उरई। किशोर बंदियों के भविष्य को पटरी पर लाने के लिए स्थानीय जेल में शुरू किये गये अभिनव प्रयोग दूसरी जेलों के लिए मिसाल बन सकते हैं। पहले बाल बंदियों के लिए जिला जेल के सामने अलग से एक नई जेल बनाई गई थी। लेकिन अब उसे बंद किया जा चुका है। किशोर जेल को मुख्य जेल के ही एक पोर्शन में स्थापित कर दिया गया है। इस जेल में लगभग 30 किशोर निरुद्ध हैं। ये बंदी वे हैं जो अभी अभ्यस्त अपराधी नही हुए। किशोर जेल के पीछे यह अवधारणा प्रचलित है कि कम उम्र में परिस्थितिवश गुमराह होकर अपराध करने वालों को अभ्यस्त अपराधी नही बनने दिया जाना चाहिए। इसलिए उनके कारागार वास्तव में सुधारगृह हैं। तांकि उनकी जिंदगी समय रहते पटरी पर लाई जा सके। दूसरी जगह इस अवधारणा पर कितना अमल हो रहा है यह शोध का विषय हो सकता है। लेकिन उरई के किशोर कारागृह में उनकी रचनात्मकता को उभारने में पूरा जोर लगाया जा रहा है। यहां के हालात देखकर यह माना जा सकता है कि किशोर सुधारगृहों को उनकी अवधारणा के मुताबिक सार्थक करने के लिए जेल के अधिकारियों की व्यक्तिगत रुचि और निष्ठा का सर्वोपरि महत्व है। यहां के जेल अधीक्षक सीताराम शर्मा इस सेवा में आने के पहले शिक्षक थे और शिक्षक के भाव से वे अभी भी दूर नही हो पाये हैं। इसलिए उन्होंने किशोर बंदियों को अच्छे नागरिक के रूप में तराशने के लिए व्यक्तिगत तौर पर जहमत मोल लेने में चूंक नही की और नतीजे सामने आये हैं। इसके तहत उनका प्रयास हर किशोर बंदी के हुनर को परखने और उसी अनुरूप उसे तराशने में जुट जाने का है। कुछ किशोर बंदी हैं जो बहुत अच्छे खिलौने बना सकते हैं तो कुछ दिलकश पैन्टिंग। इन बंदियों को उनकी अभिरुचि के मुताबिक मौका देने का फैसला उन्होंने किया। खिलौने बनाने वाले एक बंदी से उन्होंने ट्रैक्टर का माॅडल बनवाया है जिसे वे अपने दफ्तर में आगंतुकों को दिखाने के लिए रखे रहते हैं। उन्होंने पैन्टिंग में दक्ष किशोरों से चित्र बनवाकर उन्हें दफ्तर में सजाया है। इससे कलाकार किशोर बंदी बेहद उत्साहित हैं। उनकी मनोवृत्ति में जबर्दस्त बदलाव आया है। शरारतें करने की बजाय वे अब अपनी पेशकश को होड़ में सबसे आगे ले जाने की लगन दिखा रहे हैं। जल्द ही किशोर जेल में बंदियों की कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई जायेगी जो कि जेल के इतिहास में नया अध्याय जोड़ेगी।






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