
कोंच—उरई । अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के 83वें स्थापना वर्ष एवं महान साहित्यकार राहुल साकृत्यायन के 125वें जयन्ती वर्ष के उपलक्ष्य में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) एवं प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) कोंच इकाईयों के संयुक्त तत्वाधान में ‘राहुल साकृत्यायन के विचारों की प्रासंगकिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें महान साहित्यकार व घुमक्कड़ी विधा के जनक राहुल साकृत्यायन के व्यक्तित्व व कृतित्व पर चर्चा की गई। संगोष्ठी के उपरान्त तीन दिवसीय नाट्य महोत्सव का आगाज सरोजनी नायडू पार्क में नाटक ‘चोरों के राज के मंचन के साथ प्रारंभ हुआ।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए इप्टा व प्रलेस के प्रांतीय सचिव डॉ. मोहम्मद नईम ने कहा कि महापंडित, आधुनिक बुद्ध और घुमक्कड़ मनीषी के नाम से प्रख्यात राहुल साकृत्यायन भारतीय संस्कृति और साहित्य के सबसे विराट व्यक्तित्वों में से एक रहे हैं। बौद्ध भिक्षु से लेकर माक्र्सवादी चिंतक तक की उनकी जीवन यात्रा इतने मुकामों और विविधताओं से गुजरी है कि उस पर सहसा यकीन करना मुश्किल हो जाता है। बौद्ध भिक्षु के रुप में उन्होंने घुमक्कड़ी में अपना जीवन बिताया। उन्होंने कहा कि घुमक्कड़ी उनके जीवन का मूल मंत्र रही। 9 अप्रैल 1893 को जन्मे केदारनाथ पांडे की 14 अप्रैल 1963 तक राहुल साकृत्यायन बनने की यात्रा अत्यन्त रोमांचक, हृदयस्पर्शी व अनुकरणीय है। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए इप्टा व प्रलेस कोंच इकाईयों के संरक्षक अनिल वैद एडवोकेट ने कहा कि राहुल साकृत्यायन के बगैर हिंदी साहित्य व संस्कृति का अध्ययन अधूरा है। वह आजीवन यायावरी जीवन व्यतीत करते रहे। इस घुमक्कड़ी जीवन में उन्होंने कुछ समय कोंच और महेशपुरा ग्राम में भी बिताया, लेकिन यह कष्ट का बिषय है कि स्थानीय स्तर पर उन्हें समारोहपूर्वक याद भी नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि वे न केवल साहित्यिक व्यक्ति थे, बल्कि राजनैतिक व्यक्ति भी थे, उन्होंने वामपंथ के जरिये देशसेवा का व्रत लिया।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए सभासद नपा अनिल पटैरया ने कहा कि राहुल साकृत्यायन का कोंच से आत्मीय लगाव था, वे यहां के प्रतिष्ठित पहारिया परिवार के अतिथि भी रहे। उनकी साहित्यिक यात्रा में साहित्य की कोई भी विधा ऐसी नहीं है जिसमें उन्होंने लेखन कार्य न किये हो। वे आधुनिक युग के साहित्यिक महामानव थे। शिक्षक नीरज द्विवेदी ने कहा कि राहुल साकृत्यायन ने अनेकों सामाजिक कुरीतियों को तोड़ा जिसके कारण उन्हें संस्कृति के कथित ठेकेदारों के विरोध का भी सामना करना पडा। इस अवसर पर रंगकर्मी सायना खान, राज शर्मा, कोमल, तसलीम ने भी विचार व्यक्त किये। संगोष्ठी का संचालन ट्विंकल राठौर ने व आभार भास्कर गुप्ता ने व्यक्त किया।
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‘चोरों का राज ने खोली व्यवस्था की पोल
संगोष्ठी के उपरांत डॉ. मोहम्मद नईम द्वारा लिखित व निर्देशित नाटक ‘चोरों का राज का मंचन रंगकर्मियों ट्विंकल राठौर, अंकुर राठौर, रानी कुशवाहा, सायना खान, राज शर्मा, योगवेन्द्र कुशवाहा, आदर्श कुमार, अमन अग्रवाल ने किया जिसके माध्यम से रंगकर्मियों ने समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की समस्या पर करारा व्यंग्यात्मक प्रहार किया। नाटक में दर्शाया गया कि एक आम आदमी को बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की समस्याओं से जूझना पड़ता है। यदि उसके जीवन में कहीं कोई खुशी की किरण भी होती है, तो टैक्स दर टैक्स उस पर लाद दिया जाता है। जब वह जिम्मेदारों से सवाल करता है तो उसे बदले में पिटाई और अपमान ही मिलता है। रंगकर्मियों ने इन प्रश्नों का हल बताते हुए संदेश दिया कि हमें लोकतंत्र में अपना नेता चुनते समय अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए, पढाई और आर्थिक स्वावलंबन के माध्यम से हम अपनी समस्यायों से छुटकारा पा सकते हैं। रंगकर्मियों ने समाज में अच्छे लोगों की एकजुटता और उनके संगठित होने पर भी बल दिया। कार्यक्रम का प्रारंभ इप्टा गीत ‘बजा नगाड़ा शांति का, शांति का, शांति काÓ तथा समापन जनगीत ‘ले मशालें चल पड़े हैं, लोग मेरे गांव के से हुआ।






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