उरई। उरई रेलवे स्टेशन पर पिछले कई महीनों से चोरों तथा जेबकतरों का गिरोह सक्रिय है। जो आए दिन किसी न किसी वारदात को अंजाम दे देता है। जबकि जीआरपी का आलम यह है कि केस की धाराएं कमतर करके मुकदमा लिखती है। उधर चलती ट्रेन में चोरी करने वाले एक चोर गिरोह को जीआरपी पुलिस ने ले देकर छोड़ दिया था।
पहली घटना 16 मई की है। झांसी निवासी दंपत्ति एसके सिंह अपनी पत्नी श्रीमती सीमा सिंह के साथ झांसी कानपुर पैसेंजर से पुखरायां जा रहे थे। मोंठ स्टेशन पर बैग से लगभग ढाई लाख के सोने चांदी के गहने पार कर दिए। जब चोरों का गिरोह भागने लगा तो दंपत्ति ने यात्रियों की मदद से दो चोरों को पकडक़र जीआरपी उरई के हवाले कर दिया। जबकि इस गिरोह का तीसरा सदस्य 21 हजार रुपए लेकर फरार हो गया। जीआरपी ने उन दो पकड़े गए चोरों से ढाई लाख के जेवर बरामद कर पीडि़त दंपत्ति को दे दिया था। लेकिन दोनों चोरों को न तो जेल भेजा गया। न ही इस मामले की एफआईआर दर्ज की गई। जबकि 21 हजार लेकर फरार होने वाले तीसरे चोर को अब तक जीआरपी नहीं पकड़ पाई है। उधर पकड़े गए दोनों चोरों को जीआरपी ने क्यों छोड़ दिया। यह अब तक अज्ञात है।
इसी तरह पत्रकार अचल शर्मा 30 मई को उरई रेलवे स्टेशन से गोरखपुर पनवेल एक्सप्रेस से शाम लगभग सात बजे झांसी जा रहे थे। जैसे ही वह जनरल बोगी के पायदान पर चढऩे लगे। तभी जेबकतरों के गिरोह के लगभग चार सदस्य उनके पीछे कृत्रिम यात्री बनकर उसी बोगी में चढऩे का नाटक करने लगे और उनकी पेंट की जेब से ओप्पो का मोबाइल चुरा लिया। श्री शर्मा ने बोगी के अंदर घुसकर मोबाइल देखा तो वह गायब था। पत्रकार अचल शर्मा ने मोबाइल चोरी का प्रार्थनापत्र जब जीआरपी पुलिस को दिया तो जीआरपी ने मोबाइल चोरी की जगह गुमशुदगी दर्ज कर ली।
यह तो कुछ उदाहरण मात्र है। जबकि उरई रेलवे स्टेशन पर चोरों व जेबकतरों के गिरोह पिछले छह माह से सक्रिय है। जिसके कारण यात्रियों को आए दिन अपनी अटैची, पर्स से हाथ धोना पड़ता है। लेकिन जीआरपी पुलिस की इस सबमें चुप्पी पर कई सवाल उठ रहे हैं।

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