
रामविलास पासवान आखिर राजग में बने रहने के लिए रजामंद हो गए हैं । उन्हे मनाने के लिए अमित शाह को उनके घर जाना पड़ा । उपेन्द्र कुशवाहा के राजग से अलग होने के बाद अगर रामविलास पासवान भी छिटक जाते तो इसका संदेश देशव्यापी स्तर पर पार्टी के प्रतिकूल जाता । इसलिये पासवान को साधने के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को तत्परता दिखानी पड़ी ।
उदारता के तमाम नाटक के वाबजूद वर्ण व्यवस्था के लिए संघ संचालित होने से भाजपा की प्रतिबद्धता छिपी नहीं है । जिसके कारण इसकी सोशल इंजीनियरिंग में दरकन लाजिमी है । मौका लगते ही पार्टी की वर्गसत्ता में सांस्कृतिक दंभ का फन उठ जाता है और सामाजिक समरसता कराहती नजर आने लगती है । विरोधाभासों को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए साधे रखना एक सीमा के बाद दुष्कर रहता है क्योंकि अंततोगत्वा हितों का टकराव सतह पर आने से नहीं रोका जा सकता । यह स्थिति अतीत में सामने आ चुकी है , इतिहास अपने को दोहराने की हालत में है ।

पिछली शताब्दी के अंतिम दशकों में पश्चिमी के विचारकों ने विचारधाराओं के अंत की घोषणा की थी । तब भारतीय संदर्भों में यह मुहावरा बहुत स्पष्ट नहीं था । राजग के गठन का समय आते –आते इस मुहावरे का खारापन भारतीय राजनीति में भी झलकने लगा । राजनीति में कैरियर की चिंता ने विचारधारा को गौण कर दिया । सामाजिक न्याय के तमाम योद्धा अपनी लड़ाई को आधे अधूरे मोर्चे पर तिलांजलि दे कर हिन्दू पुनरुत्थान के कारवाँ में राजग के पार्टनर बन कर शामिल हो गए । यहां तक कि मोदी युग आते –आते रामदास आठवले और उदित राज तक अपना सारा जौहर खूंटी पर टाँग कर भाजपा की छतरी के नीचे जा दुबके । लेकिन रहिमन कैसे निभे कैर बेर को संग । भाजपा में तो नरेंद्र मोदी तक पर बन आई है । हिन्दी पट्टी के तीन बड़े राज्यों में पार्टी की हार का प्रमुख ठीकरा उनके सिर पर फोड़ा जा रहा है । कहा जा रहा है कि अगर उन्होने एससी –एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में संशोधन न किया होता तो भाजपा को यह दिन नहीं देखने पड़ते । एक बड़ा कट्टरवादी तबका उनके द्वारा लिए गए कुछ फ़ैसलों के उदाहरण गिना कर उन्हे सवर्ण विरोधी साबित करने पर तुल गया है । इन लोगों की निगाह में पहले से ही था कि भाजपा का असल उद्धार तभी होगा जब सामाजिक राजनीतिक कार्य संचालन की बागडोर पूरे तौर पर सवर्णों के सुपुर्द होगी । इसी मानसिकता के कारण कल्याण सिंह को भाजपा से बाहर होने के लिए मजबूर होना पड़ा था । जिसके चलते राम प्रकाश गुप्ता के बाद राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बनाये जाने के वाबजूद उत्तर प्रदेश में भाजपा को लंबे समय तक के लिए वनवास झेलना पड़ा था ।

फिर भी केशव मौर्या का चेहरा आगे करके उत्तर प्रदेश की सत्ता हथियाने के बाद सरकार की चाभी योगी को थमा दी गई । इस चकमे से अपने को छला महसूस कर रहे बहुजन आवाम ने नई प्रदेश सरकार की मधुमास बीतने के पहले ही तीन महत्वपूर्ण लोकसभा उपचुनावों में किरकिरी कर दी । जाहिर है कि यह तो ट्रेलर है अभी पूरी फिल्म आना बाकी है जो शायद भाजपा के होश उड़ा दे । फिर भी हठधर्मी तत्व सबक सीखने को तैयार नहीं है । प्रधानमंत्री मोदी को भी इलहाम है कि अगर 2019 में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो राजग के बहुमत के बाद भी व्यक्तिगत तौर पर उन्हें सत्ता में बने रहने के लिए पार्टी के अंदर बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है ।

रामविलास पासवान का एक समय अलग ही क्रेज था जब जनता पार्टी युग में वे सबसे ज्यादा वोटों से लोकसभा का चुनाव जीते थे । लंबे समय तक किसी वर्ग के हों देश के युवा लोकसभा में रामविलास पासवान द्वारा दिये जाने वाले भाषणों की शैली के दीवाने रहते थे । विश्वनाथ प्रताप सिंह उन्हे पहले दलित प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करना चाहते थे । पर सामाजिक न्याय का मसीहा भी जाति के सिस्टम की भूलभुलैया में अटक गया । उनके खास सिपहसालार लालू यादव को ही दलित को इस कदर सिर चढ़ाना गवारा नहीं हुआ । लालू यादव के लिए वंचितों की लड़ाई का मतलब सवर्णों की जगह पिछड़ों को स्वामी बनाना था जिसमें दलित की जगह विदूषक सेवक के रूप में ही तय रहे जिसे उन्होने रमईराम को अपनी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद दिखाया था । डॉ अबेडकर ने जाति सिस्टम के लिए सोपानवत संचरना का जिक्र किया है उसे पढ़ कर पिछड़ा नेतृत्व की दलितों के संदर्भ में विडंबनापूर्ण सोच को समझा जा सकता है हालांकि लालू यादव की वैचारिक ईमानदारी कई मामले में काबिले तारीफ है लेकिन अंततोगत्वा यहपिछड़ों की नियति है कि उसके युद्ध की सारी चेष्टाएं जजमानी का सम्मान पाने में विसर्जित हो जाती हैं ।

लालू के वैचारिक स्खलन का मुहाना उनमें कर्मकांडों के प्रति उपजे झुकाव में देखा जा सकता है । कल्याण सिंह भी आजकल सामाजिक न्याय का राग प्रखरता से आलाप रहे हैं लेकिन कहीं न कहीं दलितों के प्रति दोयम ग्रन्थि का ही नतीजा है था जब वे मुख्यमंत्री थे और सूरजभान राज्यपाल तब उनका राजभवन से छत्तीस का आंकड़ा हो गया था ।

बहरहाल सत्ता बनाये रखने के लिए बहुजन की कुंजी को हाथ से न फिसलने देना मोदी –शाह का अभीष्ट है । तो क्या पासवान के बाद अब उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर को भी साधने की कोई मुहिम भाजपा का शीर्ष नेतृत्व योगी को बाईपास करके चलाएगा ।






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