
अपराधी जेल जायेगें या पुलिस उन्हें यमराज के पास भेजेगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह डींग उनके गले में हडडी बनकर अटक गई है। योगी मेरठ और मुजफ्फर नगर में स्थानीय निकाय चुनाव के पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में सभा करने पहुंचे थे। अपराध के लिए बदनाम इन क्षेत्रों में लोगों को जोश दिलाने के लिए वे उन्हें एनकांउटर में मार डालने की खुली छूट पुलिस को देने की बात कह तो गये लेकिन अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसी बिनाह पर उनके मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर जबाव तलब कर लिया है। जिससे सत्ता के गलियारों में खलबली मची हुई है।

योगी ने जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रदेश की कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने की थी। इसको समझते हुए वे अपने भाषणों में बराबर इस दिशा में सख्त कदम उठाने की हुंकार भरते रहे थे। दूसरी ओर सनसनीखेज अपराधों पर इसका कोई प्रभाव नही पड़ पा रहा था। हर चुनाव की तरह स्थानीय निकाय चुनाव में भी अपराधियों की व्यस्तता अन्यत्र हो गई है जिससे फिलहाल वारदातें थमी हुई हैं लेकिन यह अस्थाई युद्ध विराम जैसा है। इसके पहले ऐसा लग रहा था जैसे उत्तर प्रदेश की सरकार और पुलिस इनको काबू में करने की कुब्बत खो चुकी है। इस माहौल में योगी की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि प्रदेश पुलिस की सबसे ऊंची कुर्सी किस तरह किसी सजातीय अफसर के हाथ में ही रहे। 30 सितम्बर को डीजीपी सुलखान सिंह का कार्यकाल समाप्त होने के पहले उन्हें 6 महीने का सेवा विस्तार देने के लिए योगी ने केंद्र को संस्तुति भिजवा दी थी। लेकिन केंद्र उस पर चुप्पी साधकर बैठ गया था। अधीर योगी और उनकी पुलिस ने सुलखान सिंह के सेवा विस्तार का माहौल बनाने के लिए रोमांचकता के पुट का सहारा लिया। सुलखान सिंह के सेवा विस्तार के कार्यकाल के अंतिम एक पखवारे में सड़कों पर बदमाशों का मुकाबला करती पुलिस की खबरें मीडिया में जोरशोर से प्लांट हुईं और अंततोगत्वा 1 अक्टूबर को सुलखान सिंह को 3 महीने के सेवा विस्तार की मुंह मांगी मुराद मिल ही गई। एनकाउंटर के नये ट्रेंड की शुरूआत सफल फार्मूले की तरह यहीं से हुई।

