
मुलायम सिंह ने अब अपने पत्ते खोल दिये हैं। भाई शिवपाल सिंह इतने ही आज्ञाकारी थे तो जब अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया गया था उस समय बड़े भैया की सलाह मानकर उनके मंत्रिमंडल में शामिल होने की बजाय राष्ट्रीय कार्यकारिणी का पद स्वीकार कर लेते। लेकिन वे जिद करके अखिलेश के मंत्रिमंडल में शामिल हुए। यह साबित करते रहे कि अखिलश तो बच्चा है सरकार की सारी कुंजी उनके हाथ मे है।
अपने विभागों में खुद मुख्तारी दिखाते रहे। इस बीच जब अखिलेश ने अपने पैर मजबूत कर लिए तो इन सबका जबाब लाजिमी हो गया था। मुलायम सिंह जब बेटे के मुकाबले भाई पर जान देने का नाटक कर रहे थे तब दरअसल वे अखिलेश को मांजकर चमकाने में लगे थे। तांकि उनकी चकाचैंध इतनी हो जाये कि सारे चाचा रतौंधी के शिकार होकर किसी काम के न रह जायें। जब यह हो गया तो मुलायम सिंह को अब शिवपाल की कोई परवाह नही है। हालत यह है कि उन्होंने शिवपाल को कहीं का नही छोड़ा। शिवपाल ने टवीट करके मुलायम सिंह को जन्मदिन की बधाई दी। लेकिन समाजवादी पार्टी के मुख्यालय पर इस उपलक्ष्य में हुए जश्न में उनका कोई अता-पता नही रहा। वे पहुंचते भी तो कैसे जब उनको निमंत्रण ही नही मिला था।
अपने विभागों में खुद मुख्तारी दिखाते रहे। इस बीच जब अखिलेश ने अपने पैर मजबूत कर लिए तो इन सबका जबाब लाजिमी हो गया था। मुलायम सिंह जब बेटे के मुकाबले भाई पर जान देने का नाटक कर रहे थे तब दरअसल वे अखिलेश को मांजकर चमकाने में लगे थे। तांकि उनकी चकाचैंध इतनी हो जाये कि सारे चाचा रतौंधी के शिकार होकर किसी काम के न रह जायें। जब यह हो गया तो मुलायम सिंह को अब शिवपाल की कोई परवाह नही है। हालत यह है कि उन्होंने शिवपाल को कहीं का नही छोड़ा। शिवपाल ने टवीट करके मुलायम सिंह को जन्मदिन की बधाई दी। लेकिन समाजवादी पार्टी के मुख्यालय पर इस उपलक्ष्य में हुए जश्न में उनका कोई अता-पता नही रहा। वे पहुंचते भी तो कैसे जब उनको निमंत्रण ही नही मिला था।
दीपावली पर मुलायम सिंह का पूरा परिवार एक बार फिर हंसी-खुशी के साथ सैफई में इकटठा हुआ था। अखिलेश ने भी चाचा के चरण स्पर्श करके अटकलों का पिटारा खोल दिया था। लेकिन उन्हें और उनके समर्थकों को सम्मानजनक ढंग से पार्टी में समायोजित करने की मीडिया में इसके बाद चली तमाम खबरें चंडू खाने की गप्पे साबित होकर रह गईं। मुलायम सिंह ने भी शिवपाल के पुनर्वास की चर्चा करना तक बंद कर दिया है। मुलायम सिंह ने असलियत में आते ही कह दिया कि अखिलेश बाद में कुछ और है पहले में उनका बेटा है। इसलिए वह जो करे उनका आशीर्वाद तो उसी के साथ रहना है।

मुलायम सिंह ने जन्मदिन समारोह में पार्टी को 50 से कम सीटे मिलने का दुखड़ा फिर रो दिया। लेकिन इसका ठीकरा अखिलेश के सिर फोड़ने की बजाय पार्टी के दूसरे लोगों के निकम्मेपन पर फोड़ा। उन्होंने कहा कि अखिलेश ने बढ़िया काम किया। चुनाव घोषणा पत्र के सारे वायदे भी पूरे किये। लेकिन जो लोग पार्टी में बड़े पदों पर बैठे हैं वे मेहनत नही करना चाहते। उनके अपने बूथ पर पार्टी को उतने भी वोट नही मिले जितना उनका परिवार है। उन्होंने ऐसा कहकर कई पार्टी पदाधिकारियों में दहशत फैला दी है। लेकिन अभी किसी का नाम नही लिया। कहा कि वे अखिलेश को उनके नाम बता देगें तो क्या अखिलेश नेताजी का मान रखने के लिए अपनी टीम के ऐसे नाकाबिल सहयोगियों को सजा देने का कदम उठायेगें। क्यो समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह के बयान की वजह से बड़ी उथल-पुथल होगी।

