• रोहित कुमार पोरवाल, नई दिल्ली

20 जुलाई को दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी की ओर से बुंदेली के जाने-माने कवि महेश कटारे ‘सुगम’ को सहभाषा सम्मान मिला। यह सम्मान साढ़े 6 करोड़ बुदेलखंडियों के लिए एक गौरव है। ऐसा पहली बार हुआ है कि एक क्षेत्रीय बोली के सागर में से किसी ने कविताओं, कहानियों और ग़ज़लों के मोती इतनी खूबसूरती से निकालें कि उसकी हर जगह चर्चा होने लगी। आज सुगम जी की रचनाएं पढ़कर गैर बुंदेली भी इस मन लुभावनी बोली को सीख और समझ पा रहे हैं। 45 साल पहले शुरू हुए उनके इस काव्य सफर की हर जरूरी बात सुगम जी ने  रोहित कुमार पोरवाल से साझा की। गांव की धड़कनों को ग़ज़ल बनाने वाले ‘बुंदेली’ कवि महेश कटारे ‘सुगम’ ने शिद्दत से हर सवालों का जवाब दिया।

स.- एक क्षेत्रीय बोली ‘बुंदेली’ में कविताएं और ग़ज़लों को लेकर आपको दिल्ली की हिंदी अकादमी ने सहभाषा सम्मान दिया। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि एक बड़ी हिंदी अकादमी ने ‘बुंदेली’ के महत्व को समझा और उसके लिए इतना आदर भी दिखाया। आपकी पहली प्रतिक्रिया।

ये बुंदेली का सामर्थ, उसका सौंदर्य, उसमें प्रतिरोध की क्षमता है कि उसे इस तरह का सम्मान मिला। ये सारी विशेषताएं बुंदेली में हमेशा से अतर्निहित थीं, जो अभी तक उजागर नहीं हो पाई थीं। उस पर मैंने काम किया, जो लोगों के सामने आईं और लोगों को पता लगा कि ये भाषा अपने आप में बहुत शक्तिशाली भाषा है। इसमें प्रतिरोध की ज्यादा क्षमता है और इसको सम्मान मिलना चाहिए, इसीलिए यह सम्मान दिया गया है।

स.-अमूमन बुंदेलखंड में ही बुंदेली को उज्जडों की बोली समझा जाता है। इसमें आपने कहां से रस ढूंढ़ लिया?

बिल्कुल, आपने सही सवाल किया! सही बात ये हैं कि अभी तक बुंदेली भाषा को देवर-भाभी के किस्से, चुटकुलों सहित अन्य रूपों में हास्यास्पद ढंग से प्रस्तुत किया गया था, उससे इसकी कोई अच्छी इमेज सामान्य जगत में नहीं थी। लेकिन दुष्यंत को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि दुष्यंत हिंदी में जब अच्छी बात कह सकते हैं, आम दर्द को उठा सकते हैं, आम जनता की पीड़ा को व्यक्त कर सकते हैं, तो बुंदेली क्यों नहीं कर सकती है? ये चुनौती मेरे सामने थी। 45 साल पहले मैंने इस पर काम करना शुरू किया। और तब से लगातार काम करते-करते आज मैं इसको उस रूप में ला पाया हूं, जहां लोगों में अब बुंदेली को पढ़ने की और सीखने की क्षमता विकसित हो रही है।

स.-बुंदेली की तुलना अगर दूसरी प्रांतीय बोलियों से करें, जैसे कि भोजपुरी, अवधि, मैथिली… हिंदी पट्टी के लोग ये बोलियां समझ लेते हैं। कभी बहुत सारे शब्द एक जैसे होते हैं। इन बोलियों से तुलना करने पर बुंदेली कहां खड़ी होती है?

