उरई,: आटा रेलवे स्टेशन के नजदीक परासन गांव में पितृ पक्ष के दौरान पुरखे बेतवा नदी में मत्स्यावतार लेकर आते है। इस लोक मान्यता के नाते पितृ पक्ष में प्रति वर्ष लोग दूर-दूर से आकर मछलियों को भोजन कराते हैं। इस बार मौरंग के ट्रकों ने रास्ता इतना खराब कर दिया कि कम ही लोग आये।
महाभारत कालीन महर्षि पाराशर का जन्म स्थान होने से परासन तीर्थ स्थल है। पितृ पक्ष यहां के लिए खास होता है, जब बेतवा नदी में डेढ़-दो फिट तक लंबी मछलियां मंदिर के नीचे बने घाट पर आ जाती है।
1992 में तो लगभग आदमकद मछलियों के ‘दर्शन’ होते थे, जो आटे का पूरा पिंड लोगों के हाथों से झपट लेती थीं। कई श्रद्धालु तो मछलियों को अपने अंक में भरकर निशानी के तौर पर उनकी नाक में सोने का छल्ला पहना देते थे। बाद में शिकार के चलते मछलियां डरने लगीं। पिछले तीन वर्ष से ये यहां नहीं आ रही थीं। इस बार खूब आयीं तो लोग नहीं आ सके। सड़क कितनी खराब कि 13 किमी. का सफर डेढ़-दो घंटे में पूरा होता है। लोग चार बजे से ही जुटना शुरू हो जाते है। 5 बजे तक खासी भीड़ हो जाती है। कोलाहल बढ़ने पर मछलियां बीच नदी में चली जाती है।
श्रद्धालु नदी में खड़े होकर पैरों के पास उनकी गुदगुदी का अहसास कर लेते है। आटे की गोलियां भी हाथ पानी के अंदर डालकर मछलियों को चुगानी पड़ती है। परासन निवासी और पूर्व जिला पंचायत सदस्य करन सिंह ने बताया कि पितृ पक्ष में आने वाली मछलियां असाधारण रूप से बड़ी होती है और केवल इसी अवधि में रहती है।
सहायक निदेशक मत्स्य आरडी प्रजापति ने बताया कि परासन के विलक्षण मत्स्य दर्शन पर विभाग द्वारा जांच कराये जाने की कभी पहल हुई, यह जानकारी में नहीं है।







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