
महात्मा गांधी की हत्या ब्रिटिश खुफिया एजेंसी ने कराई थी। लाल बहादुर शास्त्री को सोवियत संघ की केजीबी ने मरवाया था। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या अमेरिका की कुख्यात खुफिया एजेंसी सीआईए ने कराई थी। भारत सरकार इन तथ्यों से अवगत होने के बावजूद इन पर पर्दा डालने के लिए मजबूर रही। यह हकीकतें शर्मनाक हैं जो जब भी चर्चा के दायरे में आती हैं महाशक्ति का दम भरने वाले इस देश की कातर छवि को उभारतीं हैं।

लेकिन डोकलाम मामले में ड्रैगन को बैकफुट पर जाने के लिए बाध्य करने का पराक्रम दिखाने वाली मोदी सरकार के जमाने में भी स्थिति में कोई तबदीली आ पाई है और क्या अभी भी भारत सरकार में इतनी हिम्मत आ पाई है कि अपने राष्ट्रीय नेताओं की हत्या कराने वाली महाशक्तियों को विश्व मंच पर नंगा कर सके। यह सवाल यक्ष प्रश्न की तरह है।
मौजूदा सरकारी तंत्र वर्तमान में वास्तविक उपलब्धियों का कोई स्कोर नही बना पा रहा जिसके चलते गड़े मुर्दे उखाड़कर कांग्रेस का भटठा बैठाने की कोशिश उसके रणनीतिक पैतरें का सबसे अहम पहलू बन गया है। सुभाष चंद्र बोस की रहस्यमय मौत के मामले में उसने कुछ दिनों ऐसा ही खेल खेला जिससे कांग्रेस जनमानस में अपनी छवि के बुरी तरह बिगाड़ के चलते परेशान रही।
इस बहाने बोस के परिवार के लोगों को बीजेपी ने अपने पक्ष में खड़ा करके पश्चिम बंगाल में अपनी राजनैतिक हैसियत में इजाफा किया। अब ऐसा ही खेल पार्टी का एक वर्ग महात्मा गांधी के नाम पर खेलने की तैयारी मे है। महात्मा गांधी की हत्या को लेकर उच्चतम् न्यायालय में इन दिनों एक याचिका पर सुनवाई चल रही है। याचिका दायर करने वाले डाॅ. फणवीस अभिनव भारत नामक संगठन के ट्रस्टी हैं। यह संगठन सावरकर की विचारधारा से प्रेरित है। जिसका बीजेपी के एक वर्ग पर आज सर्वाधिक प्रभाव है। राष्ट्रीय महापुरुषों की हत्या में कांग्रेस को संदिग्ध बनाने की श्रंखला की यह नई कड़ी है। हालांकि यह सियासत बात उठेगी तो दूर तलक जायेगी के अंदाज में भाजपा को भी घेरने का कारण बन सकती है। भाजपा के पितामह पं. दीनदयाल उपाध्याय की संदेहास्पद मौत का रहस्य भी अभी तक बरकरार है और इसे सुलझाने की मांग भाजपा की दुखती रग को छेड़ने वाली होती है और गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या की हत्या की कई गुत्थियाँ भी तो अभी तक अनसुलझी हैं ।

जो भी लेकिन डाॅ. फणवीस की याचिका में कई चैकाने वाले तथ्य हैं जो पूरे देश का ध्यानाकर्षित कर रहे हैं। डाॅ. फणवीस ने याचिका में कहा है कि 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गांधी की हत्या हुई थी उन पर गोली चलाने वालों में नाथूराम गोडसे और उसके साथ नारायण आप्टे के अलावा कोई और एक तीसरा शख्स भी था। नाथूराम गोडसे ने जिस पिस्टल से गोली मारी थी उसमें सात गोलियां थी। जिसमें से उसने तीन गोलियां चलाई और शेष गोलियां पिस्टल में ही रह गई थी। पुलिस ने अपनी चार्जशीट में महात्मा गांधी को तीन गोलियां लगना बताकर अपनी जांच गोडसे तक सीमित कर दी थी। जबकि मनुबेन की डायरी से पता चलता है कि महात्मा गांधी को चार गोलियां लगी थीं। चौथी गोली उनके शव को नहलाते समय कपड़ों से मिली थी लेकिन पुलिस ने इसे अपने रिकार्ड में दर्ज नही किया था। यह चौथी गोली किसने चलाई यह महत्वपूर्ण तथ्य है और वह तीसरा कौन सा शख्स था जो महात्मा गांधी की हत्या का मुख्य सूत्रधार रहा। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इसकी जांच नये सिरे से करने का आदेश जारी करने का आग्रह किया गया है।
