उरई। बारिश न होने की वजह से खरीफ की फसल से तो किसान हाथ धो ही बैठे थे लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि रवी की फसल उन्हें काफी हद तक सहारा दे देगी। लेकिन मौसम में आये बदलाव के चलते अंकुरण के स्तर से ही किसानों को बिगाड़ का अंदेशा होने लगा है।

अक्टूबर के महीने में जल स्तर काफी नीचा हो जाने से पलेवा के दौरान ही किसानों के पैरों तले जमीन खिसकने लगी थी। वाटर लोगिंग वाले इलाके में शुमार माधौगढ़ तहसील तक में हालत यह थी कि डीजल इंजन को गडढे में रखने पर पानी निकल पा रहा था। इसके बाद नहर के संचालन और तपिश में आई कमी की वजह से जल स्तर में तो कुछ सुधार आ गया है लेकिन गर्मी अभी भी नवजात फसलों के लिहाज से बहुत ज्यादा है।

किसानों ने बताया कि पहले मसूर और चना की बुबाई वे लोग बिना पलेवा के ही कर लेते थे लेकिन इस बार हालत बदली हुई है। पलेवा के बाद बुबाई करने के बावजूद गर्मी के कारण फसल बढ़ नही पा रही। जबकि पानी भी लगाया जा चुका है। उधर हरी मटर जो इस इलाके में इफरात में होती थी, में नाम मात्र की फलियां आ रही हैं। जिससे किसान को लागत के बराबर भी उपज न निकलने का खतरा सताने लगा है।

ऊपर से अन्ना पशु प्रथा पर प्रशासन पर कोई बस नही चल रहा। इस नाम पर डीएम ने पशुओं को छुटटा छोड़ने वालों के खिलाफ थानों में मुकदमा दर्ज कराने और तहसील स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दर्ज मुकदमों की लगातार समीक्षा के जो ढपोरशंखी आदेश दिये थे। उनका कोई असर देखने को अभी तक नही मिला है। आज तक किसी एक मवेशी वाले के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नही हुआ। अन्ना पशुओं का आतंक चरम सीमा पर होने की वजह से भीषण ठंड में किसानों को पूरी रात फसलों की रखवाली करते गुजारनी पड़ती है। एक किसान ने बताया कि बदहाल स्थितियों की वजह से ही खेती की नगद जुताई का रेट गिरकर आधा रह गया है। अगर यह दुर्दशा बरकरार रही तो बड़ी संख्या में अगले साल किसान खेती से विरत हो जायेगें। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद व्यवस्था के कर्ताधर्ताओं को किसानों के हितों की रक्षा के लिए गंभीर प्रयास करने की कोई जरूरत महसूस नही हो रही।

 

 

 

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