उरई। प्रसिद्ध अंबेडकरवादी चिंतक डाॅ. रामाधीन ने कालपी के पास काशीरामपुर में अंबेडकर प्रतिमा को अपमानित किये जाने की घटना पर तीव्र क्षोभ जताते हुए जातिवादी शक्तियों और उनका पृष्ठ पोषण करने वाले प्रशासन की निंदा की है। अस्वस्थ्य होने के कारण बाहर निकलने में असमर्थ होने की वजह से डाॅ. रामाधीन की उक्त प्रकरण में प्रतिक्रिया सामने नही आई थी। आज उन्होंने एक जोरदार बयान जारी किया। जिसमें उन्होंने कहा कि काशीरामपुर के मामले से यह बात उजागर होकर सामने आ गई है कि जातिवादी और सामंती सोच के लोगों की डाॅ. अंबेडकर के प्रति नफरत की आग उनके दुनियां से चले जाने के 61 वर्ष बाद भी धधकना बंद नही हुई है। आखिर बाबा साहब ने क्या गुनाह किया था। क्या उनका यही गुनाह था कि उन्होंने उन लोगों की जो हजारों वर्षों से भारत में जानवर जैसा जीवन-यापन कर रहे थे की दशा पर सोचने के लिए लोगों को मजबूर करना चाहा था। निश्चित ही जातिवादी उनका यह गंभीर गुनाह मानते हैं और काशीरामपुर में स्थापित उनकी प्रतिमा के साथ इसी मानसिकता के तहत नीचतापूर्ण हरकत की गई। डाॅ. रामाधीन ने कहा कि बाबा साहब के अनुयायियों ने इस घटना पर कानून हाथ में न लेकर पुलिस को सूचित किया था लेकिन प्रशासन और पुलिस में जो लोग वर्तमान निजाम में केंद्र में हैं वे अपनी वर्ग चेतना कार्यशैली में झलकाये बिना नही रहे। डाॅ. रामाधीन ने कहा कि उनकी दृष्टि में काशीरामपुर में जो कुछ भी हुआ उसमें आस्था और अनास्थ की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस मुख्य तथ्य को अनदेखा कर समस्या का निदान संभव नही है। हिंदू क्या मुस्लिम सभी समाज के आस्था के पृथक-पृथक केंद्र हैं। संपूर्ण भारत में अनेक महापुरुषों की प्रतिमायें भी आस्था की केंद्र बिंदु हैं। समाज में एकरूपता कायम रखने के लिए सभी वर्गों के लोग एक-दूसरे के आस्था केंद्रों को सम्मान देते हैं। डाॅ. रामाधीन ने कहा कि डाॅ. अंबेडकर भी मात्र अनुसूचित जाति के आस्था के केंद्र नही हैं। उनका सम्मान तो हर एक किसी को करना चाहिए। लेकिन काशीरामपुर में ऐसा नही हुआ। उन्होंने कहा कि पुलिस भी पहुंची तो जूता पहनकर जबरन गले की अपमान जनक माला उतारने के लिए आगे बढ़ी जनता डाॅ. अंबेडकर का अपमान बर्दास्त न कर सकी और उसे करना भी नही चाहिए था। वे पूछना चाहते हैं डीएम और एसपी से कि क्या प्रशासनिक परिवेश में गांधी जी या अन्य महापुरुषों की प्रतिमाओं का सम्मान जूता पहनकर करने की परंपरा है। उन्हें जहां तक ज्ञान है उसके अनुसार भारतीय लोकतंत्र के राष्ट्रपति भी महापुरुषों का जूता उतारकर सम्मान करते हैं। फिर काशीरामपुर में जिस पुलिस अधिकारी ने जनता के प्रतिकार करने पर भी बाबा साहब के सम्मान में जूता उतारने की जहमत नही उठाई उसे कैसे सही ठहराया जा सकता है। यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है यदि पुलिस अधिकारी के दिल में संविधान निर्माता के प्रति सम्मान होता तो वे जूता पहने हुए प्रतिमा के नजदीक पहुंचने से रुक जाते और जो आगे हुआ वह न होता। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन से उनका अनुरोध है कि जनपद के अंबेडकरवादी मानवतावादी है, शांति प्रिय हैं अराजक नही हैं और अन्याय के विरुद्ध मुंह बंद करने वाले भी नही हैं। वह न्याय प्रिय हैं, अधिकारियों को भी न्याय प्रिय होना चाहिए इसलिए वे आस्था और अनास्था के बिंदु की गंभीरता को दृष्टिगत रखते हुए इस प्रकरण में कार्रवाई करें तो सकारात्मक परिणति संभव है।

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