कोंच-उरई । आजकल यह चर्चा जोरों पर है कि कोंच का आयुर्वेदिक अस्पताल कभी भी हटाया जा सकता है। हकीकत यह है कि यह सिर्फ चर्चा नहीं है बल्कि यह हटाये जाने की प्रक्रिया में शामिल हो चुका है। इसके हटने का मूल कारण इसकी जीर्णशीर्ण हालत होगी। अगर यह अस्पताल हटा तो हजारों लोग लोग आयुष पद्घति का लाभ लेकर अपनी बीमारियों से निजात पा रहे हैं, उन्हें इस लाभ से महरूम होना होगा। जो जानकारियां निकल कर आ रहीं हैं वे बहुत ही भयावह स्थिति बयां करने बाली हैं, सरकार की मंशा आयुष अस्पतालों को खत्म करने की है और उसके स्तर से इस पर अमल भी शुरू हो गया है।

कोंच में लगभग इक्कीस बर्षों से आयुर्वेदिक अस्पताल अस्तित्व में है जो मौजूदा समय में नगर पालिका के सामने पुराने अस्पताल में संचालित है और लोगों को आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्घति का भरपूर लाभ भी मिल रहा है, लेकिन सरकार के फरमान के बाद अब इस अस्पताल का आने बाला भबिष्य ठीक नहीं लग रहा है। सूत्रों की अगर मानें तो सरकार ने ऐसे सभी आयुर्वेदिक चिकित्सालयों को बंद करने का मन बना लिया है जो किराये की बिल्डिंगों में चल रहे हैं। इसके बाद उन अस्पतालों का भी नंबर भी आयेगा जिनके भवन जीर्णशीर्ण हालत में है। कोंच का आयुर्वेदिक अस्पताल इसी दूसरी श्रेणी में आता है और आने बाले समय में यह सुविधा यदि कोंच वासियों से छिनती है तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। सरकार की मंशा है कि आयुष चिकित्सकों को एनपीएचसी में समायोजित करने की है, यानी आयुष डॉक्टरों से एलोपेथिक दवायें दिलाये जाने की दिशा में सरकार बढ रही है। यहां हास्यास्पद यह है कि यह प्रयोग दो सालों के लिये सरकार करने जा रही है और दो सालों में रिजल्ट ठीक न मिला तो इन आयुष डॉक्टरों को पुन: उनके मूल पदों पर शिफ्ट कर दिया जायेगा। हालात यह हैं कि यदि इस अस्पताल को बचाना है तो इसकी बिल्डिंग की ओर यहां के सांसद, विधायक, एमएलसी जैसे जनप्रतिनिधियों को ध्यान देना होगा और अपनी निधि का धन खर्च करके इसका कायाकल्प कराना होगा, अन्यथा की स्थिति में इसका अस्तित्व खत्म समझो। हालांकि इसे बचाने के लिये सांसद भानुप्रताप वर्मा, विधायक मूलचंद्र निरंजन, पालिका चेयरपर्सन डॉ. सरिता वर्मा, जिपं अध्यक्ष प्रतिनिधि देवेन्द्रसिंह, अधिवक्ता परिषद् के संयोजक सुनील लोहिया आदि ने मुख्यमंत्री को इस बाबत अलग अलग पत्र लिखे हैं, लेकिन इन पत्रों के बजाये यदि ये जनप्रतिनिधि अपनी निधि से अस्पताल की इमारत के जीर्णोद्घार के लिये पैसा देते हैं तो इसके बचने में कोई संदेह नहीं रह जायेगा।

 

इंसेट में-

अपनी अक्षमता छिपाने को सरकार का तुगलकी फरमान

कोंच। आयुर्वेदिक अस्पतालों का अस्तित्व समाप्त करने के पीछे सरकार की अपनी खुद की अक्षमता है। प्रदेश में 2 हजार 800 चिकित्सकों के पद खाली हैं जिसके चलते तमाम अस्पताल डॉक्टर विहीन हैं और आम जन को स्वास्थ्य लाभ नहीं मिल पा रहा है। सरकार चिकित्सकों की भर्ती कर नहीं पा रही है इसलिये वह इन अस्पतालों को ही खत्म करने पर उतर आई है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग के सचिव ने 12 दिसंबर 2017 को यह फरमान जारी किया है जिसमें किराये के भवनों व जर्जर भवनों बाले अस्पतालों को खत्म किया जाना है। सरकार का यह फरमान जनता की आंखों में धूल झोंकने बाला है कि वह हर अस्पताल में बेहतर स्वास्थ्य सेवायें मुहैया करा रही है लेकिन जब अंटी में डॉक्टर ही नहीं हैं तो कैसे अस्पतालों में डॉक्टर उपलब्ध हो सकेंगे। आजकल समायोजन का दौर चल रहा है जिसके तहत इन आयुष पद्घति के चिकित्सकों का भी समायोजन किये जाने की मंशा सरकार की है और आयुष पद्घति खत्म करने की भी।

 

 

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