राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय समन्वय समिति के वृंदावन स्थित केशव धाम में आयोजित तीन दिवसीय वैचारिक महामंथन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनकी हैसियत का अहसास करा दिया गया। मुख्यमंत्री और उनके दोनों डिप्टी सीएम जब कार्यक्रम में पहुंचे उस समय पहला सत्र स्टार्ट था। उन्हें बाहर बैठकर पहले सत्र के समाप्त होने तक इंतजार कराया गया। संघ ने बता दिया कि भले ही धर्माचार्यों के सहारे राजनीति को नियंत्रित करना उसकी रणनीति का सबसे अहम पहलू क्यों न हो लेकिन उनके तपेतपाये बुजुर्ग यह इल्हाम कतई नहीं कर सकते कि किसी गद्दी के अध्यावसाय के गुण से रहित युवा महंत की चेतना बहुत परिपक्व होगी इसलिए उसकी उद्दंडता को नतमस्तक होकर झेलना उन लोगों की मजबूरी हो। संघ द्वारा समेटे जा रहे जनाधार में बिखवार की नौबत आ रही है जिससे संघ खिन्न है। संघ के सम्मेलन के बाद योगी को ऐसे आईपीएस अधिकारी को मिर्जापुर रेंज का डीआईजी बनाना पड़ा जिसका प्रगल्प आचरण चर्चा का विषय रहा है। मायावती के राज में जिसकी तूती बोलती रही है। संघ की बैठक में सहारनपुर के जातीय दंगे की चर्चा हुई जिसमें संघ के अधिकारियों की तल्खी योगी सरकार के प्रति छिपी नहीं रह सकी। प्रेमप्रताप को मिर्जापुर रेंज का डीआईजी बनाया जाना संघ के इसी एक्शन के फालोअप के रूप में देखा जा रहा है।
संघ के इस महामंथन में 39 संगठनों ने हिस्सेदारी की। इनके प्रतिनिधियों ने बहुत खुले दिमाग से इस मंथन में अपने विचार रखे। सरकार भले ही आत्ममुग्ध हो लेकिन संघ ने अाभास कराया कि वह गफलत से उबरे रहकर चीजों को उसके असली रूप में देखने की क्षमता रखता है। इसी कारण संघ के पदाधिकारियों ने नोटबंदी के सरकार के फैसले को महिमामंडित करने की बजाय यह कहकर उसे परोक्ष में लताड़ा कि इस फैसले के कारण रोजगार की स्थिति ठीक नहीं है। अब सरकार ध्यान रखे कि नवयुवकों में रोजगार को लेकर किसी तरह के क्षोभ का विस्फोट न हो पाये। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कायदे से क्लास ली गई। हर सरकार के सामने चुनौतियां उभऱती हैं जिनसे संबंधित प्रश्नों का उत्तर देते समय हठधर्मिता दिखाने की बजाय वह कोशिश करती है कि उसके कारणों को लेकर ऐसी दलीलें परोसी जाएं जिससे उसका प्रभाव तनु हो जाये। कुशल सरकार ऐसे अवसर पर उसके उत्तर में विश्वनीयता झलके और वह लोगों को संतुष्ट कर सके कि सरकार को चुनौती का इल्म है और वह उससे पार पाने की ईमानदारी से कोशिश करने का इरादा भी रखती है।
योगी के साथ समस्या यह है कि वे योगी पहले हैं मुख्यमंत्री बाद में हैं। इस नाते कोई उन पर उंगली उठाए यह उनको गवारा नहीं है इसलिए कानून व्यवस्था से जुड़े सवाल हों या दूसरे मुद्दों के सवाल योगी उत्तर देते हुए धृष्टता की हद तक जा पहुंचते हैं पर संघ ने उन्हें अहसास करा दिया है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था ठीकठाक है। उनके इस दावे को किसी कीमत पर मंजूर नहीं किया जा सकता इसलिए महामंथन में उनसे कहा गया कि उनकी सरकार आईने में अपने को देखे और कानून व्यवस्था की खराबी के यथार्थ को झुठलाने की बजाय उसे ठीक करने की कोशिश में ढंग से लगे।
