उरई। भाजपा द्वारा देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए नाम प्रस्तावित होने के बाद रामनाथ कोविंद का देश का 14 वां राष्ट्रपति बनना लगभग तय है। वैसे तो कोविंद पड़ोसी जिला कानपुर देहात के रहने वाले हैं लेकिन हाल के वर्षाें में उनका रिश्ता इस जनपद से भी इतना प्रगाढ़ बन गया है कि जालौन जिले का जनमानस भी पहली बार अपने किसी परिचित के राष्ट्रपति भवन में रहने के गुदगुदाने वाले सुख के एहसास से भर उठा है। हालांकि जालौन जिले के लिए एक बार पहले भी ऐसा मौका आया था। जब यहां के लोगों को लगा था कि वे अपने बीच के किसी आदमी को राष्ट्रपति भवन में देख पाऐंगे। लेकिन परिस्थितियों ने ऐसा मोड़ लिया कि यह अवसर हाथ में आने के बाद खिसक गया। जिसके चलते जनपद के लोगों को कई वर्ष तक गहरे संताप के अनुभव से गुजरना पड़ा था।
कांग्रेस के पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी याद दिलाते हैं कि 1992 में उपराष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए सरगर्मी शुरू हो गयी थी। उस समय तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा और प्रधान मंत्री स्व. नरसिंहा राव दोनों की पहली पसंद चौ. रामसेवक थे। जो कि तीन बार जालौन गरौठा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा सदस्य चुने गये थे। इसके अलावा वे बाद में राज्य सभा के सदस्य भी रहे। उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और कोषाध्यक्ष व केन्द्रीय मंत्री का दायित्व भी निभाया। इस नाते उनका प्रोफायल भी काफी समृद्ध था। उपराष्ट्रपति को ही बाद में राष्ट्रपति बनाने की परंपरा थी। इसलिए वे उपराष्ट्रपति बन जाते तो अगले राष्ट्रपति भी होते। लेकिन आखिरी क्षणों मे पार्टी ने उनकी जगह के.आर. नारायणन को उपराष्ट्रपति बनाने का फैसला कर लिया। जो इस पद पर रहने के बाद 1997 में राष्ट्रपति चुने गये।
नव भारत टाइम्स में रह चुके और वर्तमान में बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ में राजनीति विज्ञान के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. रिपुसूदन सिंह ने बताया कि यह वो दौर था जब वीपी सिंह ने 105 अनुसूचित जाति/जनजाति सांसदों का फोरम बनाकर दलित राष्ट्रपति के लिए मुहिम छेड़ी थी। यह प्रेशर ग्रुप इतना शक्तिशाली हो गया था कि कांग्रेस को उस समय दलित उपराष्ट्रपति बनाने के अलावा कोई विकल्प सूझने का प्रश्न ही नहीं था। चूंकि उस समय दलित नेताओं में जालौन के निवासी चौ. रामसेवक से हाईप्रोफायल चेहरा दलितों में कोई दूसरा नहीं था। लेकिन आखिरी में उनका नाम इसलिए कट गया क्योंकि उन्होंने पीएम राव की अपने से बहुत जूनियर राजेश पायलट से इस मुद्दे पर बात करने की राय नहीं मानी।
विनोद चतुर्वेदी ने बताया कि चौ. रामसेवक का नाम इतना श्योर था कि प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने बिना किसी उपलक्ष्य के चौ. रामसेवक के घर कांग्रेस के सारे बड़े नेताओं की दावत करा दी थी। जिसमें वे खुद भी 40 मिनट तक मौजूद रहे थे। नरसिंहा राव को बहुत रिजर्व नेता माना जाता था। इसलिए उनका बिना उपलक्ष्य के किसी के घर दावत में जाना और इतना ज्यादा समय देना अपने आप में बहुत बड़ी बात थी।
बहरहाल चौ. रामसेवक तो राष्ट्रपति नहीं बन पाये लेकिन अब अपने किसी बहुत परिचित और आत्मीय को राष्ट्रपति भवन में देखना नसीब होने की कल्पना करके जालौन जिले के लोग बेहद रोमांचित हैं। ध्यान रहे कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें जालौन गरौठा संसदीय क्षेत्र में उम्मीदवारी की तैयारी के लिए निर्देशित किया था। जिसके बाद उरई में तुलसी बिहार कालोनी में अस्थाई आवास बनाकर उन्होंने शहर के अलावा गांव-गांव में जनसम्पर्क कर अपने मृदुल स्वभाव से जिले के हजारों परिवारों से आत्मीय रिश्ते बना लिये थे। भले ही इसके बाद पार्टी ने उनको यहां से चुनाव लड़ने का मौका नहीं दिया लेकिन इन रिश्तों की गर्मजोशी उन्होंने बिहार के राज्यपाल बनने के बाद भी बरकरार रखी।







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