
इस दिल के टुकड़े हजार हुए कोई इधर गिरा कोई उधर गिरा । कुछ इसी तर्ज पर अपना दल भी बिखराव का शिकार है । इससे जुड़े नेताओं में से कोई न कोई आए दिन नए दल का रजिस्ट्रेशन करा रहा है । इस दिशा में ताजा कवायद धर्मराज पटेल की सामने आई है जिन्होने अपना दल बलिहारी के नाम से निर्वाचन आयोग से रजिस्ट्रेशन कराया है । ध्यान रहे कि धर्मराज पटेल अपना दल के संस्थापक सदस्यों में से हैं और अपना दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के भी सदस्य रहे हैं ।
दरअसल अपना दल की विचाराधारा में एक कशिश है जो शोषित , वंचित समाज को संघर्ष के लिए उठ खड़े होने को प्रेरित करती है । इसलिये अपना दल से जुड़े रहे लोग बतर्ज कलियुग केवल नाम अधारा पर अमल करते हुए इसके नाम के सहारे अपने लिए बड़ी राजनीतिक संभावना का दिवास्वपन देख रहे हैं ।

अपना दल की स्थापना सोनेलाल पटेल ने की थी जिन्होने हाशिये पर छिटकी जातियों को सत्ता समाज के केंद्र में लाने के लिए संघर्ष का तानाबाना बुना था । सोनेलाल पटेल अपना दल के नाम से नया सियासी आशियाना बनाने के पहले बसपा के संस्थापक कांसीराम के साथ बहुजन समाज को लामबंद करने के लिए कंधे से कंधा मिला कर काम कर चुके थे । इस बीच सोनेलाल पटेल की मायावती से नहीं पटी और जब मायावती का वर्चस्व बसपा में बढ़ना शुरू हुआ तो सोनेलाल पटेल को अपने लिए अलग रास्ता तलाशना पड़ गया जिसके तहत 4 नवम्बर 1994 को लखनऊ में पहले कुर्मी समाज की विशाल रैली आयोजित कर अपने को तौला और इसके बाद 11 नवम्बर 1995 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में जलसा बुला कर अपना दल के नाम से नए राजनैतिक दल के गठन का ऐलान कर डाला ।
हालांकि नए दल की लाइन भी कमोबेश बसपा जैसी ही थी । अपना दल भी भारतीय समाज की उस मेहनतकश जमात में जोश फूँकने वाला था जो बहुमत में होते हुए भी शासन , प्रशासन में हाशिये पर छिटकी हुई थी । भले ही सोनेलाल पटेल को अपना दल से बड़ी चुनावी कामयाबी न मिल पायी हो लेकिन प्रदेश के लगभग हर अंचल में अपनी मजबूत उपस्थिति दिखा कर उन्होने मुख्य धारा के दलों में झुरझुरी पैदा कर दी थी ।

