
लखनऊ में हुई उत्तर प्रदेश की इन्वेस्टर्स समिट में केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री उमा भारती की गैर मौजूदगी चर्चा का विषय बनी हुई है। यूपी के औद्योगिक विकास के महाकुंभ कहे गये इस आयोजन में बुंदेलखंड पर विशेष फोकस रहा। बुंदेलखंड एक्सपे्रस-वे बनाने की घोषणा पहले ही हो चुकी थी, समिट में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने मार्च से इस अंचल में डिफेंस कॅारीडोर के लिए काम शुरू करने की घोषणा की है। समिट के दूसरे दिन रेल मंत्री पीयूष गोयल ने झांसी में कोच नवीनीकरण कारखाना लगाने की घोषणा करके बुंदेलखंड के विकास में एक और चौका जड़ दिया। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से उमा भारती इकलौती केंद्रीय मंत्री हैं और जहां बुंदेलखंड के लिए इतना कुछ हो रहा है वहां उनको दूर रखा जाना निश्चित रूप से चैकाने वाला है।
अचानक नही उमा भारती की उपेक्षा
अगर यह घटनाक्रम उमा भारती को हासिए पर धकेलने का प्रयास दिखाता है तो यह अचानक नही है। उमा भारती को लेकर पहले से भाजपा में कुछ समस्या चल रही है। कुछ दिनों पहले उमा भारती ने अपने संस्दीय क्षेत्र झांसी में पत्रकार वार्ता कर स्वास्थ्य कारणों से कुछ समय के लिए चुनावी राजनीति से अलग होने की मंशा जताई थी। तभी ताड़ने वालों ने सूंघ लिया था कि उनके साथ कुछ गड़बड़ है।
शुरू से ही रही बागी नेता की छवि
वैसे देखा जाये तो उमा भारती की छवि शुरू से ही बागी नेता की रही है। लेकिन मोदी युग में उनके अति प्रतिक्रियाशील स्वभाव को भांपने की वजह से वे संयमित हो गई थीं। फिर भी उनका संतुलन तब बिगड़ गया जब राष्ट्रपति चुनाव के पहले कोर्ट ने अयोध्या मामले में लालकृष्ण आणवाणी, मुरली मनोहर जोशी के साथ उनके खिलाफ भी मुकदमा शुरू करने का फैसला सुना डाला। हालांकि वे कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना के खेल के चलते मुकदमें में फंस गई थीं और यह जानती भी थीं। इसलिए इसे लेकर यह सवाल उठा कि क्या इस कारण उनका मंत्री पद छिन सकता है तो विचलित होने की बजाय उन्हें उत्साह दिखाते हुए कहा था कि राम के लिए एक मंत्री पद क्या जीवन भी न्यौछावर करना पड़े तो वे अपने को धन्य समझेगीं। लेकिन शहीद बनने की उस उन्माद में जब उन्होंने उच्चतम न्यायालय के फैसले के तत्काल बाद अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए जाने की घोषणा कर दी तो इस मुददे की संवेदनशीलता के बरक्स उनका यह उतावलापन अंदर ही अंदर नरेंद्र मोदी के भड़क उठने की वजह बन गया।
संघ के वीटो से बचा मंत्री पद
उन्हें तत्काल अयोध्या जाने से रोक दिया गया। लेकिन इसी खटास की वजह से गत वर्ष सितंबर में जब केंद्रीय मंत्री मंडल में फेरबदल किया जाने लगा तो उनका पत्ता साफ करने की कोशिश की गई। इसकी भनक लगने पर घबराई उमा भारती जब संघम शरणम गच्छामि हुई तो संघ ने वीटो का इस्तेमाल करके उनका मंत्री पद बचाया। फिर भी मोदी ने उनसे उनका प्रिय गंगा सफाई मंत्रालय छीन लिया। आहत उमा भारती इसके बाद भोपाल आकर कुछ दिनों कोप भवन मे बैठी रहीं। लेकिन किसी ने उनकी परवाह नही की तो चुपचाप उन्होंने फिर काम शुरू कर दिया।
हमदर्द होकर भी योगी ने मुंह फेरा
संत-साध्वियों के बीच वर्गीय भाईचारे के नाते मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को उमा भारती से निजी तौर पर हमदर्दी है यह सब जानते हैं लेकिन महत्वाकांक्षी योगी की निगाह दूर तक रहती है इसलिए वे इस समय कोई ऐसा काम नही करना चाहते जो मोदी के लिए अरुचिकर हो। लखनऊ की इन्वेस्टर समिट में मोदी के इशारों की इबारत पढ़कर ही योगी ने अपनी साध्वी दीदी यानि उमा को भुलाने में ही गनीमत समझी। यह उमा के लिए जोरदार झटका है और एक संकेत भी है कि उमा अगला चुनाव लड़ेगीं या नहीं इस मामले में उनकी मर्जी की बात तो तब आयेगी तब पार्टी उनको टिकट देगी। जब पार्टी ने ही उनको पवैलियन में भेजने की मानसिकता बना रखी है तो उनकी मर्जी के कोई मायने नही हैं।
बैकवर्ड कार्ड खेलने से भी रहीं
अटल-आणवाणी युग में उमा भारती आये दिन झगड़ा करने के लिए मशहूर रहीं हैं। तब वे पूरी पार्टी को यह आरोप लगाकर मुश्किल में डाल देती थीं कि भाजपा वर्ण व्यवस्था वादी पार्टी है जिसमें पिछड़ों की कोई कद्र नही है। उनके इन तेवरों से पार्टी में भूचाल आ जाता था लेकिन मौजूदा दौर में जब पार्टी का नेतृत्व मोदी के हाथ में है तो इस विकल्प को अपनाने की गुंजाइश उनकी खत्म हो चुकी है।
ऊब चुके हैं संसदीय क्षेत्र के लोग
वैसे उमा भारती से उनके संसदीय क्षेत्र में न तो पार्टी के लोग प्रसन्न है और न ही आम लोग। उनकी गुमशुदगी के पोस्टर कई बार झांसी और ललितपुर में लग चुके हैं। उनके द्वारा पोषित विधायक अवैध खनन की इजारेदारी से लेकर बड़ी कमाई की हर काम के लिए चर्चाओं के केंद्र बिंदु में रहते हैं। इसलिए उनके साथ पार्टी चाहे जो कुछ भी करें उनके संसदीय क्षेत्र में भी कोई उनके लिए अफसोस करने वाला नही है।






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