उरई । श्रावणी पूर्णमासी के अगले दिन माहिल तालाब के किनारे आयोजित होने वाले भुंजरिया मेले में न केवल शहर बल्कि आस पास के गाँवों से महिलाओं बच्चों समेत ख़ासा जन समूह उमड़ता है । माहिल तालाब में भुंजरियाँ विसर्जन के साथ साथ यह त्यौहार सामाजिक मिलन के पर्व के रूप  में मनाने की परंपरा है जिसके तहत घंटाघर पर राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता एकत्र होते हैं और एक दूसरे को भुंजारियाँ दे कर छोटे बड़े के अनुरूप यथोचित अभिवादन करते हैं । यह अवसर होली की तरह ही लोगों में वर्ष भर के आपसी मनमुटाव के पटाक्षेप का भी उपलक्ष्य चरितार्थ करता है ।

केंद्र के साथ- साथ  प्रदेश में योगी सरकार के पदारूढ़ होने और देश के सभी शीर्ष संवैधानिक पदों पर हिंदुत्ववादी सोच के धुरंधरों का कब्जा होने के बाद भुंजारियों का यह पहला  मौका होगा जिसे देखते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की  प्रचंड अनुगूँज के बीच भुंजरिया पर्व में लोगों का उत्साह अलग ही होगा । दूसरी ओर नगर निकाय के आने वाले चुनाव का भी रंग इस समय लोगों पर तारी है इसलिये भुंजरियाँ मिलन में अभूतपूर्व भीड़ इस बार उमड़ने के आसार हैं । जाहिर है कि ऐसे में पुलिस के लिए भीड़ और यातायात प्रबंधन की चुनौती इस बार तगड़ी रहेगी ।

इसी को देखते हुए नगर पुलिस उपाधीक्षक संतोष कुमार ने आज यातायात निरीक्षक विक्रम सिंह चौहान के साथ घंटाघर से माहिल तालाब तक मेला क्षेत्र का पैदल निरीक्षण कर चौकस इंतजामों के लिए मनोज माहेश्वरी सहित आस पास के प्रमुख लोगों से विचार विमर्श  कर व्यूह रचना तैयार  की ।

वैसे तो भुंजरियों का त्यौहार पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है लेकिन बुंदेलखंड में इस पर्व के साथ कीरत सागर के युद्ध का इतिहास जुड़ा है । बुंदेलखंड के महोबा राज के सम्राट परमाल की पुत्री चंद्रावलि के श्रावण पूर्णमासी के दिन भुंजरियाँ विसर्जन के समय कीरत सागर से हरण के लिए दिल्लीपत पृथवीराज चौहान ने  अपनी सेना का आक्रमण कराया जिसमें भयानक युद्ध हुआ । युद्ध में पृथ्वीराज का पुत्र सूरज सिंह मारा गया तो आल्हा ऊदल द्वारा भारी पराक्रम दिखाये जाने के बावजूद महोबा राज्य की ओर से लड़ रहे उरई के राजा माहिल का पुत्र अभयी शहीद हो गया था । इसके बाद अगले दिन बुंदेलखंड भर में विजयोत्सव के रूप में श्रावणी त्यौहार मनाया गया था । तभी से बुंदेलखंड में श्रावणी पूर्णिमा के एक दिन बाद भुंजरियाँ पर्व मनाने का रिवाज चला आ रहा है \

 

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