उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय के चुनाव योगी सरकार की पहली अग्नि परीक्षा माने जा रहे थे। खुद सीएम योगी आदित्यनाथ तक का आत्म विश्वास इस परीक्षा को लेकर डगमगाया हुआ था। इसलिए प्रतिद्वंदी दलों के बड़े नेताओं के प्रचार से दूर रहने के निश्चय के बावजूद उन्होंने खुद अपने मंत्रियों की टीम सहित प्रचार मैदान में कूंदने में चूंक नही की। योगी ने प्रदेश भर में 40 सभाएं कीं जो छोटे चुनाव के लिहाज से बहुत वृहद कैंपेन माना गया। 16 में से 14 नगर निगमों में भाजपा के महापौर निर्वाचित होने के रिजल्ट को अपनी ऐतिहासिक सफलता के रूप में प्रचारित करने में योगी कोई कोर कसर नही छोड़ रहे और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अन्य तमाम कारणों की वजह से धक्का लगाने में पीछे नही हैं। गुजरात चुनाव में उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित महापौरों को भेजकर उन्होंने अपने लिए इसकी बड़ी रणनीतिक उपयोगिता का एहसास कराया है।
लेकिन यूपी के लोग निकाय चुनाव में भाजपा की विराट सफलता के उन्हीं के मुंह बोले दावे को हजम नही कर पा रहे हैं। प्रदेश में 8-9 महीने का योगी सरकार को जो रिकार्ड है उसके आधार पर अधिकांश लोग यह मानते है कि सूबे में हाल के दशकों में इससे ज्यादा अकर्मण्य सरकार कोई दूसरी नही रही और बात केवल लोगों की ही नही है उनकी पार्टी के लोग तक यही महसूस करते हैं। दूसरी ओर भाजपा के नव निर्वाचित विधायकों का अभी तक का भूखे भेड़ियों जैसा प्रदर्शन लोगों में नफरत की हद तक गुस्सा पैदा करने का कारण बन गया है। भाजपा के सांसदों का रवैया पहले से ही खिन्न करने वाला था जिन्होंने न तो अपने क्षेत्र के विकास में कोई रुचि दिखाई है और न ही किसी पीड़ित को इंसाफ दिलाने में। वृंदावन मथुरा में संघ की अखिल भारतीय समन्वय समिति की जब बैठक हुई थी उस समय संघ के प्रमुख अधिकारियों ने भी सरकार और माननीयों की रीति-रीति पर अप्रसन्नता जताने में कोई संकोच नही किया था।
तो क्या यह भाव लोकप्रियता के पैमाने को बढ़ाने की कशिश से जुड़कर कोई चमत्कार दिखा रहे थे जिसका नतीजा नगर निकाय की चुनावी परीक्षा में भाजपा पर वोटों की बरसात के रूप में सामने आया। हालांकि गहराई से इन परिणामों से जुड़े सभी पहलुओं का विश्लेषण किया जाये तो लगता है कि प्रस्तुतीकरण की बाजीगरी से यथार्थ को किस तरह बदला जा सकता है।
लोगों ने गत विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुत उम्मीद से सत्ता सौंपी थी। इसके पीछे उस पीढ़ी के अनुभव भी नजीर के तौर पर थे जिसने कल्याण सिंह की पहली सरकार का कार्य संचालन देखा था। जिसमें भ्रष्टाचार और अराजकता पर लगभग पूरी तरह लगाम लग गई थी। लीडर का जो अनुशासन होना चाहिए था कल्याण सिंह के प्रदर्शन में उसमें कोई कमी नही थी। लेकिन योगी के थोथे प्रवचनों की कलई जैसे-जैसे खुलती गई वैसे-वैसे मौजूदा सरकार से जुड़ी उम्मीदों पर पानी फिरता चला गया। आज सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार नई बुलंदियों को छू रहा है। लोग कहें तो किससे कहें क्योंकि सरकार संवेदनहीन है। जिसके सामने आम आदमी की फरियाद, गुहार अरण्यरोदन जितना भी महत्व नही रखती। लेकिन जिनके खिलाफ जनादेश पारित किये लोगों को भी एक वर्ष भी नही हुआ उनका भी फिर भरोसा इतनी जल्दी कैसे कर लें। दूसरी ओर बहनजी की पार्टी के कारोबारी चरित्र की इस बीच इतनी चर्चाएं होती रही कि लोगों को उनसे ऊब सी हो गई थी। कांग्रेस पहले से ही किसी गिनती में नही थी।
ऐसी हालत में लोगों के सामने उदासीन हो जाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नही था। नगर निगमों में 50 फीसदी से भी कम मतदान हुआ। अगर पार्षदों के चुनाव जो कि विशुद्धतम निजी आधार और वार्ड के स्थानीय समीकरणों के आधार पर होते हैं, साथ न होते तो मतदान का प्रतिशत शायद कश्मीर में श्रीनगर, पूंछ जैसे क्षेत्र में होने वाले चुनाव के क्षीणतम मतदान से होड़ करता दिखाई देता। कहने की जरूरत नही है कि अगर सरकार के कामों के प्रति लोगों में उत्साह होता जैसा कि चुनाव परिणाम के आधार पर योगी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं तो स्थानीयता की सघन कशिश से जुड़कर मतदान में नये कीर्तिमान स्थापित हो जाने की नौबत आ जाती। इसके अलावा पड़े मतों में भी भाजपा के विजयी महापौरों के मतों का प्रतिशत बहुत कम है। इलाहाबाद में जीती भाजपा की मेयर को तो केवल 12 फीसदी वोट ही मिल पाये हैं।
