
भारत-भूटान-सिक्किम ट्राई-जंक्शन के निकट डोकलाम पठार भू-सामरिक दृष्टि से चर्चा का विषय बना हुआ है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भारत की सेना ने चीन की सेना द्वारा इस इलाके में बनाई जा सड़क का निर्माण रोक दिया है जिससे चीन भड़क गया है। चीन के सरकार नियंत्रित मीडिया, विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय विशेषकर चीनी सेना और थिंक टेंक से कई स्तरों पर तर्क और धमकी का मिलाजुला मोर्चा खोल दिया है। चीनी पक्ष से धमकी देने का मोर्चा मुख्य रूप से चीन के मीडिया में ग्लोबल टाइम्स ने संभाला और सरकार और मीडिया द्वारा डोकलम को चीनी भू-भाग बताने के लिए कई तर्क दिये गए।
चीन का कहना है कि प्राचीन समय से ही यह क्षेत्र उसका हिस्सा है और भारत और भूटान का इस क्षेत्र पर दावा गलत है। यहाँ पर केवल उन तर्कों का परीक्षण करना जरूरी प्रतीत होता है जो चीन द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे है।
1-चीन का कहना है कि 1890 की संधि के हिसाब से यह हिस्सा चीन का है। अब इस संधि को जानना जरूरी है। इस संधि की धारा (1) इस प्रकार है-
“The boundary of Sikkim and Tibet shall be the crest of the mountain range separating the waters flowing into the Sikkim Teesta and its affluents from the waters flowing into the Tibetan Mochu and northwards into other rivers of Tibet. The line commences at Mount Gipmochi on the Bhutan frontier, and follows the above-mentioned water-parting to the point where it meets Nipal territory.” स्रोत-http://treaties.fco.gov.uk/docs/pdf/1894/TS0011.pdf
संधि के अनुच्छेद 1 में दो विंदुओं का उल्लेख किया गया है। प्रथम विंदु में सिक्किम और तिब्बत की सीमा के लिए एक सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है कि वाटरशेड से ही सीमा का निर्धारण किया जाएगा। संधि के दूसरे विंदु में एक तथ्य के रूप में ‘गिपमोची’ को सीमा का आरंभ विंदु माना गया है। अब प्रश्न है कि संधि में वर्णित सिद्धान्त और तथ्य में तालमेल कैसे स्थापित किया जाय। संधि में उल्लिखित सिद्धान्त और तथ्य में एक गेप है। चीन तथ्य के रूप में गिपमोची का उल्लेख बार-बार कर रहा है किन्तु यदि सिद्धान्त को माना जाय तो तथ्य के रूप में आरंभ विंदु बतंग ला से शुरू होता है जो कि गिपमोची के उत्तर में स्थित है क्योंकि वाटर-शेड बतंग ला से ही शुरू होता है। चीन अपने तर्क में आधी बात ही बता रहा है। यहाँ उल्लेखनीय है कि किसी भी संधि में दिया गया सिद्धान्त अधिक महत्वपूर्ण होता है। संधि के समय शायद किसी कार्टोग्राफिक त्रुटि से गिपमोची का उल्लेख कर दिया गया होगा जब कि उल्लेख बतंग ला का किया जाना चाहिए था।http://www.firstpost.com/…/india-china-border-standoff-in-s…

2-चीन का यह भी कहना है कि भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1890 की संधि को स्वीकार किया था और अब भारत इसे नहीं मान रहा है। यहाँ भी चीन के द्वारा नेहरू के कथन को अपनी सुविधा के अनुसार आधा-अधूरा ही प्रस्तुत किया है। चीन ने जानबूझ कर नेहरू के पूरे कथन को सामने नहीं लाया है। 1959 में नेहरू द्वारा चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई को लिखे पत्रों से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि नेहरू ने 1890 की संधि को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया था। इस पत्र में नेहरू ने स्पष्ट लिखा था सिक्किम और तिब्बत की सीमा में कोई विवाद नहीं है किन्तु इस पत्र में नेहरू ने माना था कि ट्राई जंक्शन में सीमा का मुद्दा विवाद का विषय है। नेहरू के अनुसार-