अखिलेश तो सार्वजनिक रूप से कह देते थे कि शुरुआत में वह ट्रेनी मुख्यमंत्री थे लेकिन अब सरकार चलाने का मंत्र उन्होंने अच्छी तरह सीख लिया है लेकिन योगी को इसमें हेती लगती है क्योंकि वे महंत के पद पर होने से स्वयं को त्रिकालदृष्टा समझते हैं इसलिए मानते हैं कि उन्हें सीखने की क्या जरूरत है। साधारण नेताओं की तरह सीखने की बात कहने पर उन्हें अपना प्रभामंडल विकीर्ण होने का खतरा दिखने लगता है लेकिन संघ ने उन्हें अहसास कराने की ठान ली है कि वे तपस्वी हो सकते हैं लेकिन सरकार चलाने के लिए उन्हें बहुत कुछ सीखने की जरूरत है (यथा उपनिषद में वर्णित जनक सुकदेव प्रसंग)। इसलिए वृंदावन की बैठक के बाद प्रदेश में प्रशासन को चुस्त बनाने के लिए अपने ही द्वारा नियुक्त तमाम अधिकारियों को योगी सरकार को ताबड़तोड़ इधर से उधर करना पड़ा। जाहिर है कि संघ अब योगी को समुचित ट्रेनिंग देने पर आमादा हो चुका है। इसकी झलक कई पहलुओं से दिखाई पड़ेगी।
वृंदावन में संघ के पहले सत्र में योगी को हॉल में बैठाकर इंतजार कराया गया लेकिन दूसरे सत्र में उन्हें बैठक के अंदर बुला लिया गया क्योंकि इस सत्र में उनको सह सर कार्यवाह डा. कृष्णगोपाल के सामाजिक समरसता पर बौद्धिक को सुनाने की जरूरत संघ अनुभव कर रहा था। ताकि उनके ज्ञानचक्षु खुल सकें और औकात में रखते हुए दलितों को अपनाने की विकारयुक्त धारणा से वे बाज आ सकें।
मंत्रियों और सांसदों के आचरण पर भी संघ के महागठबंधन में आलोचनात्मक पुट के साथ चर्चा हुई जो पद मिलने के बाद अपने को अहंकार से दूर नहीं रख सके हैं। भाजपा के ज्यादातर सांसद और विधायक नेतृत्व के तेज से तो हीन हैं ही क्योंकि कार्यकर्ता के नाम पर जानबूझ कर प्रत्याशी बनाते समय निस्तेज लोगों को प्राथमिकता दी गई थी ताकि वास्तविक नेतृत्व निष्कंटक होकर कार्य कर सके। लेकिन सामाजिक घुलनशीलता और विनम्रता के मामले में तो अपनी पृष्ठभूमि के मद्देनजर लोगों को कायल करने के काम उन्हें करने चाहिए थे पर इस मामले में तो वे अपने को सपा जैसी पार्टियों तक के पासंग भर पेश नहीं कर पा रहे। उनका लालच अधभरी गगरी की तरह छलकता है जिसकी वजह से वे केवल क्लाइंटों से संबंध बना रहे हैं। उन्हें अपने कार्यकर्ताओं तक की मदद करने में उलझन होती है क्योंकि उनसे पैसे मिलने से रहे। संघ ने इस मामले में भी सरकार और भाजपा के पदाधिकारियों को पर्याप्त हिदायत दी हैं। मोदी के पास संघ के महामंथन में यह मुद्दा उठने का फीडबैक पहले से था इसलिए उन्होंने मंत्रिमंडल में बदलाव का फ्यूजवायर महामंथन के समय पहले से जोड़ लिया था। यूपी में संघ के इस रुख से क्या तूफान आयेगा इसकी कल्पना करके माननीय सहमे हुए हैं।
योगी को हर बात में मुसलमानों को बीच में लाने की बीमारी है। इस वजह से सरकार का काम ढंग से नहीं हो पा रहा। संघ ने उनके प्रतिक्रियावाद को ध्यान में रखकर अपने बोलचाल और मुहावरों में उनके जैसे मुख्यमंत्रियों के लिए नमूने के रूप में मॉडल टेक्स्ट सामने रखा। इस समागम में राम मंदिर की चर्चा नहीं होने दी गई। हिंदुत्व की बजाय भारतीयता की भावना और पहचान को बनाये रखने की बात कही गई। संकेत साफ है कि भारतीयता की गुणवाचक संज्ञा में हिंदुत्व से कहीं बहुत ज्यादा व्यापकता है जिसके मद्देनजर उसका चुनाव किया गया। भारतीयता के नाम से किसी को पृथक्करण के बोध का जोखिम नहीं है। आखिर रीति-रिवाजों, खान-पान और अन्य तरीकों में हिंदुस्तानी मुसलमानों की परंपराएं भी अनूठी हैं। जिसमें उनका दुनिया के किसी कोने के मुसलमानों से मेल नहीं हो सकता। यह परंपराएं उनकी शान से जुड़ी हुई हैं। इसलिए कोई उनको इनका परित्याग करने के लिए नहीं बहका सकता। इस तरह संघ ने समग्रता में भारतीयता को उभारने का उपक्रम करते हुए योगी को उनके लिए आवश्यक मंत्र दिया है जो बेहतर नीति है।








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