स्वाधीनता दिवस और कृष्ण जन्माष्टमी किन आगत घटनाओं की सूचक

2017 का 15 अगस्त इसलिए महत्वपूर्ण है कि एक ओर इस दिन स्वाधीनता की वर्षगांठ मनाई जानी है तो दूसरी ओर दुनिया के किसी भी धर्म में भगवान के रूप में पूजे गये श्रीकृष्ण का जन्मदिन भी इस तारीख को मनाया जा रहा है। यह अनोखा संयोग है और जो लोग तिथियों के किसी विशेष संयोग को विलक्षण परिणामकारी मानते हैं उनके लिए यह अटकल का विषय होगा कि वे इस संयोग की परिणतिस्वरूप कौन-कौन सी विशेष घटनाएं होने की कल्पना कर सकें।

हिंदू माइथोलॉजी में विष्णु के दो अवतार सबसे महत्वपूर्ण हैं। एक भगवान राम का और एक भगवान श्रीकृष्ण का। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के तौर पर नवाजा जाता है जबकि श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र में बताया जाता है कि भगवान ने अपने इस अवतार में किसी वर्जना यानी मर्यादा को नहीं माना। फिर भी यह कहा जाता है कि राम सिर्फ 16 कलाओं के अवतार थे जबकि श्रीकृष्ण 32 कलाओं के। इससे सनातनियों के मूल्यबोध को समझा जाना चाहिए, जिसमें जड़ता नहीं गतिशीलता प्रतिबिंबित रही है, इसलिए उसने सबसे पहले मूर्तिभंजक चरित्र और आचरण को क्रांतिकारी तत्व के रूप में पहचाना। जिसका प्रस्फुरण नये युग के संक्रमण के लिए होता है।

हिंदू धर्म में जब-जब होई धरम के हानि, बाढहिं अधम असुर अमिभानी, तब-तब प्रभु धर विविध शरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा की अवधारणा व्याप्त रही है। जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में एक चौपाई के माध्यम से अभिव्यक्त किया। लेकिन वास्तविकता यह है कि शायद ही कोई कालखंड ऐसा हो जब नैतिक व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी न की जाती हो अथवा जब नैतिक व्यवस्था का पूरी तरह विलोप हो गया हो। लेकिन भौतिक परिवर्तनों से जब नैतिक मूल्यों की पहचान करने में असमंजस की स्थिति पैदा हो जाए तो नैतिक व्यवस्था के नवीकरण के लिए कुछ अवतार और कुछ घटनाएं होती हैं। हिंदू माइथोलॉजी में अवतार की संकल्पना को इसी रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। भगवान राम के समय धर्म की तो कोई हानि दूसरे पक्ष में भी नहीं थी क्योंकि अगर रावण अधर्मी होता तो भगवान शिव के लिए तपस्या क्यों करता। लेकिन उस समय लघु राज्यों से साम्राज्य की ओर अग्रसरता समय की मांग बन चली थी। इसके लिए युद्ध के रूप में प्रयास भगवान राम के एक पीढ़ी पहले ही शुरू हो गए थे क्योंकि उनके पिता दशरथ द्वारा राज्य विस्तार के लिए कई युद्ध लड़े जाने का वर्णन मिलता है। लेकिन बड़े और स्थापित राज्यों के एकीकरण के लिए युद्ध का सूत्रपात राम ने किया। यह उपक्रम उन्होंने केवल लंका विजय तक सीमित नहीं रखा बल्कि अयोध्या साम्राज्य की बागडोर विधिवत संभालने के संभालने के बाद अश्वमेध यज्ञ के माध्यम से उन्होंने अपने राज्य के विस्तार का क्रम तेज बनाए रखा।

लेकिन कृष्ण की स्थिति दूसरी है। उनके समय जो हस्तिनापुर साम्राज्य था उसमें सत्ता के मद के कारण भारी चारित्रिक गिरावट व्याप्त होती जा रही थी। कृष्ण के समय धर्म की हानि को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। जहां कौरव तो अनीति पर चलते ही थे, पांडवों में भारत रत्न से भी ज्यादा नोबल पुरस्कार किस्म के धर्मराज के अलंकरण से नवाजे जाने वाले युधिष्ठिर तक का आलम यह था कि वे पहले अपने छोटे भाई अर्जुन द्वारा प्रतियोगिता के माध्यम से वरण कर लाई गई सुंदरी द्रौपदी को साझा करने के लिए मां कुंती की गलतफहमी का सहारा लेने से नहीं चूके। उऩ पर द्यूतक्रीड़ा का ऐसा नशा सवार था कि बाद में उन्होंने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया।

