बिरादरी के वोटर की निष्ठा उनके प्रति अटूट मानी जाती थी लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा के हालिया चुनाव में भाजपा ने इस मिथक को तोड़ दिया। मायावती की बिरादरी तक के वोट बड़ी संख्या में भाजपा को मिले।
लेकिन भाजपा की यह मजबूत किलाबंदी अब ढहती नजर आने लगी है जब केशव प्रसाद मौर्य को पीछे करके योगी को मुख्यमंत्री बनाया गया था तभी बहुजन समाज कहीं न कहीं संदिग्ध भावना में घिरने लगा था लेकिन नया-नया मामला होने से इसे ज्यादा तूल नहीं मिला। योगी की ईमानदारी और सादगी का जादू एक महीने तक ऐसा सिर पर चढ़कर बोला कि टीवी चैनलों की टीआरपी में मोदी का परचम भी नीचे झुक आया। इस कारण यह अनुमान बिल्कुल नहीं था कि इतनी जल्दी योगी की उलटी गिनती शुरू हो जाएगी। सबसे पहले योगी ने स्वच्छता पर इतना जोर दिया कि लगा कि पता नहीं उत्तर प्रदेश उनके राज में स्वर्ग से भी सुंदर प्रदेश न बन जाये। योगी थाने में भी गये तो अपराध नियंत्रण की स्थिति को परखने की बजाय सफाई देखने में ही जुटे रहे। लेकिन सफाई का भूत इतनी जल्दी उतर जाएगा यह उम्मीद नहीं थी। आज तो प्रदेश में सड़कें और गलियां भी साफ होना पूरी तरह बंद हो गई हैं।
योगी के हर संकल्प का ऐसा ही हश्र नजर आ रहा है। सुधार का जोश दूध के उफान की तरह मचलता है जो कुछ ही देर में ठंडा पड़ जाता है। योगी को अपने ही कार्यक्रमों का फालोअप भूल जाने की आदत पड़ गई है। इसीलिए सफाई से लेकर उनका कोई कार्यक्रम तार्किक परिणति पर नहीं पहुंच पा रहा। उन्होंने अपने मंत्रियों और अधिकारियों से परिसम्पत्तियों का आय का ब्यौरा मांगा तो ज्यादातर ने उनको ठेंगा दिखा दिया। उनकी इतनी अवज्ञा के बाद योगी भड़कते बजाय इसके उनकी इस मुद्दे पर बोलती बंद हो गई है। सबसे बुरी स्थिति अपराध नियंत्रण के मोर्चे पर है। इतना क्राइम तो अखिलेश सरकार में नहीं जितना अब हो रहा है। जब आप थानों में जाकर अपराध नियंत्रण के बारे में पूछताछ करने की बजाय सफाई परखने के लिए शौचालय देखने पहुंच जाएंगे तो यह तो होगा ही।
स्लाटर हाउस बंद कराने और एंटी रोमियो अभियान चलाने के उनके कदम भले ही गलत नहीं थे लेकिन समग्र अपराध नियंत्रण की प्राथमिकताओं में यह बिंदु काफी नीचे आते हैं। निर्धारित मानकों के अनुसार प्राथमिकताएं निर्धारित न करने की वजह से पुलिस की कार्यप्रणाली अस्त-व्यस्त हो गई और इसका नतीजा बढ़ते अपराधों के रूप में देखने में सामने आ रहा है। उससे ज्यादा बदतर और बात यह है कि जिलों-जिलों में वारदातों के फर्जी वर्कआउट में माहिर अधिकारी अपना खेल दिखाकर मीडिया में तात्कालिक रूप से सरकार की फेससेविंग भले ही कर देतेे हों लेकिन खूंखार अपराध करने वाले बड़े अपराधी किसी और को बलि का बकरा बनाये जाने से जब अपने को बचा महसूस करते हैं तो और ज्यादा वारदातें बढ़ जाती हैं।