नहीं, तुलना नहीं की जा सकती है। ये सारी की सारी बोलियां… ईमानदारी खड़ी बोली की… इसका मूल तो यही हैं। खड़ी बोली का जो विकास हमें दिख रहा है वो इन्ही बोलियों के माध्यम से हुआ है। इन्हीं बोलियों की पीठ पर बैठकर हुआ है। तुलना न करें, सारी बोलियां अपने आप में पूर्ण हैं और काफी शक्तिशाली हैं। उनमें एक बुंदेली भी है, वह भी शक्तिशाली है।

स.-पिछले कुछ वर्षों में बुंदेली का चलन बढ़ा है। फिल्मों से लेकर टेलीविजन तक में और अब आपको सम्मान मिला है।

इसमें मुझे थोड़ा सा दुख है। जो भाभी जी घर पर हैं, वो एक हप्पू जी आए हैं, उन्होंने बुंदेली बोलने का प्रयास किया है, सराहनीय तो हो सकता है, लेकिन वह बुंदेली का विकृत रूप है। वह बुंदेली का सही रूप नहीं है। और उससे हम बुंदेलियों की छवि आम आदमी में अच्छी नहीं जा रही है।

स.-दरअसल वह एक कॉमेडी सीरियल है…

कॉमेडी सीरियल है, वहां भी बुंदेली को कॉमेडी के रूम में उपयोग किया है, आप देखिए, जैसा कि अभी तक होता आ रहा था, बुंदेली को मतलब कॉमेडी के रूम में प्रस्तुत करने का प्रचलन चल पड़ा था, आप देशराज पटैरिया के गीतों में देखें या कहीं और, अपन देखते हैं, उसका प्रयोग इस तरह से किया गया। उसका प्रयोग गंभीर मुद्दों के लिए गंभीरता से किया जाना चाहिए… और अच्छा लगेगा।

स.-गंभीरता से देखें तो फिल्म पीपली लाइव और पान सिंह तोमर… इनमें बुंदेली को इस्तेमाल किया गया। आपको क्या लगता है कि आगे फिल्म निर्माता बुंदेली में फिल्में बनाएंगे? फिल्मों में बुंदेली अपनी जगह बनाएगी, मुकाम बनाएगी?

बिल्कुल बनाएगी, मुझे लगता है कि निकट भविष्य में बुंदेली का एक बहुत अच्छा रूप आपके सामने आएगा। और आप उसे देखेंगे कि बुंदेली बहुत जल्दी फिल्मों की बोली बनने जा रही है।

स.-आप अपनी रचनाओं को सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों के सामने लाते हैं। बहुत सारे युवा भी आपसे जुड़े हुए हैं। युवाओं में बुंदेली को लेकर क्या क्रेज है और आपको उनसे कैसा रिस्पॉन्स मिलता है?

इतना बढ़िया रिस्पॉन्स मिल रहा है, आप ये देखिए कि जम्मू में बैठा हुआ आदमी डोंगरी में बुंदेली ग़ज़लों का अनुवाद कर रहा है। कोलकाता में बैठा हुआ बिहार का आदमी भोजपुरी में बुंदेली ग़ज़लों का अनुवाद कर रहा है। और उनके संपर्क हमसे बराबर बने हुए हैं। वो कह रहे कि इस काम को करने में बहुत मजा आया। एक बात मैं आपको और बता दूं, बुंदेली का एक ग़ज़ल संग्रह मेरा प्रकाशित होना था, तो मैं उस समय प्रकाशक तलाशता फिर रहा था। कोई भी प्रकाशक उसको लेने के लिए तैयार नहीं था। इसलिए क्योंकि ये एक क्षेत्रीय बोली है, इसको हम बेचेंगे कहां? लेकिया माया मृग जी, जो बोधि प्रकाशन वाले हैं जयपुर के, उन्होंने एक रिस्क उठाया। उन्होंने उसको छापने की शक्ति दिखाई। और काम करते समय उन्होंने ये कहा कि कटारे जी, मैं विगत 20 साल से प्रकाशन का काम कर रहा हूं। ऐसा एकेडमिक काम करने का अवसर पहली बार मिला है मुझे। उन्होंने कहा कि उन्हें इस कार्य में बहुत मजा आ रहा है। अब वह मेरे दो बुंदेली ग़ज़ल संग्रह और छाप रहे हैं।