फणवीस की यह याचिका इसके पहले मुम्बई उच्च न्यायालय जून 2014 में यह कहते हुए खारिज कर चुका था कि सक्षम न्यायालय ने इस बारे में सारे तथ्य और निष्कर्ष नोट किये थे और ऊंची अदालत ने उसके आॅब्जर्वेशन पर मुहर लगाई थी जिस पर संदेह करने का कोई कारण नही है। इसके अलावा 1964 में महात्मा गांधी की हत्या के लिए गठित किये गये जेएल कपूर आयोग ने भी किसी नये तथ्य को नही खोजा। इसके अलावा नये सिरे से जांच के आदेश जारी कर भी दिये जायें तो इसका कोई औचित्य नही है क्योंकि महात्मा गांधी की हत्या को इतने वर्ष हो चुके हैं कि उससे संबंधित कोई साक्ष्य अब नही बचा होगा जिसे ढूढ़ा जा सके।

इसके बाद ढाई-तीन साल तक डाॅ. फणवीस ने और ज्यादा मेहनत की और अदालत को संतुष्ट करने के लिए कुछ और पुख्ता सूत्र जुटाये। जिनके आधार पर उच्चतम् न्यायालय में उन्होंने याचिका दायर कर दी। उच्चतम् न्यायालय में जस्टिस एसएस बेबड़े और जस्टिस एल नागेर राव की पीठ इसकी सुनवाई कर रही है। इस पीठ ने डाॅ. फणवीस के प्रयासों की सराहना की। लेकिन उसने भी उनके सामने वही संदेह जताये जो मुम्बई उच्च न्यायालय ने व्यक्त किये थे। बावजूद इसके सुनवाई के समय कोर्ट रूम में मौजूद सीनियर अधिवक्ता अमरेंद्र शरण को पीठ ने अपना न्याय मित्र नियुक्त किया और उनसे इस मामले में कानून क्या कहता है यह बताने में मदद करने की अपील की कि क्या महात्मा गांधी की हत्या के इतने वर्षों बाद उनके मामले की जांच नये सिरे से करने को कोई आदेश जारी करने की शक्तियां उच्चतम् न्यायालय को प्राप्त हैं।
डाॅ. फणवीस का कहना है कि जिस समय महात्मा गांधी पर गोलियां चलाई गईं उस समय अमेरिकी दूतावास के एक अधिकारी टाॅमस रीनर उनके साथ ही चल रहे थे जो उनसे सिर्फ पांच फिट दूरी पर थे। उन्होंने महात्मा गांधी पर हमले के बाद हत्यारे को दबोचने में गार्डों की मदद की। उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या का पूरा सीन देखा था और उस पर तत्काल एक टेलीग्राम अमेरिका को भेजा था। इसके बाद रात में भी उन्होंने इस मामले से संबंधित एक महत्वपूर्ण टेलीग्राम भेजा जो अमेरिका के अभिलेखागार में महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में सुरक्षित है। इस टेलीग्राम में महात्मा गांधी की हत्या करने वाला चैथा शख्स कौन था इसका राज लिखा है। यह टेलीग्राम पढ़ने का प्रयास मौजूदा भारत सरकार को करना चाहिए। भारतीय राजनीति में रहस्य रोमांच के विशेषज्ञ डाॅ. सुब्रमण्यम स्वामी को इस मामले में अनिवार्य रूप से सुर में सुर मिलाना ही था सो उन्होंने अपना कतव्र्य निभाया। डाॅ. स्वामी कहते है कि नाथूराम गोडसे के पास जो पिस्तौल थी वह केवल ब्रिटिश सिपाहियों के पास होती थी। इसलिए सवाल यह बनता है कि गौडसे को ये पिस्तौल किसने दी। उनका कहना है कि वे भी इस मामले की जांच नये सिरे से कराने के लिए प्रभावी पैरवी करेगें।
इस बीच केंद्रीय मंत्री उमाभारती ने डाॅ. फणवीस के प्रयास का पाॅलिटिकल एगिंल और अधिक स्पष्टता से उजागर कर दिया है। उन्होंने कहा कि यह देखा जाना चाहिए कि महात्मा गांधी की हत्या से किसको फायदा हुआ। संघ को तो इससे नुकसान हुआ। उस पर प्रतिबंध लग गया। उसके खिलाफ जनभावनाएं भड़काई गईं। जबकि कांग्रेस को एक बला टल जाने जैसी राहत मिली क्योंकि महात्मा गांधी ने कांग्रेस को आजादी के बाद भंग करके नये नाम से पार्टी बनाने का सुझाव नेताओं को दिया था जो उन्हें हजम नही हो रहा था। लेकिन क्या केवल जवाहर लाल नेहरू को ही यह सुझाव हजम नही हो रहा था। शायद सरदार वल्लभ भाई पटेल भी महात्मा गांधी की भारी इज्जत करने के बावजूद इस सुझाव से सहमत नही थे। गांधी जी सचमुच के महात्मा थे कोई आसाराम बापू और राम रहीम जैसे महात्मा और संत नही। इसलिए वे सांसारिक स्वार्थों और व्यवहारिक सीमाओं से परे होकर आदर्श की वकालत कर सकते थे। उन्होंने कांग्रेस को भंग करने का सुझाव दिया जो वास्तव में पूरी तरह उचित था क्योंकि कांग्रेस आजादी की लड़ाई के समय सर्वमान्य और सभी विचारधाराओं का