यूपी लगातार अभूतपूर्व घटनाओं को लेकर सुर्खियों में है, लेकिन विधानसभा के अन्दर खतरनाक विस्फोटक मिलने के प्रसंग से तो जैसे गजब ही हो गया है। सकते में आई सरकार ने इसके बाद विधानसभा में प्रवेश के नियम बेहद कड़े कर दिए हैं। यहां तक कि इस सख्ती के चलते लखनऊ के एडीजी जोन अभय कुमार प्रसाद को पास दफ्तर में भूल जाने के कारण विधानसभा के गेट से एक पुलिस कर्मी ने उल्टे पैरों वापिस कर दिया। हालांकि एडीजी जोन अभय कुमार प्रसाद ने इस साहस के लिए उक्त पुलिस कर्मी की पीठ थपथपाई, लेकिन सबसे ज्यादा मुश्किल माननीयों से है जो सुरक्षा के लिए किसी भी टोकाटोकी को सहन नहीं कर सकते। उनका ईगो इतना छुईमुुई है कि उन्हें विधानसभा को उड़ाया जाना मंजूर है पर अपनी शान में यह गुस्ताखी कतई मंजूर नहीं है, कि उनकी किसी भी तरह की सुरक्षा जांच हो। अपनी ही नहीं उन्हें तो अपने चेले चपाटों को विधानसभा के अन्दर निर्वाध ले जाने की स्वतंत्रता में भी दखल मंजूर नहीं है। भाजपा के ही एक विधायक ने नए नियम लागू किए जाने के बाद विधानसभा के गेट पर टोके जाने पर सुरक्षा कर्मी को आंखें दिखाने में चूक नहीं की, यह सीन टीवी चैनलों के संवाददाताओं ने अपने कैमरे में कैद कर लिया। जिससे चैनलों पर इसके प्रसारण के कारण सरकार को किरकिरी झेलनी पड़ी। पर माननीयों को इससे क्या। पहले सदन के अन्दर उच्च विध्वंसक क्षमता के विस्फोटक को बरामद किए जाने के घटनाक्रम पर संक्षेप में गौर कर लेते हैैं। 12 जुलाई को सत्र शुरू होने के पहले बम निरोधक दस्ता सदन के अन्दर रुटीन चैकिंग कर रहा था। इस दौरान सीट नं. 80 के कालीन के नीचे सफेद पाउडर से पैक पॉलीथिन देखी गई। दस्ते ने तत्काल इसे कब्जे में लेकर सदन के मार्शल नायक को अवगत कराया। विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री को भी इस बावत अविलंब सूचना दी गई। अध्यक्ष और सीएम इससे थोड़े फिक्रमंद तो हुए, लेकिन फिर भी शुरुआत में स्थिति को इतना ज्यादा गंभीर नहीं समझा जा रहा था। धमाका तब हुआ जब पॉलीथिन में मिले सफेद पाउडर की जांच कर फारेंसिक साइंस लेबोरेट्री ने इसकी रिपोर्ट दी। जिसके मुताबिक यह पाउडर पीईटीएन था। जिसकी विध्वंसक क्षमता भीषण मानी जाती है। 6 साल पहले 7 सितंबर 2011 को दिल्ली हाइकोर्ट में इसी विस्फोटक का ब्लास्ट किया गया था। जिसमें 17 लोग मारे गए थे और 76 घायल हो गए थे। तब इसकी बहुत कम मात्रा ब्लास्ट के लिए इस्तेमाल की गई थी। लेकिन विधानसभा में मिले इस विस्फोटक का परिमाण डेढ़ सौ ग्राम आंका गया, जो बहुत ज्यादा है। विशेषज्ञों के अनुसार केवल 500 ग्राम पीईटीएन का ब्लास्ट करके पूरी विधान सभा को उड़ाया जा सकता है। जिस जगह विस्फोटक की यह थैली बरामद हुई, वहां एक दिन पहले सत्ता के विधायक मनोज पाण्डेय बैठे थे। एटीएस ने उन से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि जब वे उस सीट पर थे तब उन्होंने कोई ऐसी सामग्री नहीं देखी। उनके पास बैठे सपा के अन्य विधायक अनिल दोहरे से भी एटीएस ने पूछताछ की। वे भी कोई जानकारी नहीं दे सके। इसके पहले मनोज पाण्डेय ने कहा कि विस्फोटक रखने के पीछे उनकी हत्या की साजिश हो सकती है। मुख्तार अंसारी ने इसे लेकर अपनी हत्या की साजिश का अंदेशा जताया है। कुछ और विधायक अपने खिलाफ साजिश की बात कहते हुए आगे आए हैैं। लेकिन यह कथन बहुत बचकाने हैं। सदन के अन्दर इस कदर खतरनाक विस्फोटक को पहुंचाने के पीछे व्यक्ति विशेष को लक्षित करने की साजिश नहीं हो सकती। क्योंकि इसमें अगर ब्लास्ट होता तो जो अनर्थ सामने आता, उससे पूरा देश दहल उठता। इसलिए साजिश बहुत व्यापक रही होगी। लेकिन कौनसा संगठन और व्यक्ति है जो इस साजिश में मुब्तिला हो सकता है यह अंदाजना बेहद पेचीदा बना हुआ है। यूपी में नक्सली और माओवादी उग्रवादियों का इतना जोर नहीं है कि सदन के अन्दर प्रवेश के लिए अधिकृत किसी व्यक्ति को वे इस्तेमाल कर सकें। तो फिर आखिर कौन संगठन या व्यक्ति इतने बड़े दुस्साहस का मास्टर माइण्ड है।सदन को इसकी जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ काफी विचलित नजर आए। दरअसल उनके लिए तो पहले से ही जानी खतरा माना जाता था। एक बार अपनी हत्या की कोशिश का हवाला देते हुए वे लोकसभा में रो पड़े थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के कारण उनके लिए बहुत ज्यादा खतरा बढ़ने का इनपुट इंटैलीजेंस एजेंसियों के जरिए सामने आया है। जिसकी वजह से उनकी सुरक्षा बहुत ज्यादा कड़ी करनी पड़ी है। लेकिन विधानसभा परिसर जैसे अत्यंत सुरक्षित क्षेत्र में सेंध लगने से जो तस्वीर सामने आई है, वह मुख्यमंत्री के लिए आश्वस्तकारी नहीं कही जा सकती।