स.– मुंबई में मराठियों को अहमियत देने वाला प्रमुख राजनीतिक दल शिवसेना के मुखपत्र में भी बुंदेली कविताएं और ग़ज़लें छापी जाती हैं। जहां से गैर मराठियों के लिए बहुत शोभास्पद खबरें नहीं आती हैं, वहां बुदेली को ऐसा आदर मिलना एक तरह का चमत्कार ही है। आखिर कैसे संभव हुआ यह?

जी, इससे हमारी बुंदेली की शक्ति का पता लगता है। देखिए, क्षेत्रीयता… जिससे ऊपर से नीचे तक रंगा हुआ आदमी है, ऐसे माहौल में भी बुंदेली को छापने के लिए वह विवश हो रहे हैं। कहीं कुछ बात तो है बुंदेली में।

स.-दिल्ली एनसीआर में मैं एक धारणा देखता हूं… अरे ये पूर्वांचली, ये बिहारी… एक अघोषित हीनभावना सी लोगों में हो गई है। लेकिन बुंदेलखंड को लेकर, बुंदेली को लेकर, इस तरह का रवैया लोगों के बीच नहीं दिखाई देता है। मैं सोशल मीडिया का आभार व्यक्त करना चाहूंगा कि पिछले 4 साल में हमारी बुंदेली ग़ज़लों को जिस तरह फैलाया है हिंदुस्तान में, उसमें बुंदेली का जो रूप सामने आया है वो लोगों को काफी अच्छा लगा। आज बहुत से ऐसे लोग हैं जो मेरी बुंदेली ग़ज़लों पर पोस्ट करते हैं कि मैं नीचे दिए आपके अर्थों को पढ़-पढ़कर बुंदेली सीख रहा हूं।

स.-मैंने आपकी कुछ रचनाएं पढ़ीं, उनमें दद्दा, मैया, नन्ना, कक्का, गांव, मढ़ैया, गांव का माहौल, गाय-भैंस, गोबर और खेत-खरयान से लेकर सारी चीजें सामने आती हैं, ज्यादातर आपने गांव की ओर लोगों को खींचा है। शहरों से गांवों की तुलना की है। तो कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि जो जीवंतता है गांव की और जो हकीकत है, उसको आपने कुरेदा है, उसको पहचाना है और उसको बुंदेली में परिभाषित किया है। ये एक चीज है जो लोगों को कहीं न कहीं खींच लेती है। तो क्या कहेंगे आप?

बिल्कुल, आप सही कह रहे हैं आज भी 70 परसेंट हमारा जन मानस गांव से जुड़ा हुआ है और हमारे यहां तो साढ़े 6 करोड़ लोग बुंदेली बोलने वाले हैं। केपी भाई (जिला जालौन के वरिष्ठ पत्रकार और सुगम जी के अजीज मित्र) जानते हैं बहुत अच्छी तरह से कि हम लोग गांव से किस तरह से आत्मीयता से जुड़े हुए हैं। हम आज भी महीने में 15 दिन गांव में काम करते हैं। वहां जाते हैं। लोगों के दुख-दर्द, व्यथा, सुख, तकलीफें, सारी चीजों में शामिल होते हैं और अंदर से जानते हैं। इसलिए हमें इसको कहनें में, जो मैं यहां बात कहता हूं, उसमें हमें कोई प्रयास नहीं करना पड़ता है। भरा हुआ है, हमारे खून में शामिल है वो, मजा आता है, इसलिए वो ज्यादा संप्रेषणीय है। सीधा जाकर लोगों के दिल पे अटैक करता है वो, और उनको लगता है कि हां, यार बात कुछ तो है।

स.- बहुत ऐसे साहित्यकार नहीं है जो बुंदेली साहित्य लिख रहे हों, जमीनी तौर पर आम जनमानस अभी बुंदेली साहित्य से खुद को हिंदी, अंग्रेजी के मुकाबले उतना जुड़ा हुआ महसूस नहीं करता है। क्या किया जाना चाहिए, क्या स्कूलों में बुंदेली पढ़ाई जानी चाहिए?

