
नई दिल्ली: विधानसभा और लोकसभा चुनाव की रट मोदी सरकार अपने कार्यकाल की शुरुआत से हे लगाये है । इस बहाने से भाजपा मध्यप्रदेश , राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के साथ ही लोकसभा चुनाव भी निपटा डालने के मूड में है । मोदी और शाह की जोड़ी का आकलन है कि 2019 तक इंतज़ार उसे भारी पड़ सकता है । सरकार को मिले फीडबैक के अनुसार 2019 तक मोदी के प्रति लोगों का खुमार उतर जाने का अंदेशा है ।
पिछले महीने बीजेपी शासित राज्यों के 13 मुख्यमंत्रियों और छह उपमुख्यमंत्रियों की मोदी-शाह के साथ हुई बैठक को भी इसी तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। दरअसल सरकार और संगठन में बेहद शीर्ष स्तर पर जिस तरह का विमर्श हो रहा है और संगठन को चाक-चौबंद बनाने का शाह का जिस तरह अभियान चल रहा है, उससे यही संकेत मिल रहे हैं कि तैयारी वक्त से पहले लोकसभा चुनाव करवाने की है। वैसे तो आम चुनाव जून 2019 में होने चाहिए, लेकिन बीजेपी तब तक इंतजार नहीं करना चाहती है। जून 2019 तक क्या स्थितियां बनती हैं/ कैसी चुनौती खड़ी होती है/ इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन 2018 तक बीजेपी को कहीं से कोई चुनौती मिलती नहीं दिख रही रही है। लिहाजा शीर्ष स्तर पर कहा जा रहा है कि अगर 10-12 महीने की सत्ता छोड़ने के बदले पांच साल का ‘राज’ मिल जाता है तो वह कहीं ज्यादा फायदेमंद रहेगा।
लोकसभा के साथ जब विधानसभाओं के चुनाव होते हैं तो वोटर्स के बीच स्थानीय मुद्दे गौण हो जाते हैं। चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित हो जाता है। ऐसे में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को सत्ता के खिलाफ नाराजगी का खतरा टल सकता है। लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनाव ही मोदी के नाम पर लड़ लिए जाएंगे।







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