उत्तर प्रदेश सहित आठ राज्यों में बैंकों के एटीएम एकाएक रीत जाने से एक बार फिर खलबली मच गई। भाजपा के कुछ नेताओं ने इसके पीछे कोई गहरी साजिश बताकर दूर की कोड़ी लाने का काम किया है। इंदिरा गांधी के जमाने में सरकार की हर विफलता का ठीकरा बाहरी शक्तियों के सिर पर फोड़ते हुए विपक्ष को उनका मोहरा साबित करने का फैशन बन गया था। जिसमें अति होने पर बाद में इस ट्रेंड का मजाक उड़ाया जाने लगा था। मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य की सरकार चलाने का लंबा तजुर्बा हासिल होने के बावजूद शिवराज सिंह चैहान ने खासतौर से एटीएम खाली होने को लेकर साजिश की थ्योरी प्रतिपादित की जो शेखचिल्ली पन की इंतहा है। जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनके मुताबिक यह संकट अचानक पैदा नही हुआ है। लगभग एक पखवारे से एटीएम में कैश की किल्लत चल रही थी जिसने 17 अप्रैल का दिन आते-आते विकराल रूप धारण कर लिया, जब कई राज्यों में आटोमैटिक मशीन में कैश खत्म हो जाने से अफरा-तफरी की हालत पैदा हो गई। यह भी खबर है कि गुजरात की सरकार को एक सप्ताह पहले नगदी संकट पैदा होने का आभास हो गया था। फिर भी इसके समाधान का प्रयास नही किया गया। रिजर्व बैंक सोता रहा जबकि नगदी की आपूर्ति बैंकों में समुचित मात्रा में बनाये रखने की जिम्मेदारी उसकी है। केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली को हालत के गंभीरता के कारण सामने आकर सफाई देनी पड़ी कि त्यौहारों के कारण नगदी की मांग बढ़ने और मार्च क्लोजिंग के चलते ऐसा हुआ जो एक अंतरिम गतिरोध है। जल्द ही आटोमैटिक मशीनों में पर्याप्त नगदी की व्यवस्था सुचारू हो जायेगी। देखा जाये तो कुल मिलाकर यह नगदी प्रबंधन में सरकार की बड़ी विफलता है। जिसके चलते कई तरह के अंदेशों ने जनमानस को विचलित कर दिया है।यह अफवाह फैल रही है कि बैंक दीवालिया होने के कगार पर पहुंच गये हैं। जो बुरा कर्जा बाटा गया है उसकी मात्रा बड़ी है जिसके वापस न लौटने से बैंक डूबने के कगार पर पहुंच गये हैं। कुछ लाल बुझक्कड़ों ने कहा है कि बैंकें लोगों की जमा राशि को जबरन पांच साल के लिए ब्याज के साथ एफडी में बदलने का प्लान कर रही हैं। नगदी संकट इसी की देन है। इस तरह बैंकों में जमा लोगों का पैसा उद्योगों और व्यापार को बढ़ाने के लिए दिया जायेगा तांकि देश की आर्थिक स्थितियां दुरुस्त हो सकें। एक ओर बैंकों में जमा पर नगण्य ब्याज दर, दूसरे तरह-तरह के चार्जेज के बहाने जमा मेें मनमानी कटौती और इसके बाद अपने ही पैसों को न निकाल पाने की स्थितियां इससे डरावना माहौल बन गया है। आम लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं। बैंक में पैसे रखे तो ब्याज मिलना दूर चार्जेज की कटौती में मूल धन गवां देना पड़ेगा और अगर रकम घर में रखते हैं तो न तो रकम सुरक्षित रहेगी और न वे। लोगों को माहौल बहुत अनिश्चित नजर आ रहा है। नोटबंदी के पीछे कितनी ज्यादा बकवास थी अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है। मोदी सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने जा रही है। इस बीच केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अर्थ नीति के नाम पर बिना ब्रेक की गाड़ी चलाई है जो पता नही कितने बड़े हादसे का शिकार हो जायेगी।