मुलायम सिंह को एक चीज में महारथ हासिल है कि वे किसी काम की चर्चा करें उनका टोन ऐसा होता है कि जैसे सारी स्रष्टि के कर्ता-धर्ता वही हैं। सच्चाई जानते हुए भी किसी ने आज तक उनका मुंह पकड़ने की हिम्मत नही की। इसलिए उनकी महाझूठ एक्सपे्रस राजनीति की पटरी पर दौड़ती रही है और अभी भी दौड़ रही है। मुलायम सिंह ने कहा कि जब उन्होंने कार सेवकों पर गोली चलवाई थी तब भी उन्हें इतनी कम सीटे नही मिली थीं जितनी कम अब हो गई हैं। गजब है झूठ बोलने का। कार सेवकों पर गोली चलवाने के बाद 1991 में विधानसभा चुनाव हुए थे। जिसमें मुलायम सिंह को 30 सीटे भी नही मिली थी। हिंदुओं में तो गुस्सा था ही मुसलमान भी मानते थे कि गोली चलवाने की कोई जरूरत नही थी। इस काम से भाजपा रातों-रात गांव-गांव में तेजी से पसर गई। कार सेवकों पर गोली कांड की वजह से ही आज सारे देश में भाजपा का इस कदर बोलबाला हुआ है। मुलायम सिंह का राजनैतिक जीवन समाप्त हो जाता अगर कांशीराम ने उनसे गठबंधन न किया होता। लेकिन यह गठबंधन सैद्धांतिक राजनीति के लिए अभिशाप बना। लोहियावाद वंशवाद में गर्क हो गया। सोशलिस्टों की पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र की लड़ाई का बेड़ा गर्क हो गया और समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह की निजी प्रापर्टी बनकर उभरी। सामाजिक न्याय के संघर्ष को भी जंग लगाकर इस गठबंधन ने इतना भौंथरा कर दिया कि जातिगत वर्चस्व में विश्वास करने वाली सामाजिक ताकतों का नये सिरे से पुनरुत्थान हो गया।

बहरहाल अखिलेश ने उनके दर्द को ज्यादा तरजीह नही दी। जब भी मुलायम सिंह अपने तथाकथित स्वर्णिम युग का रोना रोते हैं उम्र दराज आदमी की स्वाभाविक भड़ास मानकर अखिलेश उसे नजरअंदाज कर देते हैं। अखिलेश को पता है कि उन्होंने अपने पिता की शैली से अलग हटकर विकास का जो कार्ड खेला उसके प्रति लोगों में आज हमदर्दी है। सौफिस्टीकेटिड राजनीति की बदौलत उन्होंने मध्य वर्ग में समाजवादी पार्टी की जो पैठ बनाई वह पहले हमेशा दुर्लभ थी। नगर निकाय के चुनाव के नतीजे चाहे जो हों लेकिन आरंभिक रुझानों से यह बात सामने आ रही है कि पहली बार समाजवादी पार्टी को नगरीय क्षेत्रों में भी लोगों का बेहतर रिस्पाॅस मिला है।

रही बात भाजपाइयों की तो उनका कलेजा धन्य का है। मुलायम सिंह ने बहुत गर्व से कार सेवकों पर गोली चलवाने के अपने कारनामे का बखान किया। फिर भी संघ के खाटी स्वयं सेवक मौजूदा राज्यपाल राम नाईक उन्हें महिमा मंडित करने के लिए घर जाकर उनकों जन्म दिन की बधाई देने पहुंच गये। मुसलमानों के जमीर से जरा इसकी तुलना करिये।

अगर उन्होंने बाबरी मस्जिद की शहादत के लिए कल्याण सिंह को गुनहगार माना तो माफी मांगने पर भी उनको माफी नही दी। उनका साथ लेने की वजह से मुलायम सिंह को भी उनकी हैसियत बता दी। जिससे घबराकर मुलायम सिंह को कल्याण सिंह से पिंड छुड़ाना पड़ा।






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