अब ध्यान देने वाली बात यह है कि राम का युग साम्राज्य के निर्माण की शुरुआत का था तो कृष्ण का युग साम्राज्य की व्यवस्था में व्याप्त निरंकुशता की चुनौती से पार पाने का था। हस्तिनापुर में क्रांति के केंद्र में आने के पहले ही कृष्ण का नये युग का अवतरण करने वाले महापुरुष के रूप में आविर्भाव शुरू हो गया था। कृष्ण के पास कोई सत्ता नहीं थी और न ही वे सत्ता की प्रतियोगिता में शामिल थे। उन्होंने सत्ता निरपेक्ष होते हुए भी मथुरा में कंस के आततायी राज का अंत कराया और अपनी भूमिका पूरी करने के बाद उग्रसेन को महाराज बनाकर वे एक ओर हट गये। इस तरह कृष्ण निरंकुश राजाओं का उन्मूलन करते-करते हस्तिनापुर साम्राज्य के केंद्रबिंदु तक पहुंच गये।

श्रद्धालु प्रायः वहां उनकी भूमिका का केवल एक पक्ष देखते हैं कि उन्होंने पांडवों को कौरवों का अंत कर साम्राज्य का अधिकार दिला दिया जबकि यह अधूरा सच है। चूंकि पांडव भी पतित व्यवस्था में पोर-पोर डूबे थे इसलिए कृष्ण ने उनको भी नहीं बख्शा। सही बात यह है कि पांडवों ने अपने पालतू श्वान के साथ परीक्षित को राजपाट सौंपकर पहाड़ों की ओर प्रस्थान स्वेच्छा से नहीं किया बल्कि महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण के धिक्कार ने उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया। महाभारत के युद्ध तक जिसने भी आंखें खोली थीं उन सब पर उस समय की अनीतिपूर्ण व्यवस्था का प्रभाव चेतन या अचेतन रूप में विद्यमान था इसलिए उन्होंने कौरवों की समाप्ति के साथ-साथ पांडवों और उनके उस समय तक दुनियां में आकर आंख खोल चुके उनके उत्तराधिकारियों का सफाया करा दिया। कृष्ण की लीला ऐसी थी कि परीक्षित भी अपना समय पूरा नहीं कर पाया और ऋषि के श्राप से तक्षक के डसने से वह अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गया और उसके बाद जनमेजय ने हस्तिनापुर साम्राज्य के सूत्र को आगे बढ़ाया क्योंकि वह महाभारत कालीन नीति-अनीति से एकदम अछूता था।

मार्क्स की स्थापना है कि भौतिक परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ-साथ मानवीय समाज तार्किक प्रगति की ओर अग्रसर होता है, जिसे उसने इतिहास के वैज्ञानिक विकासवाद का नाम दिया है। मार्क्स के जन्म के कई सदी पहले भारतीय समाज प्रकृति की इस प्रवृत्ति से अवगत हो चुका था और कृष्ण की कथा में यह सार झलकता है। व्यवस्था के वृहद हो जाने के बाद सकारात्मक परिवर्तन सत्ताएं नहीं करतीं बल्कि सत्ता निरपेक्ष कोई महापुरुष करता है। कृष्ण ने सत्ता पर अपना नैतिक नियंत्रण स्थापित कर विकास के पहले पायदान पर इस प्रवृत्ति को परिलक्षित किया था। जो शाश्वत है। आजादी के बाद नई व्यवस्था के निर्माण के लिए अलग तरह के विचारों के साथ गांधी आये। आजादी के बाद भारत में अखंडता और लोकतंत्र की मजबूत नींव इसीलिए बन सकी क्योंकि उसका नियमन सत्तागत स्वार्थ से परे व्यक्तित्व ने किया था। लोकतंत्र के सुचारु प्रवाह के लिए जब देश में कांग्रेस के अखंड शासन को भंग करने की आवश्यकता पनपी तो गांधी के बाद कृष्ण का नया अवतार लोकनायक जयप्रकाश के रूप में हुआ।

लोकतांत्रिक मशीनरी के पुर्जे पुराने पड़ जाने से घिस जाने के कारण नये टूल फिट करने की जरूरत कुछ वर्षों से महसूस हो रही है। देश में ताजा सत्ता परिवर्तन के दौर के पीछे यही प्रसव पीड़ा काम कर रही है। लेकिन इसे समझा जाना चाहिए कि वृहत्तर व्यवस्था के दौर में सार्थक परिवर्तन की उम्मीद सत्ताओं से नहीं की जा सकती। इसीलिए केंद्र और विभिन्न राज्यों में सत्ता परिवर्तन के बाद भी लोग महसूस नहीं कर पा रहे हैं कि किसी भी मोर्चे पर कोई बड़ा बदलाव आया है। बात कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की नहीं है। एक नई नैतिक व्यवस्था के निर्माण की बाट देश जोह रहा है। जो नहीं हो पा रहा है। सत्ता का चरित्र होता है अपने को सबसे निर्मल-धवल सिद्ध करना और वर्तमान सरकार भी यह कर रही है। लेकिन ऐसा है नहीं। आम आदमी को जिन कामों में वास्ता पड़ता है उनमें उसका शोषण पहले से ज्यादा बढ़ गया है। फिर लोग कैसे मानें कि भारत भ्रष्टाचारमुक्त हो गया है। बड़े स्कैम नहीं हो रहे तब सरकारी खजाना फुल हो जाना चाहिए। लेकिन करों और शुल्कों में अंधाधुंध बढ़ोत्तरी हो रही है जिससे इतनी महंगाई हो गई है जो लोगों के सहने की क्षमता से परे है। फिर कैसे माना जाए कि भारत  बदल रहा है।

