उरई। पिछले पांच वर्षों से कदौरा क्षेत्र के परासन तट पर बेतवा में नवरात्रि के पूर्व के पखवारे में आने वाली मेहमान मछलियों की तादाद लगातार घट रही है। लोगों ने प्रवासी मछलियों के आने के समय को अपनी धार्मिक आस्था से जोड़ लिया था। जिसकी वजह से क्षेत्र के ही नही देश प्रदेश के कई हिस्सों से लोग इन मछलियों को आटा खिलाकर पुण्य कमाने के लिए इस सीजन में परासन पहुंचते थे लेकिन मछलियों की कम होती जा रही आमद परासन के श्रद्धालुओं में आकर्षण के फीके होते जाने का कारण बन गया है।
आज से डेढ़-दो दशक पहले क्वांर के पहले पखवारे में परासन घाट पर प्रवासी मछलियां प्रकट होती थीं जो आकार में आदमकद तक रहती थीं। ऋतु बदलने के साथ प्रवासी जीव-जंतुओं का अपने इलाका छोड़कर अनुकूल इलाके में पहुंच जाने का सिलसिला प्राकृतिक विलक्षणता की एक आम विशेषता है। लेकिन परासन में प्रवासी मछलियों के आने के पीछे कोई वैज्ञानिक कारण नही खोजे गये। चूंकि यह मछलियां संयोग से पितृ पक्ष में देखी जाती थीं। इसलिए लोगों ने इन्हें अपने पुरखों के दर्शन के रूप में शुरू कर दिया। इन मछलियों के शिकार पर धार्मिक कारण की वजह से निषेध लागू हो गया। इसकी बजाय लोगों ने अलसबेरे पितृ पक्ष में परासन पहुंचकर इन मछलियों को आटा चुगाने की रवायत बना ली।
मछलियां भी इसके चलते श्रद्धालुओं के प्रति दोस्ताना रवैया रखने लगीं। बेतवा में घुसकर श्रद्धालु जब आटे की गोलियां चुगाने के लिए मछलियों की ओर तांकते थे तो मछलियां उछलकर उनके हाथ से आटे की गोलियां ले लेती थीं। इसे बहुत शुभ माना जाता था। मछलियां लोगों के गोद में तक आकर बैठ जाती थीं। जिसे लेकर कई मिथक और किवदंतियां प्रचलित रहीं।
लेकिन बेतवा में मौरंग के अंधाधुंध खनन के दुष्प्रभाव के चलते उत्पन्न हुईं पर्यावरणीय विकृतियों ने इन मछलियों को परासन से दूर कर दिया है। अभी भी कई श्रद्धालु पुरखों के दिनों में मछलियों को आटा चुगाने के लिए परासन आते हैं लेकिन इनकी तादाद अब बहुत कम रह गई है। अब पहले जैसी विशालकाय मछलियों को देखना भी दुर्लभ हो गया है। वास्तविकता तो यह है कि कुछ वर्षों से विरले ही लोग है जिनको मेहमान मछलियां दिख पाती हैं। ज्यादातर लोग नदी में अंधाधुंध आटे की गोलियां फेंककर संतोष कर लेते हैं। परासन की महिमा में लगातार आ रही गिरावट से गांव और क्षेत्र के लोगों की मायूसी बढ़ती जा रही है।







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