उरई। बुंदेलखंड में प्राकृतिक आपदाओं के अलावा भी खेती के दुश्मन हजार हैं। पिछले एक दशक से अन्ना प्रथा यहां की रही सही खेती की बर्बादी में बड़ी भूमिका अदा कर रही है। उत्तर प्रदेश की सरकार ने इस पर अंकुश के लिए कई कार्ययोजनाएं लागू कीं पर प्रशासन में इच्छा शक्ति के अभाव से वे परवान चढ़ती नही लग रहीं। अन्ना प्रथा के कारण सबसे ज्यादा नुकसान छोटे किसानों को उठाना पड़ रहा है।
ऊमरी के बुजुर्ग किसान उमा सिंह बताते हैं कि आज से 10 साल पहले अन्ना प्रथा से गांव वालों का कोई परिचय नही था। पुराने समय में गाय को लेकर बड़ी मान्यता थी। तब एक जानवर की तरह सिर्फ गाय पुकारना बाजिब नही लगता था। गाय का जिक्र आता तो अपने आप मुंह से गो माता निकलता था। कन्यादान में देने के लिए अगर गाय घर पर नही होती थी तो खरीदी जाती थी और वर पक्ष भी गाय दान मिलने पर अपने को बड़ा सौभाग्य मानता था लेकिन आज गाय को पूंछने वाला नही है। हालांकि सरकार की सख्ती की वजह से गौ वध पर काफी अंकुश हो गया है लेकिन इनके पुनर्वास के लिए हो रहे प्रयास सार्थक न होने से किसानों की परेशानी बढ़ गई है। कदम-कदम पर गायों के झुंड देखने को मिल जाते हैं। रात में जिस खेत की ओर इन झुंडों का मुंह हो जाये उसका मैदान साफ हो जाता है।
कुठौंद ब्लाक में नकेलपुरा निवासी रमाकांत चतुर्वेदी के पास सिर्फ चार बीघा खेती है। जिसमें गत सीजन में गेंहूं की फसल तैयार खड़ी थी। गायों का धावा हुआ और रात भर में खेत वीरान हो गया। इसी गांव के देवेंद्र मिश्रा की दो बीघा अरहर में गायों ने एक पेड़ नही बचने दिया। हजारों लघु और सीमांत किसानों को अन्ना प्रथा के कारण फसल के समय सर्वस्व गंवाना पड़ रहा है।
समाजसेवी परम सिंह चतुर्वेदी के मुताबिक राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में जालौन जनपद को दलहन प्रोत्साहन के लिए चुना गया है। लेकिन अन्ना प्रथा इस मामले में सरकार की मंसूबे चैपट कर रही है। गायें सबसे ज्यादा नुकसान मटर की फसल में करती हैं। जिसकी वजह से सारे देश में मटर उत्पादन के लिए सुर्खियों मे रहने वाले जालौन जिले में किसान इसकी बुबाई बंद करने को मजबूर होने लगे हैं।
क्या है अन्ना पशु प्रथा
देशी गाय का बाजार मूल्य घटने के साथ उसका दूध निकलना बंद हो जाने पर उसे छुटटा छोड़ देने के रिवाज ने अन्ना प्रथा का रूप ले लिया। चूंकि किसान दूध देना बंद हो जाने के बाद उसके चारे-पानी का खर्चा उठाना नही चाहते और ऐसी गाय दूसरे द्वारा पकड़े जाने का भी खतरा नही रहता। हल से खेती बंद होने के कारण बछड़ों की भी उपयोगिता खत्म हो गई है। अन्ना प्रथा के कारण सड़क, पगडंडियों पर गोवंश के झुंड के झुंड विचरण करते हैं। जिनकों देखकर किसानों का कलेजा मुंह में आ जाता है।

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