सर्वोच्च न्यायालय की प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हम विधायिका या सरकार को कोई खास कानून बनाने का निर्देश नही दे सकते। वे पुलिस हिरासत में अमानवीय और यातनापूर्ण व्यवहार रोकने के लिए कानून बनाने हेतु दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने इसी बिंदु पर इस याचिका का पटाक्षेप भी कर दिया। संविधान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में अधिकार क्षेत्र को लेकर सरकार और उच्चतम् न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के बीच सीधी-सीधी कहासुनी हुई। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले दिन इसका सुखद पटाक्षेप सरकार, विधायिका और न्यायपालिका को व्यवस्था का एक परिवार बताकर कर दिया। लेकिन हाल में सरकार, विधायिका और न्यायपालिका में जो अंर्तद्वंद उभरे हैं उसके बाद से अब सुप्रीम कोर्ट बैकफुट पर नजर आ रहा है। उसकी अति सक्रियता और उत्साह पर जैसे ठंडा पानी पड़ चुका है। सीबीआई की एक एफआईआर में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा का नाम आने के अप्रिय प्रसंग के बाद भी प्रधान न्यायाधीश ने यह व्यक्त किया है कि प्रमुख संस्थाओं को जिनमें सरकार और न्यायपालिका दोनों शामिल हैं एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। उनके प्रदर्शन में दुराग्रह या प्रतिशोध का पुट होने की बजाय नया समायोजन बनाने की चेष्टा झलकती है।
मनमोहन सिंह के समय ही सरकार व न्यायपालिका में टकराव के नये दौर की शुरुआत हो गई थी। मोदी सरकार में यह द्वंद तब बहुत ज्यादा बढ़ गया जब उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए काॅलेजियम प्रणाली को बदलकर सरकार ने राष्ट्रीय आयोग के गठन का प्रस्ताव किया। उच्चतम् न्यायालय में बहुत कढ़ाई के साथ इसे अमान्य कर डाला। इसके बाद काॅलेजियम ने न्यायाधीशों की नियुक्तियों के लिए जो नाम भेजे उनमें से अधिकांश को हरी झंडी देने की बजाय सरकार ने अपने पास रोक लिया। तब जस्टिस टीएस ठाकुर प्रधान न्यायाधीश थे। उन्होंने काफी अतिवादी रवैया अपनाकर टकराव को बेहद तीखा कर दिया था।
उन्होंने तर्क दिया था कि न्यायाधीशों की संख्या कम होने से हम लोगों को न्याय नही दे पा रहे हैं। उच्च न्यायालय में 40 लाख और निचली अदालतों में तकरीबन 3 करोड़ मुकदमें लंबित हैं। फिर भी उच्च न्यायालय की 44 प्रतिशत रिक्तियों को जल्द भरने में सरकार कोई दिलचस्पी नही दिखाना चाहती। पर मीडिया के एक हिस्से में न्यायपालिका के काॅलेजियम में उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्तियों के लिए भेजे गये नामों को जब उजागर किया गया तो जनमानस वितृष्णा से भर उठा और यह साबित हो गया कि न्यायपालिका भी दूध की धुली नही है।
राष्ट्रीय मोर्चा और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में कार्यपालिका की मनमानी और विवादित कार्यप्रणाली की वजह से न्यायपालिका अपने हस्तक्षेप के फलस्वरूप लोगों के बीच लोकतंत्र व व्यवस्था को बचाये रखने वाले अवतार का स्वरूप बना चुकी थी। लेकिन आज स्थिति वैसी नही रह गई तो लोग तटस्थ होकर चीजों को देख पा रहे हैं और संविधान में प्रतिपादित शक्तियों के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत का महत्व समझ पा रहे हैं। अपने वर्ग हित के मामले में उच्चतम् न्यायालय ने जिस तरह का रुख अपनाया उसमें अड़ियलपन की बू महसूस की गई। जिससे जनमानस में उसकी विश्वसनीयता को गहना धक्का लगा। अमर सिंह का टेलीफोन टेप कांड जब सामने आया था तो उच्चतम् न्यायालय ने उसे सार्वजनिक करने पर जो रोक लगाई थी उसकी तो किसी की समझ मे नही आई थी। टेप में दर्ज वार्तालाप से न्यायधीशों की नियुक्ति में चलने वाले ऐसे निकृष्ट हथकंडों का खुलासा होता था जिनकी कल्पना नही की जा सकती। इस टेप पर रोक न लगाकर उच्चतम् न्यायालय को इस पर सार्वजनिक बहस छिड़ने की स्थितियां बनाने में सहयोग देना चाहिए था। तांकि अगर न्यायपालिका की पवित्रता में कोई खोट आ रही है तो समय रहते उसे रोका जा सके। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के एक जज का मंत्री के लिए आवंटित कोठी पर अड़ जाना भी न्यायपालिका की गरिमा को देखते हुए बेहद अशोभन रहा। न्यायधीशों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए भी न्यायपालिका ने काफी प्रतिबंधात्मक व्यवस्थायें कर दीं हैं जो कि पारदर्शिता के सिद्धांत के विरुद्ध हैं।
