उरई। प्राथमिक शिक्षा का सरकारी क्षेत्र में कोई पुरसा हाल नही है। कई स्कूल एक अध्यापक के भरोसे चल रहे हैं। अध्यापक के किसी कार्य से न आने की स्थिति में स्कूल का संचालन रसोइये के जिम्मे रहता है। नौनिहालों के भविष्य के साथ हो रहे इस खिलवाड़ को खत्म करने के लिए न तो बेसिक शिक्षा विभाग के और न ही जिला प्रशासन के किसी अधिकारी में कोई तड़प दिखाई देती है।
ग्राम ईंटों के पास सोनेपुरा के प्राथमिक विद्यालय में 55 बच्चों का दाखिला है। जिनमें 50 अनुसूचित जाति से संबंधित हैं, ओबीसी से सिर्फ एक और जनरल केटेगरी के केवल चार बच्चे इस स्कूल में हैं। 55 बच्चों की पढ़ाई के लिए बेसिक शिक्षा विभाग ने यहां केवल एक शिक्षक तैनात कर रखा है। जिसे विभागीय कार्य से अधिकांशतः बाहर रहना पड़ता है। उसके एवज में रसोइया बच्चों को संभालता है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि गरीब परिवारों के बच्चे रसोइये के सान्निध्य में कितना पढ़ सकते हैं और कौन सा मुकाम हासिल कर सकते हैं। दूसरा उदाहरण माधौगढ़ ब्लाक के लक्ष्मणपुरा के स्कूल का है जहां 68 बच्चों पर केवल एक शिक्षक है। इस शिक्षक को भी विभागीय कार्य बहुत पड़ते रहते हैं। जिससे विद्यालय में पढ़ाई नही हो पाती। 68 में से 50 छात्र एससी समुदाय के हैं। यही नही विद्यालय की चाहरदीवारी नही है जिसकी वजह से विद्यालय परिसर पशुओं का बाड़ा बन गया है। क्या सफेदपोश वर्ग के बच्चे इन विद्यालय में पढ़ने पर मजबूर हों तो भी इनकी स्थिति ऐसी बनी रहने की कल्पना की जा सकती है।






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