लोग इसके बावजूद प्रसन्नता का अभिनय कर रहे हैं तो इसके पीछे केवल एक ही कारण है कि सरकारी पक्ष जलन की जो मनोवृत्ति है उसको पूरी क्षमता से उभारने में कामयाब है। सोशल मीडिया पर सरकार के काम की चर्चा करने की बजाय लोग इसमें वक्त जाया करते हैं कि उनकी अमुक कुरीति के बारे में यह कहा गया था जबकि दूसरे समुदाय में फलां-फलां कुरीति व्याप्त है। उसके लिए अभी तक कुछ नहीं कहा गया था। सरकार अपनी नाकामी का पूरा फायदा इसमें उठा रही है।

तो इस स्वाधीनता दिवस और कृष्ण जन्माष्टमी के एक ही दिन होने का संदेश यह है कि परिवर्तन के लिए किसी सत्ता निरपेक्ष कृष्ण के आने की जरूरत है। कृष्ण हैं तो मूर्तिभंजक भी होगा। महाभारत की लड़ाई में कृष्ण बार-बार धर्मयुद्ध के उसूल पांडवों से तुड़वाते थे क्योंकि अवतारी पुरुष होने के नाते भविष्यद्रष्टा होने की वजह से उन्हें पता था कि तत्कालीन नैतिकता कितनी खोखली है। जिसके हर कंगूरे को ध्वस्त किया जाना चाहिए और नैतिक आवश्यकताओं की नये सिरे से पहचान की जानी चाहिए। जैसे कि इस देश में संसाधनों की कोई कमी नहीं थी फिर भी 90 फीसदी आबादी भूखी और नंगी थी क्योंकि चंद लोगों ने संसाधनों पर एकाधिकार बनाए रखने के लिए सोना-चांदी जमीन में गाड़ रखा था। बाद में जो चीज हमें नैतिक व्यवस्था के झोल के रूप में दिखाई देती है दरअसल वह संसाधनों को बाहर लाकर उसे प्रवाहमान करने की उथल-पुथल थी। बहुसंख्यक जनता में उद्यमता बढ़ी जिसमें स्थूल तौर पर दिखाई देने वाला भ्रष्टाचार एक बड़े कारक की भूमिका अदा कर रहा था। इससे भुखमरी और अन्य बुनियादी अभाव की समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण किया गया, इसलिए नैतिकता के पाखंड की आड़ में संसाधनों के एकीकरण और उद्यमता के अवसरों का विनाश स्वीकार्य नहीं हो सकता। अनुशासन के नये मापदंड तैयार करने के लिए नये सिरे से सोचने का मौका आ गया है। निजीकरण के नाम पर कुछ लोगों को पहले की तरह इतनी दौलत इकट्ठा करने का मौका दिया जा रहा है कि वे उसका उपयोग कर पाने की सोचने में असमर्थ हो जाएं और इसलिए अपने कब्जे में बनाये रखने की हविस में जमीन में गाड़ने लगें।

सरकार निजीकरण की बड़ी समर्थक है लेकिन बड़े देशों की तरह निजी क्षेत्र में भारी मुनाफा बढ़ने के बावजूद कामगारों को वैधानिक वेतन दिलाने के कर्तव्य से पीछे क्यों हट जाती है। पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने में उसकी नानी क्यों मर रही है। संसाधनों के विकेंद्रीकरण का दौर पूरा हो गया है जिसमें निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार पनपा। अब जरूरत इस भ्रष्टाचार को खत्म करने की है लेकिन साथ-साथ में ईमानदारी से लोगों को उनके काम के अनुरूप वेतन दिलाने की जिम्मेदारी भी सरकार को पूरी करनी होगी। इसका बहुत संबंध बाजार की रफ्तार को बनाये रखने से भी है। अगर अकूत मुनाफा कमाते चले जाने के बावजूद मीडिया कंपनियां, कान्वेंट स्कूल नाममात्र के वेतन में लोगों से काम कराने की आदत नहीं छोड़ेंगे तो ग्राहकों की संख्या सिमट जाने से बाजार का भट्टा बैठ जाएगा। बड़ी बेईमानी रोजगार के अवसर समाप्त करना और लोगों को बेगारी में धकेलना है। इसलिए बेईमानी के स्थूल रूप की चर्चा निहित स्वार्थियों के हितों के लिए करते रहना कपटाचार है। बहरहाल नैतिकता की समझ बहुत बारीक होती है और इसे कोई कृष्ण ही समझ सकता है। लगता है कि आज फिर एक संधिकाल है जिसमें किसी न किसी कृष्ण का अवतार होना है। हम इंतजार में हैं कि प्रतीक्षित कृष्ण जन्म किस दिन होने वाला है।

 

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