भारतीय लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है कि आपराधिक रूप से दुस्साहसी लोगों को यहां नायक के रूप में स्वीकार किया जाता है। इस मानसिकता केा भुनाने के लिए उत्तर प्रदेश में मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियों ने प्रत्याशी चयन में ऐसी पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को वरीयता के साथ अपनाने के कार्य को अपनी रणनीति के बतौर लागू किया है। क्षेत्रीय दलों को इस के कारण जो सफलताएं मिलीं हैं, उससे यह कुरीति सिद्धमंत्र की तरह बन गई है। उप्र विधानसभा के 402 मौजूदा सदस्यों में से 143 के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें से 107 विधायकों पर तो संगीन मुकदमें हैं। क्रिमिनल हिस्ट्री वाले विधायकों में सत्तारूढ़ पार्टी के विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा है। भाजपा के 312 विधायकों में से 83 पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। दूसरे नम्बर पर सपा के 46 विधायकों में से 11 आपराधिक रिकार्ड वाले हैं, जिनमें उनके प्रशंसकों द्वारा गांधी के अवतार के रूप में स्थापित किए जा रहे श्रीमान शिवपाल सिंह यादव का नाम प्रमुख है। बसपा के 19 में से 4, कांग्रेस के 7 में से 4 और 3 निर्दलीय विधायकों का आपराधिक रिकार्ड है। इनमें से कुछ के खिलाफ तो स्वाभिमान की निजी लड़ाई के दौरान मुकदमे दर्ज हुए, कई विधायक जन आंदोलन या दुष्ट अधिकारियों को सबक सिखाने के लिए ज्यादा जोश दिखाने की वजह से गुनहगार बन गए। लेकिन कुछ विधायक ऐसे भी हैं जिनके नाम भारत के शत्रु देशों से कनेक्शन में माने जाते रहे हैं। सदन के अंदर खतरनाक विस्फोटक पहुंचाने के मामले में यही विधायक सरसरी तौर पर जांच एजंेसियों के रडार पर रहेंगे।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सदन में इस बारे में दिए हुए वक्तव्य में कहा है कि सदन के अंदर बहुत लिमिटेड लोगों की इंट्री होती है। विधायकों, मार्शल कर्मियों, विधानसभा के कर्मचारियों और सफाई कर्मचारियों के अलावा किसी की आवाजाही सदन में नहींे हो सकती। इसलिए साजिश का सूत्रधार इन्हीं में से कोई होना चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह दुस्साहस कर्मचारी और मार्शल तो करने से रहे, तो ज्यादा अनुमान यह है कि इस के पीछे कोई न कोई माननीय ही मास्टर माइण्ड होना चाहिए। हालांकि संदेह से बरी कोई नहीं है।यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि विधानसभा के अंदर ड्यूटी के लिए आउटसोर्सिंग से कर्मचारी जुटाए गए हैं। इससे ज्यादा विवेकहीनता का काम कोई दूसरा नहीं हो सकता। विधानसभा परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरे भी बड़ी संख्या में खराब पाए गए। जो सुरक्षा इंतजामों में लापरवाही की इन्तेहा है। इसलिए अब सुरक्षा की व्यूह रचना की ओवरहालिंग की जा रही है। सीएम ने कहा है कि माननीयों को इसमें पूरा सहयोग देना होगा। जब एयरपोर्ट पर माननीयों की चैकिंग में कोई आपत्ति नहीं होती, तो सदन में प्रवेश के समय चैकिंग के प्रावधान केा लेकर आपत्ति क्यों हो। लेकिन उप्र के माननीय बहुत महान हैं यहां तो अराजक आचरण वीआइपी कल्चर का पर्याय मान लिया गया है। माननीयों की अक्ल तभी ठिकाने लगती है, जब उनकी जान पर बन आए। जैसे छत्तीसगढ़ में लाल बत्ती की गाड़ी पर नक्सली हमले होने के बाद मुख्यमंत्री और मंत्री अपने आप लाल बत्ती लगाकर और हूटर बजाकर चलना छोड़ गए थे। माननीय कानून बनाने का काम करते हैं। इसलिए कानून के राज में सबसे मजबूत आस्था उनको खुद दिखानी चाहिए। अकेले विधान भवन में ही नहीं, कहीं पर भी सुरक्षा चैकिंग हो रही हो, मंत्री, सांसद और विधायकों को सहर्ष अपनी चैकिंग सबसे पहले कराने की पहल करनी होगी। विधानसभा के अंदर विस्फोटक पहुंचाए जाने से यह जाहिर हो गया है कि आतंकी खतरे की जद में माननीय सबसे ऊपर आ गए हैं। इसलिए उन्हें अपने ईगो या अपनी जान में से किसी एक का चुनाव अब करना ही होगा।

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