
उरई। एक वर्ष से अधिक समय पहले गांधी जयंती पर जालौन जिले के सभी 940 गांवों को 2 अक्टूबर 2018 तक खुले में शौंच से मुक्त कराने का संकल्प घोषित किया गया था। लेकिन इसकी अभी तक की प्रगति इतनी सुस्त है कि 9 दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत भी इसके सामने शर्म खाने लगे।
एक वर्ष यानि तय समय सीमा का आधे से ज्यादा वक्त गुजर जाने तक केवल 62 गांव ओडीएफ यानि खुले में शौंच से मुक्त हो पाये हैं। कार्यक्रम के तहत 1 लाख 51 हजार निजी शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। जिनमें अभी लगभग सवा लाख शौचालय बनना शेष हैं। अधिकारी इसके लिए मुख्य रूप से बजट की अनुपलब्धता और बालू न मिलने का रोना रो रहे हैं।

इसी बीच प्रभारी जिला पंचायत राज अधिकारी राजबहादुर ने बताया कि जिले को हाल ही में शौचालय निर्माण के लिए 6 करोड़ रुपये का बजट मिला है। जिसे ग्राम पंचायतों को भेजा जा रहा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह बजट ग्राम पंचायतों तक पहुंचने के प्रशासनिक कर्मकांड में और इसके बाद लोगों द्वारा काम कराने में कितना समय लग जायेगा। तब तक शायद यह वित्तीय वर्ष भी समाप्त हो चुका होगा।
उधर इसके पहले जोरशोर से जागरूकता कार्यक्रम चलाया गया था। जिससे प्रभावित होकर लोगों ने अपने घरों के सामने शौचालय के टैंक के लिए गडढे खुदवा लिये थे। पर जब धनराशि मिलने के दूर-दूर तक आसार नही दिखे और घर के बच्चे गडढे में गिरकर चुटहिल होने लगे तो मुसीबत से बचने के लिए लोगों ने इन गडढों को पुरवाने में ही खैर समझी। जिला प्रशासन की नाक के नीचे बचे करसान गांव तक में सारे संभावित लाभार्थी अपने गडढे पुरवा चुके हैं। जो ओडीएफ के लक्ष्य की सफलता के नाम पर एक बड़े प्रश्न चिन्ह का प्रतीक नजर आ रहा है।
सत्यापन में भी सुस्ती
इतना ही नही जिन 62 गांवों को खुले में शौंच से मुक्त कराने की रिपोर्ट भेजी जा चुकी है उनका भौतिक सत्यापन भी अभी तक बकाया है। इसके लिए तीन सदस्सीय टीम बनाई गई है। जिसमें एक जिला स्तरीय अधिकारी, दूसरा गैर ब्लाक के एडीओ पंचायत और तीसरे बाल विकास परियोजना अधिकारी को शामिल किया गया है। इस समिति को प्रत्येक गांव में 16 बिंदुओ पर रिपोर्ट बनानी है। साफ है कि इस काम के लिए भी टीमों को बहुत समय देना पड़ेगा। इसके साथ-साथ ग्राम पंचायत सचिवों की डयूटी लगाई गई है कि वे हफ्ते में दो दिन अपने क्षेत्र के गांवों में इस बात की जागरूकता के लिए दें कि शौचालय बन जाने के बाद लोग शौंच के लिए बाहर न जायें, घर के ही शौंचालय का उपयोग करें। लेकिन सरकारी काम काज का जो ढर्रा बना हुआ है उसमें लगता नही है कि सचिव बहुत जिम्मेदारी के साथ इस डयूटी को निभाने की कोशिश करेगें।
महीने के अंत तक 155 स्कूल, आंगनवाड़ियों में शौचालय
डीएम डा. मन्नान अख्तर ने इस बारे में हाल में जब बैठक की तो निराशाजनक तस्वीर सामने आने पर उन्होंने सख्त रवैया अपनाया। उन्होंने कहा कि फिलहाल दिसम्बर का महीना पूरा होने तक 155 चिन्हित गांवों के स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्रों में टाइल्स युक्त शौचालयों का निर्माण अनिवार्य रूप से करा दें। बच्चे जब शौचालय के प्रयोग के अभ्यस्त होगें तो उनके द्वारा घर में भी शौंचालय निर्माण का दबाव बनाने का मां-बाप पर ज्यादा प्रभाव होगा।





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