स्रकार चलाना खिलवाड़ का काम नही है। इसलिए सरकार में बहुत दूर तक के परिणामों का अंदाजा लगाने की क्षमता होनी चाहिए तभी वह सार्थक फैसले लागू कर सकती है। अब भाजपा के समर्थक तक ऊब कर यह मानने को मजबूर होने लगे है कि यह जुमलेबाजों की और शोशेबाजों की सरकार है। कुछ न कुछ ऐसा करते रहना जिससे थ्रिल पैदाकर लोगों की टकटकी अपनी ओर बनाई रखी जा सके। यह सरकार का सिद्ध मंत्र है। इसलिए नादान फैसले करना उसकी नियति बन गया है। वह तो सरकार की खुदकिस्मति है कि मुख्य विपक्ष कतई स्मार्ट नही है। इसलिए अंधाधुंध चलने की छूट उसे मिली हुई है। हालांकि इससे देश का भविष्य बहुत चैपट हो रहा है।

बंदी के नतीजे को लेकर माया मिली न राम की हालत है। अभी तक सरकार यह गणना नही करा पाई है कि नोट बंदी से उसकी कितनी मुद्रा वापस लौट आई। अंदेशा तो यह तक जताया जा रहा है कि इस दौरान सरकार द्वारा जारी किये गये कुल कैश से ज्यादा रकम बैकों में जमा हो गई है जो कि एक अजूबा है। काला धन विदेशों से तो वापस लाया ही नही जा सका, नोटबंदी से देश के अंदर जो काला धन है उसे जब्त किये जाने का आशावाद भी थोथा निकला। उल्टे बड़े मगरमच्छो का कालाधन सफेद हो गया। सरकार और बैंकों को इस कदम से कोई लाभ नही हुआ। फायदा हुआ तो केवल बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों को जिन्होंने अघोषित कैश को बदलने के लिए तीस प्रतिशत तक कमीशन कमाया। सरकार को उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कुछ राजनैतिक फायदा जरूर हुआ क्योंकि यहां जो मुख्य विपक्षी दलों के कार्ताधर्ता थे उनके सामने पैसों का संकट पैदा हो गया। नतीजतन खर्च के मामले में वे भाजपा से बहुत पिछड़ गये। उनकी हार की एक बड़ी वजह यह भी रही अब कहा जा रहा है कि एटीएम कैशलैस होने के पीछे एक बार फिर राजनीतिक मकसद है। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने हैं पंचायत से लेकर महापंचायत यानि लोकसभा तक के चुनाव में नगदी बड़ी भूमिका निभाती है। सत्तारूढ़ पार्टी ने कर्नाटक में अभी से इसका बंदोबस्त करने का ताना-बाना बुना है जिसकी व्यूह रचना के चलते बैंकों के एटीएम खाली हो गये।
प्रधानमंत्री भले ही कहें कि आजादी के 70 सालों में इस देश में कुछ नही हुआ। हालांकि इन 70 सालों में जनता पार्टी, भाजपा के सहयोग से संचालित रही संयुक्त मोर्चा और अटल जी की सरकारें भी शामिल हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि आजादी के समय जो विरासत अंग्रेजों से तत्कालीन नेताओं को मिली थी वह बेहद बदतर थी। इन 70 सालों में पूंजीगत संस्साधनों के वितरण और संचालन को बढ़ाया गया। कुतंलों सोना चंद लोगों ने जमीन के अंदर दफन कर रखा था और देश की 90 फीसदी से ज्यादा आबादी भूखी और नंगी बसर कर रही थी। यह सारा धन बाजार में निकल आया। उपभोक्ता