लखनऊ। योगी सरकार ने पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह के सेवा विस्तार की फाइल केंद्र को भेज दी है। लेकिन सूत्र बताते हैं कि इस फाइल को शायद केंद्र मंजूरी न दे। सुलखान सिंह की बेदाग छवि में अभी भी कोई खोट नही तलाशा जा सका है लेकिन भाजपा नेतृत्व का मानना है कि इस पद पर छवि पर्याप्त नही है पुलिस महानिदेशक धाकड़ भी होना चाहिए। योगी सरकार के गठन के समय सपा कार्यकाल में कई सीनियर अफसरों को सुपरसीड कर बनाये गये डीजीपी जावीद अहमद के हाथ में सूबे के पुलिस की कमान थी। शुरुआत में उनके बदलाव को लेकर योगी सरकार के सामने दोहरी दुविधाएं थीं। एक तो प्रोफेशनल क्षमता में जावीद अहमद का प्रदर्शन अच्छा था दूसरे उनके उत्तराधिकारी को चुनने के लिए काफी उठापटक भी थी। लेकिन उस समय के माहौल में एक मुस्लिम डीजीपी को बनाये रखकर भाजपा की प्रदेश सरकार अपने ही लोगों का कोप भाजन बन सकती थी। इसलिए मजबूरी में जब उसने मन बनाया कि डीजी बदला ही जाना है तो किसे बनाया जाये इस पर पेंच फंस गया। आखिर में पुलिस सुधारों के लिए रिटबाजी करने वाले रिटायर डीजीपी प्रकाश सिंह के सुझाव पर वरिष्ठता में सबसे ऊपर होेने के नाते सुलखान सिंह के नाम पर टिक लगा दी गई। हालांकि उनका कार्यकाल कुछ ही महीने बचा था और योगी नीतिगत संदेश दे रहे थे कि वे नौकरशाहों के एक्सटेंशन की परिपाटी को मंजूरी नही देगें इसलिए सुलखान सिंह के चयन पर दबी जुबान से टीका-टिप्पणियां भी हुईं लेकिन ईमानदार अधिकारी को नौकरी के आखिरी समय सम्मान देने के नाम पर यह फैसला अंततोगत्वा हजम कर लिया गया। लेकिन कुछ महीने के कार्यकाल में सुलखान सिंह का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है। दरअसल संगठित अपराधों को कुचलने में वे कोई महारथ नही दिखा सके। उन्होंने इस कार्यकाल में बड़े बाबू जैसी छवि भर पेश की। इसलिए उनके बेमजा कार्यकाल को ढोना अब कोई गंवारा नही कर रहा। सीएम योगी को भी कहीं न कहीं इस बात का एहसास है इसलिए विकल्प में उन्होंने जो नाम सोच रखे हैं संयोग से वे एक ही जाति के हैं। वरिष्ठता की वजह से सुलखान सिंह के बाद सबसे ऊपर नाम प्रवीन सिंह का है लेकिन इसके बाद अगर उन्हें भी कार्यकाल कम रह जाने की वजह से इग्नोर करना पड़ता है तो भावेश कुमार सिंह और ओपी सिंह सरकार की सर्वोपरि पसंद हैं। इसलिए इन अधिकारियों के खिलाफ लामबंदी शुरू हो गई है। भाजपा के लोगों का ही कहना है कि प्रकाश सिंह की सलाह को बहुत महत्व नही दिया जाना चाहिए। वे मूल रूप से कांग्रेसी हैं। इसलिए कल्याण सिंह ने उनको डीजीपी से डीजी होमगार्ड बना दिया था। बाद में जब राष्ट्रपति शासन लगा तो कांग्रेसी राज्यपाल मोतीलाल बोरा ने उन्हें फिर डीजीपी के रूप में बहाल कर दिया। नौकरशाही में राजपूतों का सिक्का बुलंद करने की पर्दे के पीछे से भूमिका निभा रहे राजा भइया को मिल रहे बहुत महत्व से भी भाजपा का एक वर्ग नाराज है। भाजपा में इस कारण अंदरूनी स्तर पर पैदा हो रही दरारों को समय रहते पाटने के लिए ही महेंद्र पांडेय को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। डीजीपी के चयन में महेंद्र पांडेय की भी बड़ी भूमिका रहेगी। ऐसे में 30 सितंबर के बाद अगर सुलखान सिंह को सेवा विस्तार न मिला तो कोई छुपा रुस्तम उत्तर प्रदेश पुलिस का मुखिया बन सकता है।

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