
उरई । अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का बोध कराने वाले दीपावली पर्व पर आज घर-घर में खुशियों के दीपक जलाकर चहुंओर से उजाला कर लोगों ने गणेश जी-लक्ष्मी जी की विधिविधान से पूजा अर्चना की। देश में दीपावली पर्व के पीछे एक अयोध्या के राजा श्रीराम के जीवन से भी जुड़ी है जिसमें वह आज के ही दिन अपना चैदह वर्ष का बनवास खत्म कर अयोध्या वापस लौटे थे। जिससे प्रसन्न होकर अयोध्यावासियों ने अपने घरों में दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। हालांकि बौ़द्ध लोग आज के दिन को दीपदान उत्सव के रूप में मनाते हैं आज ही के दिन भगवान गौतम बुद्ध ग्यान की प्राप्ति के बाद जब भिक्षुसंघ के साथ अपने पिता के राज्य कपिलवस्तु लौट कर आये थे उस वक्त कपिलवस्तु के लोगों ने लाखों दिये जलाकर संपूर्ण कपिलवस्तु को रोशन कर दिया था भगवान गौतम बुद्ध के स्वागत में हुये इस दीपोत्सव ने आगे चल कर त्यौहार का रूप ले लिया तब से यह त्यौहार भगवान गौतम बुद्ध एवंभिक्षु संघ के स्वागत में संपूर्ण विश्व में बडे पैमाने पर मनाया जाता है और भगवान बुद्ध का आभार प्रकट किया जाता है।
दीपावली के दिन भारत में विभिन्न स्थानों पर मेले लगते हैं। दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दशहरे के पश्चात ही दीपावली की तैयारियां आरंभ हो जाती है। लोग नए-नए वस्त्र सिलवाते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। इस दिन बाजारों मेंचारों तरफ जनसमूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेषसाज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बरतन खरीदनाशुभ माना जाता है अतैव प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकताअनुसार कुछ न कुछ खरीदारी करता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एकदीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाजारों में खील-बताशे, मिठाइयाँ, खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं। स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दूकानें सजी होती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ वउपहार बांटने लगते हैं। दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा कीजाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक वमोमबत्तियां जलाकर रखते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अत्यंतसुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाजार वगलियां जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाजियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियां, आतिशबाजियां व अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर राततक कार्तिक की अंधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है। दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पर्वत अपनी अंगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बनाया था। इसी दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बही खाते बदल देते हैं। वे दूकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व काविशेष महत्त्व है। खरीफ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लास पूर्वक मनाता हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वालाऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बांटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं।घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारेव प्रेम का संदेश फैलाता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। दीपावली के अवसर पर अखिल भारतीय वैश्य महिला एकता परिषद के कार्यकर्ताओं ने दीपों की रंगोली सजाकर दीवाली की शुभकामनाएं दी।






Leave a comment