योगी इस वस विसंगति को पकड़ पाने में अक्षम हैं। कोढ़ मे खाज का नाम उनकी बहुजन के साथ प्रशासनिक तैनाती में भेदभाव की नीति कर रही है। बहुजन को दोयम नागरिक मानने की यह भावना केवल एक क्षेत्र और एक बिंदु तक सीमित नहीं है। इसका समग्र परिणाम यह है कि प्रदेश में बहुजन अपने को बेगाना महसूस करने लगा है। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ की दृष्ट योगी की इस नादानी पर जरूर होगी और आगे चलकर उनके द्वारा इसका कोई उपचार जरूर सामने आयेगा। दूसरी ओर योगी सरकार अभी भी सहारनपुर की वस्तुस्थिति से आंख मिलाने की बजय अविश्वसनीय तिकड़में अपने बचाव के लिए करने में लगी है।
झांसी आये उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि सहारनपुर जाकर मायावती ने लोगों को उकसाने का कार्य किया इसलिए नये सिरे से दंगे भड़के जबकि मायावती की हालत सहारनपुर में यह थी कि वे हलुवा मिले न माड़े दोऊ दीन गये पांड़े की स्थिति का निर्वाह कर रही थीं। उन्होंने पूरा ध्यान रखा कि क्षत्रिय समाज की भावनाओं को उनके किसी बोल से चोट न लगे क्योंकि वे मानती हैं कि दलित तो उन्हें छोड़कर कहां जाएंगे इसलिए बोनस में मिलने वाले क्षत्रिय समाज के समर्थन को बरकरार बनाये रखने की पूरी मशक्कत उन्होंने अपने भाषण में की। कहा कि प्रशासन अगर अंबेडकर प्रतिमा स्थापित करने और महाराणा प्रताप जयंती का जुलूस निकालने की अनुमति दे देता तो जातिगत टकराव न होता। इसमें भड़काने की बात कहां से आ गई।
इससे एक कदम और आगे बढ़ाते हुए गुरुवार को उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र को एक रिपोर्ट भेजी कि भीम आर्मी का मायावती के भाई आनंद कुमार से कनेक्शन है। इससे ज्यादा सफेद झूठ क्या हो सकता है। मायावती सबसे ज्यादा तो इस बात से सतर्क रहती हैं कि दलितों में कोई उनके समानांतर खड़ा न हो पाये इसलिए उन जैसी एकाधिकारवादी नेता अपने भाई को भीम आर्मी खड़ी करवाकर चंद्रशेखर को नेता बनाने की इजाजत दे सकती हैं, यह बात रंचमात्र भी विश्वास करने के काबिल नहीं है।
इस तरह की हरकतों से यह साफ जाहिर हो जाता है कि योगी सरकार के पास राजनीतिक दृष्टि का अभाव है, जिसके कारण उनके सीएम रहते सहारनपुर मसले का समाधान बहुत ही मुश्किल है। संघ को इसे देखते हुए हस्तक्षेप करना पड़ेगा। दलितों व अन्य शूद्रों को समानता का अवसर देने को लेकर सवर्णों की नकारात्मक प्रतिक्रिया को कैसे समाप्त किया जाए और उनके मन में शोषित-उपेक्षित रहे बहुजनों के प्रति मानवीय आधार पर हमदर्दी का भाव कैसे जगाया जाये, यह एक बड़ी चुनौती है। लेकिन सवर्ण संगठन की पहचान होने के बाजूद हाल के दशकों में संघ ने इस पर बेहतर काम किया है इसलिए उम्मीद है कि इस मामले में उसके द्वारा सार्थक भूमिका अदा की जा सकती है। बुद्धिजीवी समाज के लिए यह मौका किसी पार्टी या वर्ग-जाति को कोसने का नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गों को एक-दूसरे के नजदीक लाने के प्रयासों पर चिंतन करने का है और इसमें संघ उसका सबसे बड़ा संबल है।







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