सामूहिक प्लेटफार्म बन गई थी। इसलिए उसकी पवित्रता और गरिमा को स्थायित्व प्रदान करने के लिए उसे चुनाव की प्रतिद्वंदितापूर्ण राजनीति से हमेशा के लिए अलग कर दिया जाना चाहिए था। लेकिन जवाहर लाल नेहरू और अन्य कांग्रेस नेताओं में महात्मा गांधी के दृष्टिकोण जैसी विराटता संभव नही थी। अन्यथा वे भी महात्मा न बन जाते। कांग्रेस को भंग करने के मामले में ही नही कई अन्य मुददो पर भी वे बापू की राय पर अमल करने के लिए सहमत नही थे। लेकिन इसके कारण बापू के प्रति उनके मन में दुराग्रह बन गया हो कि वे उनके साथ अनिष्ट की कल्पना करने लगे हों।
लेकिन महात्मा गांधी के साथ कटटरवादी ताकते जरूर अनिष्ट की सीमा करने तक दुराग्रही थीं। महात्मा गांधी पहले वर्ण व्यवस्था के पोषक रहे थे जिस पर उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर के साथ कई बार शास्त्रार्थ किया। लेकिन 1945 आते-आते तक महात्मा बदल चुके थे। उन्होंने ऐलान कर दिया था कि वे केवल उन शादियों में ही जोड़ों को आशीर्वाद देने जायेगे जो अंतर्जातीय होगीं। वर्ण व्यवस्था का किला गिराने के लिए उन्होंने एक बड़ा निशाना साधा था और यहीं से उनके साथ वर्ग शत्रुता शुरू हो गई थी। पाकिस्तान को मुआवजा दिलाने की जिद ठानकर उन्होंने संतई के स्वभाव के अनुरूप आचरण किया था क्योंकि एक सच्चा संत मजहब, मुल्क सारी सरहदों के पार होकर सिर्फ मानवता के दृष्टिकोण से सोचने की क्षमता विकसित कर लेता है। हो सकता है कि दुनियादारी में इतने आदर्श का अमल संभव न हो लेकिन संत को अपने स्वभाव के अनुरूप आचरण करने का अधिकार है। भले ही आप वही करें जो आपको व्यवहारिक लगता हो। पर महात्मा गांधी को एक वर्ग विशेष उनकी संतई के लिए उनका जीवन लेकर दंडित करने को आतुर हो उठा। यह एक विचारधारा का परिणाम था। इसीलिए महात्मा गांधी हत्या केस में सावरकर का नाम भी लिया गया। लेकिन अदालत ने उनको दोष मुक्त कर दिया था। डाॅ. फणवीस यही चाहते है कि इसके बावजूद महात्मा गांधी की हत्या को लेकर सावरकर के व्यक्तित्व को धूमिल करने की जो चेष्टा की जाती है उसका सही जांच से निवारण हो। उनकी सदिच्छा एक अलग विषय है। लेकिन स्वयं नाथूराम गोडसे ने भी गर्व पूर्वक स्वीकारा कि उसी ने महात्मा गांधी की हत्या की। महात्मा गांधी के प्रति जहरीली विचारधारा का प्रभाव है कि कुछ लोग मैने महात्मा गांधी को क्यों मारा जैसी पुस्तक को महिमा मंडित करते हैं। नाथूराम गोडसे के महिमा मंडन के लिए नाटक खेलते हैं और अन्य उपक्रम करते हैं। इसी विचारधारा के प्रभाव की वजह से कल्याण सिंह जैसे परिपक्व नेता को महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहे जाने पर एलर्जी हो जाती है। इसलिए उन लोगों को महात्मा गांधी की हत्या के मामले में बरी नही किया जा सकता जो इतने असहिष्णु है कि एक महात्मा तक को बर्दास्त नही कर सकते।
महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित याचिका ने कई बहसों का पिटारा खोल दिया है। सबसे बड़ी बहस यह है कि क्या हमने भीख में 15 अगस्त 1947 को एक लाचार आजादी हासिल की थी जिसकी वजह से अपनी छाती पर हम मूंग दलवाते रहे। हर अंतर्राष्ट्रीय साजिश को चुपचाप पी जाना, औपनिवेशिक काल के काले कानूनों को ढोना, ब्रिटेन की महारानी को पदेन मुखिया स्वीकार करने वाले काॅमनवैल्थ की मेंबरशिप और क्रिकेट जैसे खेल के प्रति अति आसक्ति जताकर अपने गुलाम अतीत के निशानों को बार-बार दिखाना और नई शिक्षा-संस्कृति के नाम पर अपनी पहचान मिटाने के लिए बाध्य होना हमारी नियति रहा और क्या आज जब तथाकथित देश बदल रहा है की बातें कही जा रही हैं तब हम कहीं इस लाचारी से उबर जाने जेसी भावना का सार्थक रूप में प्रदर्शन कर पा रहे हैं।






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