अल्प समय में ही अपना दल के एक बड़ी ताकत के रूप में खड़े होने का श्रेय सोनेलाल पटेल के अकथ परिश्रम , लगन के साथ उनके जुझारू तेवरों को दिया जाता है जिसकी उन्हे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी । 23 अगस्त 1999 को इलाहाबाद के पी डी टंडन पार्क में पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज के कारण वे जिंदगी भर असहनीय चोटों के लिए अभिशप्त हो गए थे । 2009 में कानपुर में एक संदिग्ध सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई जिसे ले कर आरोप लगाया जाता है कि यह हादसा नहीं था बल्कि सुनियोजित साजिश के तहत उनकी हत्या कराई गई थी ।
सोनेलाल पटेल ने अपनी पत्नी कृष्णा पटेल को भी अपने सामने ही राजनैतिक कुरुक्षेत्र में उतार दिया था जिसके तहत उन्होने 2 बार विधानसभा चुनाव में ज़ोर आजमायाश की जिसमें भले उन्हे कामयाबी न मिल पायी हो लेकिन पार्टी को स्थापित करने में उनके चुनावी संघर्ष के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता । अपने पति के मिशन का कारवां थमने न देने के लिए उनकी मौत के बाद कृष्णा पटेल ने अपने तीसरे नंबर की पुत्री अनुप्रिया पटेल को जो कि सोनेलाल पटेल के निधन के समय कानपुर में उनका स्कूल देख रहीं थीं अपना दल के लिए सेवायें देने को प्रेरित किया । इसका नतीजा यह हुआ कि अनुप्रिया पटेल पहले वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक निर्वाचित हो गयीं और इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सहयोग से मिर्जापुर सीट पर जीत का झंडा गाड़ कर उन्होने संसद में इंट्री ले ली ।
लेकिन उन्हे इन चुनावी सफलताओं को ले कर यह गुमान नहीं होना चाहिये था कि इसके पीछे उनका कोई निजी करिश्मा है । लेकिन शायद उन्हे इसी तरह के अभिमान ने कहीं न कहीं ग्रसित कर लिया जिसकी वजह से पार्टी के सिद्धांतों की कीमत पर वे भाजपा के शरणागत होने के लिए अग्रसर हो गयीं । खुद केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह पा गयीं , पति आशीष पटेल को प्रदेश के उच्च सदन में दाखिल कराने के बाद योगी मंत्रिमंडल में समायोजित कराने के लिए पूरा ज़ोर लगा रहीं हैं । उनकी यह कवायद मां बेटी के बीच दरार की वजह बन गई । नतीजतन उन्होने फजीहत के साथ अपनी मां को किनारे करके स्वयम राष्ट्रीय अध्यक्ष बन कर समूची पार्टी को हाइजेक कर लिया । सोनेलाल पटेल के मिशनरी अनुयायी उनकी इस ध्रष्टता को पचा नहीं पा रहे हैं ।
अब उन्हे मिशन तब ध्यान आता है जब अपने पति की बर्थ राज्य मंत्रिमंडल में सुरक्षित कराने के लिए भाजपा को ब्लैकमेल करना होता है । यह बात सही है अब भाजपा जबकि देश में अपना चक्रवर्ती शासन स्थापित कर चुकी है सामाजिक मामले में अपने असली रंग पर आ गई । उसके चश्मे वाले रामराज में किसी शंबूक के लिए शिक्षा , साधना और पद की कोई गुंजायश नहीं है । इसके कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक के भविष्य पर पार्टी में तलवार लटकी नज़र आ रही है । उत्तर प्रदेश में प्रशासन में इसी रामराज के फार्मूला को आगे बढ़ाने के लिए योगी ने महत्वपूर्ण पदों पर न केवल मुसलमानों का बल्कि ओबीसी और एस सी अधिकारियों का भी लगभग सफाया कर दिया है । इसलिये अपना दल जैसी राजनीतिक शक्तियों को अपना एजेंडा आगे लाने के लिए यह माहौल बहुत उर्वरा साबित हो सकता है लेकिन जब अपने सरोकारों के नाम पर कुंजी पदों पर बहुजन समाज को कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सेदारी देने का राग वे आलापती हैं तो लोगों में कोई जोश पैदा नहीं होता क्योंकि लोग जानते हैं कि यह सौदेबाजी के हथकंडे से अधिक कुछ नहीं है । यहाँ तक कि भाजपा भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देती । जब अनुप्रिया ने यह कह दिया कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के ही कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मजबूत नहीं देखना चाहते तो मामला ज्यादा तीखा होता देख उनके मुक़दमे वापस लेने की कार्रवाई शुरू कर दी गई । हो सकता है कि जल्द जी उनके पति आशीष पटेल को राज्य मंत्रिमंडल में स्थान देने का भी लालीपाप थमा दिया जाये । लेकिन मिशन को कैश कराने तक सीमित करके अनुप्रिया पटेल ने अपना दल की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है जबकि उन्हे एहसास होना चाहिये कि अगर मिशन नहीं बचा तो उनका राजनीतिक वजूद भी मिट जायेगा ।






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