इंदिरा गांधी के समय एक नारा सामने आया था प्रतिबद्ध न्यायपालिका का। सरकार जो बैंकों के राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रिवीपर्स की समाप्ति जैसे फैसले लेकर बदलते विश्व के अनुरूप समाज और व्यवस्था को नये ढांचे में ढालने का प्रयास कर रही थी। उस समय न्यायपालिका का अति तकनीकी रवैया देश के आगे बढ़ने में बाधक बन रहा था। अंततोगत्वा 44 में संविधान संसोधन के मुददे पर न्यायपालिका सरकार के सामने झुक गई। यहां तक कि 1976 में आपातकालीन व्यवस्था के दौरान हैवियस कार्पस सहित नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित करने की सरकार की शक्ति को सर्वोच्च न्यायालय ने मान्य कर दिया। मौजूदा सरकार बनी तो उसे भी लीक से हटकर काम करने का जनादेश मिला था और न्यायपालिका का तकनीकी रवैया ऐसी स्थिति में जनादेश को विफल कर सकता था। इस आशंका की वजह से शुरुआत में सरकार ने थोड़ा उग्र स्टेण्ड लिया लेकिन जस्टिस खेहर के प्रधान न्यायाधीश पद पर आते-आते बहुत कुछ मैनेज हो गया। तीन तलाक और अयोध्या मुददे पर अदालत के बाहर बातचीत से विवाद का हल निकालने जैसी न्यायपालिका की सम्मतियों ने ऐसा आभास पैदा किया कि सरकार के उददेश्यों के लिए जनमत निर्माण में न्यायपालिका कहीं न कहीं अनुकूलन की भूमिका निभाने को प्रस्तुत है।
इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब समझौतावादी रुख दिखा रहे हैं लेकिन विधि दिवस पर उन्होंने न्यायपालिका की कुछ कमजोरियों को उठाने में हिचक नही की। मंहगी न्यायप्रणाली में जिसके पास लाखों रुपये अतिरिक्त न पड़े हों उसके साथ कितना भी अन्याय हो रहा हो लेकिन उच्चतम् न्यायालय तक जाने के लिए उसको वकील नही मिल सकता। ऐसे में गरीब आदमी के लिए मौलिक अधिकार ढकोसला बनकर रह गये हैं। जबकि अमीर आदमी मंहगे वकील हायर करके कानून के साथ खिलवाड़ के लिए न्यायपालिका को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगा है। प्रधानमंत्री ने इस स्थिति में सुधार लाने और गरीब आदमी के लिए उच्चतम न्यायालय तक पहुंच को सुगम बनाने के लिए नई व्यवस्था लागू करने का भरोसा दिलाया है। इसी तरह लंबित मुकदमों का अंबार केवल न्यायधीशों की कमी की वजह से नही है। दीवानी मुकदमों की उन जटिलताओं को दूर करने का कोई तरीका न्यायपालिका विकसित नही कर पाई है जिससे उनका समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित हो सके। विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान दिवस पर जनहित याचिकाओं में न्यायपालिका को अति सक्रियता दिखाने के लिए घेरा यह विषय जनमानस को भी चुभने लगा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खतरा साबित होने वाले बंदियों को दूसरी जेलों में स्थानांतरित करने की सरकार और प्रशासन की शक्तियों पर रोक लगा दी। लोग सवाल कर रहे हैं कि यह विशुद्धतम् कार्यपालिका का मामला था। अगर न्यायपालिका प्रशासन के रुटीन के काम में भी अत्याधिक हस्तक्षेप को अग्रसर होती है तो सरकार व प्रशासन की पहल कदमी की शक्ति पर प्रभाव पड़ेगा और ऐसा हो भी रहा है। जिससे व्यवस्था चरमरा रही है।
कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सम्मान का भरोसा तो दे रही है लेकिन कहीं न कहीं उसे यह भी आभास कराना चाहती है कि न्यायपालिका भी जबावदेही में बंधी है। न्यायपालिका ने भी इस तकाजे को महसूस करना शुरू कर दिया है। इसलिए टकराव सहयोग की स्थितियों में बदलने लगा है।

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