नगर निगम तो केवल 16 ही थे लेकिन 198 नगर पालिका परिषदों और 438 नगर पंचायतों के वृहत्तर धरातल पर भाजपा का प्रदर्शन कैसा रहा यह भी तो बताया जाना चाहिए। 198 नगर पालिका परिषदों में केवल 38 में और 438 नगर पंचायतों में मात्र 100 में भाजपा के अध्यक्ष जीते। क्या इन तथ्यों को दरकिनार करके नगर निकाय चुनाव की बिसात पर भाजपा की लोकप्रियता की रैंकिंग तय की जा सकती है। सही बात तो यह कि इन सारे तथ्यों को ईमानदारी से परखा जाये तो नगर निकाय चुनाव की बानगी भाजपा के लिए खतरे की घंटी बचाने वाली है। जहां तक उसका विकल्प न होने का सवाल है, विकल्प तो परिस्थितियां रातों-रात तैयार कर देती हैं। जब राजीव गांधी ने लोक सभा चुनाव में विपक्ष के सारे दिग्गजों को संसद से बाहर करने की रणनीति अपनाकर यह सोच लिया था कि अब कई पंचवर्षीय तक उनका राज आराम से चलेगा तब उन्हें चुनौती देने वाले वीपी सिंह उनके पहले ही कार्यकाल में कांग्रेस पार्टी से ही निकलकर ऐसे सामने आये कि उन्हें गददी से बेदखल हो जाना पड़ा।
डाॅ. सुब्रमण्यम स्वामी ने निकाय चुनाव परिणामों को लेकर जो आंकलन प्रस्तुत किया है वह भी गौरतलब है। अयोध्या में दीपावली को अभूतपूर्व भव्यता के साथ मनाने के स्वांग से राम जन्म भूमि मंदिर के लिए मतदाताओं में नई स्फूर्ति का संचार हुआ। इस बीच श्री श्री रविशंकर महाराज की मंदिर निर्माण के लिए मध्यस्थता की स्वयंभू और नाटकीय मुहिम भी सामने आई जिसने इस आवेग को और बढ़ाया। हालांकि विहिप और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर इसकी प्रतिक्रिया चिढ़ने के रूप में हुई क्योंकि उन्हें लगा कि संघर्ष पूरा उनका है और आखिरी समय में श्री श्री रविशंकर को श्रेय दिलाने का षड़यंत्र रचा जा रहा है। संघ और मोदी के बीच के संबंधों में जो जटिलता आ रही है यह उसकी पहली बानगी है। जिसकी अभी कई और पर्तें खुलनी बांकी हैं। बहरहाल रविशंकर महाराज का उपक्रम भी जाने-अनजाने में उत्प्रेरक की भूमिका निभा बैठा और जो कुछ भी वोटिंग हुई वह मंदिर समर्थकों में इस आपाधापी से उपजे उत्साह का परिणाम थी। इससे विपरीत दिशा में भी ध्रवीकरण हो सकता था लेकिन विपक्ष के नेता चुनाव अभियान से दूर रहकर भाजपा को नगर निकाय में वाकओवर देने का निश्चय पहले ही कर बैठे थे तो ऐसा कैसे होता।
इसका एक और पेंच भी समझा जाना चाहिए। जब योगी मुख्यमंत्री बनाये गये थे उस समय संघ के दबाब में मोदी और अमित शाह को हां कहनी पड़ी थी लेकिन योगी का राज्याभिषेक कुल मिलाकर उनकी इच्छा के अनुरूप नही था। पर अब योगी से टयूनिंग बनाने के बाद मोदी-शाह युगल ने पार्टी में अपने एकछत्र वर्चस्व को मजबूत करने के लिए उन्हें अपने टूल के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। अपने बराबर के कद के सभी दिग्गजों को मोदी निपटा चुके हैं। सुषमा स्वराज शारीरिक असमर्थता की वजह से बेदम हैं। अब केवल एक नेता बचा है जो उनके लिए चुनौती बन सकता है वे हैं राजनाथ सिंह जो केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में पहली बार बहुत बेहतर तरीके से काम कर रहे हैं और मोदी के प्रगल्भ युग में उनका संतुलित बोलचाल प्रभावित करता है। जिससे उनकी छवि बड़ी खामोशी के साथ निखर रही है। इसलिए उन्हें बोनसाई करने को मोदी का खेमा सक्रिय हो गया है।
उनका कैंप योगी के भाजपा के सबसे बड़े राजपूत चेहरे के रूप में उभारने की रणनीति पर काम कर रहा है तांकि राजनाथ को हांसिए पर किया जा सके। इसी खेमें के इशारे पर हर राज्य में योगी का नाम पार्टी के स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल किया जा रहा है। गुजरात में तो उनको ज्यादा ही अहमियत दी जा रही है। इसीलिए यूपी के निकाय चुनाव में भाजपा की आधी-अधूरी सफलता को इतना बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने में पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व भी कंधे से कंधा मिलाकर योगदान कर रहा है।

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