-भगवानदास अंबेडकर
अनुसूचित जातियों, जन जातियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था से दलित समाज के व्यापक उत्थान का अनुमान दुराशा ही सिद्ध हुआ है। अधिकांश दलित आज भी संसाधनों से वंचित और मजदूरी पर आश्रित हैं। उनके साथ समाज में अपमानजनक व उत्पीड़न की घटनाएं जारी हैं। नौकरशाही में इस समाज की एक बड़ी फौज तैयार हो जाने के बावजूद उनके प्रति अत्याचार और भेदभाव की रोकथाम न हो पाना बिडंबना है। इसलिए यह माना जाना स्वाभाविक है कि आरक्षण की नीति का क्रियान्वयन दोषपूर्ण है। यह नीति पूरे दलित समाज की प्रगति के लिए सहायक बने इसके लिए कुछ कड़वे विकल्पों पर विचार कराना अब लाजिमी हो गया है।
दरअसल अनुसूचित जाति, जन जातियों में एक निहित स्वार्थी वर्ग तैयार हो चुका है। आरक्षण की व्यवस्था इस वर्ग की बंधक होकर रह गई है। यह लोग वे हैं जो पुश्तैनी तौर पर आरक्षण के लाभ पर कब्जा जमाते जा रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इसमें आरक्षण के जरिए शीर्ष नौकरशाही में स्थान बनाने वाले भी शामिल हैं। होना तो यह चाहिए कि ऐसे लोग स्वेच्छा से अपनी अगली पीढ़ी को आरक्षण की दावेदारी से अलग कर लें। उन्हें अपनी संतानों को जनरल कैटेगरी में सफलता हासिल करने के लिए पे्ररित और उत्साहित करना चाहिए। दूसरी ओर वे समाज के प्रति अपना ऋण चुकाने के लिए अन्य दलित परिवारों के प्रतिभावान बच्चों को साधन व मार्गदर्शन मुहैया करायें और आरक्षण का लाभ उनके लिए छोड़ दें।
ऐसा करने के लिए जिस चारित्रिक उदात्तता की जरूरत है उसका उनमे अभावा है। त्याग के लिए नैतिक समृद्धि की जरूरत होती है। लेकिन नैतिक साहस का अवसर वे पद पर रहते हुए भ्रष्ट आचरण की वजह से खो देते हैं। दलितोें की पार्टी की पहचान रखने वाले दल इन्ही की उपज होने के कारण सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई को तार्किक परिणति पर नही पहुंचा सके हैं। दलित नौकरशाही का राजनैतिक हस्तक्षेप के पीछे मकसद मात्र अपने कैरियर को पोषना रहा है। दलितों को दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से उभारने के लिए बाध्य करने की बजाय वे अपने द्वारा पोषित सरकार का इस्तेमाल केवल खुद की बेहतर पोस्टिंग में करते हैं।
एक कहावत है जैसा खाये अन्न, वैसा बनेगा मन। इसी के नाते दलितों की स्वयंभू मसीहा पार्टियां जिनका गठन भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के साधनों से हुआ है वे सत्ता पाने के बाद सामाजिक परिवर्तन की इच्छा शक्ति नही दिखा सकीं। जिस नौकरशाही की मानसिक संतान ऐसी राजनैतिक ताकतें हैं वह नौकरशाही सुविधाभोगी होकर अपने अतीत को भूल चुकी होती है। काम कराने के लिए आज भी लोग दलितों के पास पैसा लेकर नही जाते भले ही उनकी तथाकथित सरकार आ जाये। जाहिर है कि ग्राहकों पर शोषक वर्ग के बिचैलियों की पकड़ आज भी बरकरार है और अधिकारियों को अपनी भ्रष्ट तृष्णा की पूर्ति के लिए ग्राहक चाहिए। इसलिए कुछ दिनों की नौकरी के बाद वे अपने समाज के लोगों के साथ तोहमत खत्म करके शोषक वर्ग के दलालों के साथ सत्संग में रम जाते हैं। इसका प्रभाव उनकी सोच पर देखा जाता है। वे धर्मभीरू होकर उन्ही कर्मकांडों के वशीभूत हो जाते हैं जो उनके पूर्वजों के साथ हुए अन्याय और अपमान के उत्तरदायी हैं।
दलितों की कर्मचारी यूनियनों से राजनीति में आये एक नेताजी का हाल देखिये वे धर्म आधारित उत्पीड़न को कोसकर नौकरी में रहते हुए हम बिरादरों से चंदा जमा करके ऐश करते रहे। बाद में वे वहीं शरणं गच्छामि हो गये जहां से वर्ण व्यवस्था की बहाली के लिए अश्वमेघ का घोड़ा छोड़ा जा रहा है। इसलिए आरक्षण नीति की उल्टी गिनती को रोकना है तो इस नीति को पुश्तैनी एकाधिकारवाद के चंगुल से मुक्त कराना होगा।
वैसे भी दलित समाज को यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए कि वे जनरल कैटेगरी में भी क्यों टापर साबित नही हो सकते। उनमें आनुवांशिक हेयता प्रचारित की जाती है। जिसका जबाव देने के लिए आत्मबल दिखाना पड़ेगा। बाबा साहब अंबेडकर जब तक देश में पढ़ रहे थे यहां के हतोत्साहन भरे सामाजिक परिवेश के कारण वे परीक्षा में औसत से भी कम का प्रदर्शन कर पाते थे। लेकिन पश्चिम के मुक्त समाज में बाहर अध्ययन के लिए जाकर सांस लेने का अवसर जब उन्हें मिला तो उनमें अंतर्निहित प्रतिभा का जैसे विस्फोट हो गया और आज दुनियां की सबसे बड़ी यूनीवर्सिटी की अभी तक के सबसे मेधावी छात्र के रूप में अंतर्राष्ट्रीय समाज उन्हें तस्लीम कर रहा है। आज अगर संकल्प में दृढ़ता हो तो दलित समाज में उन गुदड़ी के लालों की कमी नही है जो बाबा साहब की तरह ज्ञान के क्षेत्र में किसी से भी आगे निकलने की क्षमता दिखा सकते हैं। यह पहल कौन करेगा। फिर एक बार कहना पड़ेगा कि इसकी जिम्मेदारी नौकरशाही के शीर्ष पदों पर बैठे दलित समाज के अधिकारियों की है। उनकी संताने उस परिवेश से बाहर निकल चुकीं हैं। जिसमें आम दलितों के बच्चों को संघर्ष करना पड़ता है। अगर वे अपने बच्चों को जनरल कैटेगरी में टापर बनाकर दिखाने का इरादा बना लें तो स्थितियां बदल जायेंगीं और उनकी संतानों की उपलब्धियां आम दलितों में भी मनोबल के संचार का काम करेगी।
इसलिए हम चाहते हैं कि आरक्षण में ऐसा नियम बने जिससे प्रथम श्रेणी के अधिकारी अपनी संतानों को इसका लाभ दिलाने के लिए तत्पर न रह सकें। इससे आरक्षण का लाभ विकेंद्रित होगा। साथ ही सामाजिक ऋण की अनुभूति से विमुख वर्गीय संरचना को अनुसूचित जाति, जन जातियों में पनपने से रोका जा सकेगा। इस आरक्षण नीति से भोगे हुए यथार्थ वाले अनुसूचित जाति, जन जाति के अधिकारियों, कर्मचारियों के जत्थे आने की निरंतरता बनी रहेगी। जिन्हें अपने समाज के ऋण को चुकाने का दायित्व पूरी तरह याद होगा।
(लेखक: खुशहाल भारत निर्माण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष है)






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