इसके पहले बेवसी में सीएम योगी यह राग अलाप रहे थे कि अपराध तो काबू में हो गये हैं लेकिन बसपा और सपा की सरकारों में कोई अपराध दर्ज नही होता था जबकि हमारी सरकार में हर अपराध दर्ज किया जा रहा है। इसलिए आंकड़ों में अपराध बढ़ गया है जिसको हथियार बनाकर उनकी सरकार को बदनाम किया जा रहा है। लेकिन योगी ने तो गिरगिटी अंदाज में पेशेवर राजनैतिज्ञों को भी मात दे दी। जहां तक उनके कार्यकाल में हर अपराध दर्ज होने की बात है मीडिया की खबरे बताती हैं कि पुलिस अधिकारी तहरीर लेने के बाद जांच कर कार्रवाई करने की बात का सम्पुट लगाने के अभ्यस्त हो चुके हैं। जबकि तहरीर को रजिस्टर्ड करने के लिए पहले जांच का कोई प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता में नही है।
योगी भी समझते हैं कि प्रदेश की कानून व्यवस्था सुधर जाने के उनके छलावे पर किसी को विश्वास नही है। इसीलिए नगर निकाय चुनाव में उनकी जुबान एनकाउंटर के नाम पर फिसल गई। भाजपा के नेताओं की वैसे भी यह आदत है कि वे संवैधानिक विवेक से लोगों को भटकाने के लिए चंडूखाने की हांकने में सबसे आगे रहते हैं। मानवाधिकार आयोग ने योगी के बयान को मीडिया की रिपोर्टों के आधार पर स्वतः सज्ञान में लेते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री के कथित बयान का मतलब पुलिस या राज्य सरकार को अपराधियों से निपटने के लिए फ्री हैंड देना है। यह शब्द समाज के लिए सही नही हैं। आयोग ने इस बात का भी हवाला दिया कि मार्च 2017 से जबसे योगी सरकार सत्तारूढ़ हुई है 5 अक्टूबर 2017 तक राज्य में 433 एनकाउंटर हो चुके हैं। जिनमें 19 अपराधी मारे गये और 89 घायल हो गये। आयोग ने यह हवाला इसलिए दिया कि आयोग की निगाह में यह एनकाउंटर फेयर नही हैं। जब मुख्यमंत्री पुलिस को उकसा रहे हों तो पुलिस आत्मरक्षा की बजाय कार्रवाई और न्याय दोनों की भावना से काम करते हुए एनकाउंटर के नाम पर अन्याय करने में जुटी हुई है। हो सकता है कि मानवाधिकार का यह आंकलन गलत हो इसलिए आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव से 6 सप्ताह के अंदर इस मामले में जबाव दाखिल करने को कहा है।
इतिहास गवाह है कि अपराधियों पर काबू पाने के लिए पुलिस को जब भी एनकाउंटर की छूट दी गई परिणाम विनाशकारी रहे। बेहमई कांड सहित उत्तर प्रदेश में जब सामूहिक नरसंहारों की झड़ी लग गई थी तो 1982 में प्रदेश की तत्कालीन वीपी सिंह सरकार ने डकैतों के सफाये के लिए 90 दिन का विशेष अभियान चलाया था। इस अभियान में मोस्ट वांटेड डकैत तो सुरक्षित रहे लेकिन पुलिस ने कान्ट्रेक्ट किलर बनकर काम किया। प्रभावशाली और दलालों से पैसे लेकर डकैत घोषित करके बेकसूरों को हलाक कर डाला। यह अभियान इतनी बुरी तरह विफल रहा कि विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपनी पूरी राजनैतिक जिंदगी इसका जबाव देने में गुजारनी पड़ी। बिहार में अपने पहले कार्यकाल में असाध्य हो चुकी बिगड़ी कानून व्यवस्था को ठीक करने के लिए नीतिश कुमार ने जो फार्मूला अपनाया था उसमें अंधाधुंध एनकाउंटर शामिल नही थे। इसकी बजाय उन्होंने अदालतों को विश्वास में लेकर अपराधियों को जल्दी से जल्दी और ज्यादा से ज्यादा सजा दिलाने की नीति लागू की और यह नीति बेहद कारगर रही। खुद योगी की पार्टी के उत्तर प्रदेश में पहले मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की भी अपराध नियंत्रण के मामले में नीति पर गौर किया जाना चाहिए। उन्होंने माफिया सूचीबद्ध कराये और टाॅपटेन अपराधियों की लिस्टे बनवाईं साथ ही इन सभी को स्थाई रूप से जेल के अंदर रखना सुनिश्चित किया। हाल-फिलहाल कानून व्यवस्था को ठीक रखने के मामले में सबसे ज्यादा चर्चा मायावती की होती है। उन्होंने भी अलग तरह की नीति अपनाई थी। पुलिस अधिकारियों से वे इतनी मेहनत कराती थीं कि अपराधी पस्त हो गये थे। पुलिस अधिकारी उनकी फटकार के डर से 24 घंटे हरकत करने वाले अपराधियों को कंट्रोल करने में लगे रहते थे। लेकिन योगी की कोई नीति नही है एनकाउंटर की व्यवस्था के प्रति उनका आकर्षण उनकी फासिस्ट सोच को दर्शाता है।






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