क्रांति ने बहुत बड़ी आबादी की जीवन स्थितियां बदल कर रख दीं। हाल के दशक में मनरेगा जैसे प्रयोग ने बीपीएल आबादी तक को उपभोक्ता की हैसियत में खड़ा करके बाजार को जो मजबूती प्रदान की उससे रोजगार सृजन में भी बड़ी मदद मिली लेकिन इसी के समानांतर पूंजीगत केंद्रीय करण के कुचक्र भी चलते रहे हैं जो आम जनता को मिली खुशहाली को छीनने की भूमिका अदा कर रहे हैं। सरकार पैट्रोलियम पदार्थों पर नाजायज भारी शुल्क लगाकर आम जनता को लूटने में लगी है क्योंकि असली कर दाता की गर्दन पकड़ने की कुब्बत उसमें है नही। चंद लोग हजारों-करोड़ कृषि आमदनी दिखाकर सरकार को कर देने के नाम पर अंगूठा दिखा जाते हैं और सरकार उनको बेनकाब करने की बजाय उनकी पर्देदारी में लगी रहती है। गरीबों के लिए हर चीज में सब्सिडी खत्म हो रही है। नगरीय ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार के ढांचागत विकास किया जा रहा है लेकिन इसकी कीमत विकास शुल्क की आड़ में मनमाने ढंग से आम लोगों से वसूली जा रही है। शिक्षा और इलाज जैसी सेवाओं से सरकार ने अपने हाथ खींच लिए है और लोगों को इनके लिए मुनाफाखोर भेड़ियों के आगे धकेल दिया है। जिससे लोग सहूलियत के साथ बुनियादी जरूरतें पूरी करने तक के मोहताज हो रहे हैं।
नोटबंदी का फैसला लागू करते समय सरकार ने ऐसा सब्जबाग दिखाया था जैसे सरकार इसके जरिए इतना कालाधन निकालने में कामयाब होगी कि उसे आम लोगों से अंधाधुंध टैक्स वसूलने की जरूरत नही रह जायेगी। यह कल्पना गलत भी नही थी। कालाधन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की इच्छाशक्ति अगर सरकार सचमुच दिखा पाती तब तो तस्वीर ही पलट जाती। ऐसे उपायों से इतनी संपत्ति जब्त की जा सकती है कि सरकार पैट्रालियम पदार्थों पर बेजा शुल्क को तत्काल सीमित कर सके जिससे बाजार में हर चीज की लागत और कीमत जुड़ी हुई है। शिक्षा, स्वास्थ्य को वापस अपने हाथ मेें लेकर लोगों को उनकी बुनियादी जरूरतों के मामले में भी सरकार निश्ंिचत कर सकती है। नैतिक स्तर सुधारने के लिए धार्मिक और संस्कृतिवादी पार्टी होने के नाते उम्मीद की जा रही थी कि भाजपा संयम और सादगी का प्रसार करेगी। भाजपा के नेता बेटे-बेटियों की शादी के मामले में तड़क-भड़क खत्म करने की आचार संहिता चलायेगें। फिजूलखर्ची और दिखावा दो चीजें है जिनकी वजह से लोगों में भ्रष्टाचार की मजबूरी बढ़ी है लेकिन सरकार को समाज में बदलाव लाने की बजाय अधिकतम कार्यकाल का रिकार्ड बनाने की चिंता है। मेघनाथ के बाप रावण के पास इतनी दौलत थी कि उसने लंका में सोने की राजधानी बसा ली थी। इसीलिए मेघनाथ को मायावी प्रपंचों से इतना लगाव था, उसने मायावी प्रपंचों को इतना सिद्ध कर लिया था कि साधन विहीन विरथ रघुवीरा यानी भगवान श्रीराम के छक्के युद्ध में उसके सामने छूट गये थे। माया का प्रभाव अभी भी समाप्त नही हुआ है अब माया के सहारे चुनावी युद्ध जीतने के मंसूबे ही जब अंदर हो तो मूल्यों की राजनीति को अपनाने की सूझ कैसे आ सकती है।






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