जिंदगी की रेल को हादसों की सुरंगों से गुजरना पड़ता है, लेकिन कितना भी बड़ा हादसा क्यों न हो जीने के जज्बे को तोड़ नहीं सकता। यह दिखाया है आनंद पाल ने, बचपन में एक हादसे में जिसके दोनों हाथ अलग करने पड़े थे। जिससे उसकी जिंदगी के आगे घनघोर अंधेरा छा गया था। लेकिन आखिर उसने अपने मजबूत इरादों से जिंदगी की डूबती नैया को संभाल लिया और अब पैरों से हाथ के द्वारा किए जाने वाले काम भी वह इतने सलीके से करने लगा है कि देखकर लोग भूल जाते हैं कि वह कहीं से अधूरा है।
यूपी के जालौन जिले के मुख्यालय उरई से 15 किलोमीटर से भी कम दूरी पर बसे हरदोई गूजर के रहने वाले आनंद पाल आज 24 साल के हो चुके हैं। जब उनकी उम्र छह साल थी वे तालाब में कूद-कूदकर नहाने का खेल खेल रहे थे उसी समय बिजली की लाइन उन पर टूटकर गिर पड़ी और उनके दोनों बाजुओं को करंट भरे तार छू गए। जिसके बाद उनका कई महीने इलाज चला, लेकिन बेजान हो चुके उनके हाथों में सलामती की कोई उम्मीद डाक्टर तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं जगा सके। आखिरकार नौबत यह आ गई कि उन्हें बचाने के लिए उनके दोनों हाथ बाजुओं से अलग कर दिये गये।
हाथों के बिना जिंदगी की गाड़ी कैसे चल सकती है, क्योंकि तमाम काम सिर्फ हाथों से ही हो सकते हैं। उसके लिए तो हाथों के बिना जीना एकदम नामुमकिन सा है जो पैदायशी तौर पर इनकी नेमत से वंचित नहीं था, लेकिन एकाएक जिसके हाथ गायब हो गए हों। इसलिए आनंद पाल के लिए जिंदगी बहुत भारी हो गई थी। दो साल तक वे बिना हाथों के जीने के सवाल की उधेड़बुन में पल-पल मर-मरकर जीते रहे। उन्हें किसी दिन एक सयाने ने समझाया कि हाथ नहीं रहे तो क्या बहुत लोग ऐसे हैं जो बिना हाथ के भी सारा काम करते हैं। उस सयाने की बात ने आनंद में जीने के हौसले को फिर जिंदा कर दिया और सबसे पहले उन्होंने पैरों से लिखने का अभ्यास करते हुए इस दिशा में शुरुआत की।
हरदोई गूजर में एक इंटर कॉलेज है, जिसके शिक्षकों ने उन्हें जमकर प्रोत्साहित किया और अपने यहां उनका एडमीशन करा लिया। क्लास के साथियों ने भी उनका खूब सहयोग किया। आनंद जब एक के बाद एक ऊंचे क्लास के पायदान में हर इम्तिहान के बाद आगे चढ़ने लगा तो उसकी हीनभावना मन से पूरी तरह निकल गई और उसे आगे की अपनी अंधेरी राह बहुत ही उजास भरी दिखने लगी।
बाद में उसने जालौन जिले के सबसे प्रतिष्ठित डीवी डिग्री कॉलेज से बीए और एमए किया। इस बीच उसने जॉब तलाशनी शुरू कर दी ताकि वह भी अपने पिता और भाई का हाथ बंटा सके, जो काम की तलाश में उड़ीसा, गुजरात जैसे दूर राज्यों तक जाने को मजबूर रहते थे। एक दिन आनंद रिलायंस के डीलर से नौकरी की बात करने गये। इसके बाद वह गांव लौटने के लिए टूसीटर पर बैठने के पैसे न होने की वजह से जिला परिषद से एक किलोमीटर दूर बस स्टैंड का रास्ता पैदल नाप रहे थे। रास्ते में लीड बैंक के स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान के अऩुदेशक रोहित त्रिपाठी अपनी बाइक से गुजरे तो उन्होंने आनंद को देखकर बाइक रोक दी। बोले कहां जाना है। उनके बस स्टैंड कहने पर उन्होंने उसे अपने साथ बैठा लिया और कहा कि चलो मैं तुम्हें वहां तक छोड़े देता हूं। रास्ते में उन्होंने आनंद की रामकहानी सुनी तो बहुत द्रवित भी हुए और प्रभावित भी हुए। उन्होंने आनंद के सामने कंप्यूटर सीखने का प्रपोजल रखा। उसने तपाक से हां कह दिया। आनंद ने इसके बाद साधारण लड़कों से कहीं तेजी से कुछ ही दिनों में कंप्यूटर पर कमांड कर लिया। इसके बाद उन्होंने हरदोई गूजर स्थित यूपी इलाहाबाद ग्रामीण बैंक शाखा के प्रबंधक से कंप्यूटर सेंटर खोलने के लिए लोन में हेल्प मांगी पर मैनेजर साहब ने साफ मना कर दिया कि तुम अपंग हो, तुम्हारा सेंटर चलेगा नहीं, बैंक का पैसा डूब जाएगा।
रोहित ने फिर उसकी मदद की। उन्होंने आनंद को अपनी क्रेडिट पर 4 कंप्यूटर और कुर्सियां दिलवा दीं। आनंद का इससे काम चल गया और हरदोई गूजर में बैंक के सामने ही उन्होंने अपना सेंटर शुरू कर दिया। एक दिन रोहित त्रिपाठी तत्कालीन मुख्य विकास अधिकारी शंभूनाथ (आईएएस) को उसके सेंटर पर ले गये। उन्होंने अपनी आंखों से आनंद का काम देखने के बाद हरदोई गूजर के बैंक मैनेजर को बुलाकर फटकारा। तब बैंक मैनेजर ने तुरंत 80 हजार रुपये का लोन आनंद के लिए मंजूर कर दिया। जिससे सबसे पहले आनंद ने रोहित के उधार को चुकता किया। अब आनंद बैंक के लोन से भी समय से पहले ही बेबाक हो चुके हैं। उनके सेंटर की आमदनी से न केवल खुद का खर्चा निकल रहा है बल्कि पूरे परिवार में खुशहाली छा गई है। आनंद जैसे लोग समाज के रियल हीरो हैं, जिनकी कहानी जिंदगी की लड़ाई में हारते हुए लोगों में नई उम्मीदें और नया जोश भरती है।







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