“This Convention of 1890 also defined the boundary between Sikkim and Tibet; and the boundary was later, in 1895, demarcated. There is thus no dispute regarding the boundary of Sikkim with the Tibet region. This clearly refers to northern Sikkim and not to the tri-junction which needed to be discussed with Bhutan and Sikkim and which is today the contentious area. And once more, let us not forget that the 1890 Treaty was an unequal treaty as Tibet, Sikkim and Bhutan were not involved,”
इसी पत्र में नेहरू ने यह भी लिखा था कि-
“The rectification of errors in Chinese maps regarding the boundary of Bhutan with Tibet is therefore a matter which has to be discussed along with the boundary of India with the Tibet region of China in the same sector,”
http://www.hindustantimes.com/…/story-3pcPZxmYlHdilnxXSWr0y…
3-भारत और चीन में इस इलाके में सीमा के अंकन के लिए भी वार्ता चल रही है जिसका कोई उल्लेख चीन नहीं कर रहा है। 2012 में भारत और चीन में समझौता हुआ था कि भारत, चीन और तीसरे देश के मध्य ट्राई-जंक्शन सीमा प्वाइंट को सलाह मशविरे के पश्चात अंतिम रूप दिया जाएगा। इसलिए इस क्षेत्र में कोई भी एक पक्षीय कदम उक्त समझौते का उल्लंघन है।
4-भूटान से भी इस इलाके में सीमा के अंकन के बारे में चीन द्वारा वार्ता जारी थी लेकिन चीन ने इसका भी कोई जिक्र नहीं किया है। भूटान के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि भूटान की सीमा के भीतर सड़क का निर्माण भूटान और चीन के मध्य 1988 और 1998 के समझौते का सीधा उल्लाघन है और इससे दोनों देशों के सीमा के अंकन की प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ेगा।
इस विवाद के पीछे चीन के कई सामरिक उद्देश्य है-
1-वस्तुतः चीन किसी तरह ट्राई-जंक्शन तक पहुँच कर अपनी सामरिक बढ़त बनाना चाहता है ताकि भारत पर सिलीगुड़ी कॉरीडोर का दवाव बना रहे।
2-चीन की मंशा प्रतीत होती है कि भारत को सीमा विवाद में उलझा कर रखा जाय ताकि भारत चीन-पाक आर्थिक कॉरीडोर पर ध्यान न दे। भारत की राजनयिक सक्रियता से भी चीन को परेशानी हो रही है। अमरीका, जापान, वियतनाम, आस्ट्रेलिया, इजरायल आदि देशों के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी को चीन अपने लिए ठीक नहीं मानता है।
3-चीन यह भी देखना चाहता है कि भारत का संकल्प और राजनीतिक इच्छा शक्ति के साथ-साथ सैन्य तैयारी और संकल्प का स्वरूप क्या है।
4-पूर्वी एशिया से लेकर कराकोरम राज मार्ग तक चीन अपनी सामरिक बढ़त को बनाए रखना चाहता है ताकि भविष्य में किसी भी तरह के संघर्ष कि स्थिति पैदा होने की स्थिति में उसकी सामरिक बढ़त बनी रहे। इसीलिए वह अपनी सीमा क्षेत्रों में सड़क-रेल का एक संजाल बना रहा है ताकि लोजीस्टिक बढ़त बनी रहे।
5-यह स्पष्ट है कि वर्तमान में उत्तर कोरिया, ताइवान, दक्षिण चीन सागर और जापान से सीमा विवाद के चलते चीन फिलहाल केवल भारत पर मनोवैज्ञानिक दवाव तो अवश्य बनाएगा लेकिन कोई सैन्य कार्यवाही नहीं करेगा और डोकलाम में तो बिलकुल ही कोई सैन्य कार्यवाही नहीं होगी क्योंकि यहा पर भारत कि स्थिति मजबूत है।
समस्या का समाधान राजनय और संवाद में ही निहित है।
-अनूप कुमार गुप्ता की फेसबुक वाल से






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