छतरपुर की महाराजा छत्रसाल यूनिवर्सिटी में एमए प्रीवियस में मेरी बुंदेली ग़ज़लें पढ़ाई जा रही हैं। पिछले साल उन्होंने उनको शामिल किया। और अब निकट भविष्य में झांसी में भी पढ़ाई जाएंगीं। बुंदेली पहले से पढ़ाई जा रही है, ऐसा नहीं है। लेकिन अब इस दिशा में कार्य हो रहा है। हां बुंदेली को बढ़ावा देने के और प्रयास किए जाने चाहिए। इसके लिए एक लंबे काल से उबाऊ काम चल रहा है, उसे रोचक बनाना चाहिए। बुंदेली के जो रचनाकार है हमारे, वो और दूसरी चीजों को नहीं पढ़ रहे हैं। रोचकता की कमी है। नए मुद्दों को उठाने में वो आज भी विफल हैं। उस चीज को अगर उठाने का प्रयास करेंगे, मैं चाहता हूं मेरा अनुरोध भी है कि वो आजकल की चीजों को पढ़ें, और गांव की समस्याओं को अपने ढंग से बुंदेली में उठाने की कोशिश करें, निश्चित रूप से बहुत अच्छा काम होगा।

स.-कोई भी बोली हो, कोई भी भाषा हो, हर भाषा का अपना महत्व है, अपना इतिहास, अपनी तासीर होती है। अगर प्राथमिक विद्यालयों में बाल कविताएं बुंदेली में हों, कहानियां हों, और बुंदेलखंड में बुंदेली उसी तरह पढ़ाई जाए जैसे हिंदी या अंग्रेजी, तो क्या इसकी जरूरत  आप महसूस करते हैं?

हम तो इस बात के पहले से पक्षधर हैं। एक बच्चे को प्राथमिक तौर पर तीन भाषाएं पढ़ाई जानी चाहिए, एक हमारी मातृभाषा, जैसे बुंदेली है, दूसरी हिंदी जो हमारी राष्ट्रभाषा है, तीसरी अंतर्राष्ट्रीय भाषा, जो अंग्रेजी के रूप में हमें मिली है। और इन तीन भाषाओं को शुरू से ही पढ़ाया जाना चाहिए, इन तीनों का विकास किसी भी बच्चे के जीवन के लिए बहुत जरूरी है।

स.-कहानी, कविताएं, उपन्यास… चूंकि मैं भी बुंदेलखंड से ही हूं, मैंने ये बात देखी है कि लोगों को जो चीज दिखती है, टीवी पर या रेडियो से सुनते हैं या किसी गैजेट के माध्यम से सुनते हैं… तो सुन लेते हैं। पढ़ने को लेकर अभी भी उतना उत्साह नहीं दिखाई देता, वह किताब बैठकर पढ़ना नहीं चाहते…

ये बात तो बिल्कुल सही है, आज कल जो हमारी सत्ता है, वो बिल्कुल नहीं चाहती हैं कि लोग पढ़ें, वो तो पूरी तरह से ये चाहती हैं कि पढ़ाई जितनी कम होगी, उसके झंडे, डंडे, बैनर उठाने वाले उसे उतने ही ज्यादा मिलेंगे। तो वो अपने स्वार्थ में लिप्त होकर के इन सारी चीजों को बड़ी साजिश और षड्यंत्र के तहत अलग कर रही हैं कि उनकी छवि खराब भी न हो और ये काम भी न हो। यही कारण है कि आप देख रहे होंगे कि इन सरकारों में लाखों पद शिक्षकों के खाली पड़े हुए हैं। गांवों के स्कूलों की दशा आप आकर के देखो तो कहीं पर आज इस बरसात में रास्ते नहीं हैं, बच्चों को नदी नावों से पार करनी पड़ रही है, कहीं तारों से पार करनी पड़ रही है। सरकार को इस मामले में थोड़ा सा संजीदा तो होना पड़ेगा। अगर वो चाहते हैं कि वहां स्कूलों में विकास हो, बिना शिक्षा के किसी विकास को अपन दिवा स्वप्न ही मानेंगे।

स.-सरकार से जुड़े मुद्दे से याद आया कि मैंने आपकी जो बुंदेली कविताएं पढ़ीं, अमूमन ऐसा होता है कि आदमी कविताएं लिखता है, या ग़ज़ल लिखता है तो प्रेम, प्रेमी और प्रेमिका के बीच का एक एहसास, उनके बीच के रिश्ते को लेकर लिखता है। लेकिन आपकी गज़ल़ें हकीकत में ले जाती हैं। गांव में धकेल देती हैं। जो गांव और शहर के बीच पनपती कुरूपता को दिखाती हैं?

एक्चुली क्या है, कि गज़ल़ विधा ही पूरी की पूरी फारसी से आई हुई है। जहां पर प्रेमी-प्रेमिका की पूरी बातचीत को ही ग़ज़ल कहा करते थे। ठीक है, लेकिन दुष्यंत ने इसमें बड़ा काम किया है। हालांकि ग़ालिब ने भी किया, लेकिन ग़ालिब ने छोटे स्तर पर किया, दुष्यंत जी ने सारी समस्याओं को लाकर ग़ज़ल में मोड़ दिया। तो आदमी की जिंदगी से जुड़ी हुई जितनी भी समस्याएं थीं, सारी चीजों पर दुष्यंत जी की पैनी निगाह थी और विशेषकर राजनीतिक रूप से… और उन्होंने खूब अपनी ग़ज़लों में राजनीति को आड़े हाथों लिया। उनको पढ़ने के बाद में मुझे ऐसा लगा कि यह कार्य बुंदेली पर भी हो सकता है। वही प्रेरणा आज मुझे इस मुकाम तक लाई, और मैंने भी वही कोशिश की बुंदेली में, जो दुष्यंत जी ने हिंदी में की थी।

स.-बहुत बढ़िया आपका प्रयास है और मुझे लगता है कि मेरे जेहन में जो सवाल आपसे बात करते हुए पनपे, मैंने पूछे, आखिरी में यही कि आज की जो युवा पीढ़ी और कल का भविष्य है… उसके लिए आप क्या संदेश देंगे?

रचनाकारों को पढ़ना और आदमी से जुड़ी हुई समस्याओं को उठाना, सत्ता को चाहिए कि इनके लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराएं, अच्छे स्कूलों की व्यवस्था हो… तो निश्चित रूप से बुंदेली क्या बुंदेली के साथ साथ सारी बोलियों का विकास होगा और जो हमारे लिए बड़ा सुखद है और आने वाले भविष्य के लिए एक बहुत ही बेहतरीन अवसर प्रदान करेगा।

स.-चलते चलते बुंदेली में कुछ सुनाना चाहेंगे?

एक मुक्तक सुनाना चाहता हूं बुंदेली का,

कि ऐसे कभै मुकद्दर हुइयैं
ऐसे कभै मुकद्दर हुइयैं
सबरे दूर दलुद्दर हुइयैं
जितने लंबे पांव हमाये
उत्तेई बड्डे चद्दर हुइयैं
ऐसे कभै मुकद्दर हुइयैं
ऐसे कभै मुकद्दर हुइयैं…  (amarujala.com से साभार मूल लिंक –https://jalauntimessite.wordpress.com/wp-admin/post.php?post=24329&action=edit)
 

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