उरई। सरकार की मुनाफाखोर सोच जनजीवन पर भारी पड़ रही है। राजस्व के लिए उसने एनजीटी के दिशा निर्देशों को ताक पर रख दिया है। बेतवा के किनारे के गांवों में सर्दी के मौसम मे ही जल संकट की दस्तक शुरू हो गई जो आने वाले दिनों में भयावह स्थितियों का संकेत है।
भरपूर राजस्व बटोर फूट ली सरकार
ई-टेंडरिंग से भरपूर राजस्व बटोरने के बाद बेतवा में हो रहे मौरम खनन के मामले में राज्य सरकार ने पर्यावरण से जुड़ी तमाम चिंताओं की ओर से मुंह मोड़ लिया है। बेतवा दुर्लभ सदानीरा नदियों में है जिसमें पानी की शुद्धता बनी हुई है। साथ ही प्रहलाद कुंड जैसे तमाम स्पाट हैं जहां नदी गर्मियों के मौसम में भी 30 मीटर तक गहरी बनी रहती है। मशीनों से नदी के बीच से खनन के कारण बेतवा के अस्तित्व पर बन आई है।
इसलिए श्रीमान जी को लोग कहने लगे फेंकू
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूपी विधानसभा के 2017 के चुनाव अभियान में जब उरई में जनसभा करने आये थे, जनमानस की नब्ज को पहचान कर उन्होंने सैटेलाइट से बेतवा के अवैध खनन की निगरानी कराने का भरोसा मंच से दिलाया था। लेकिन वे विरोधियों द्वारा उन पर फेंकू होने के कटाक्ष को स्वयं ही इस मुददे पर प्रमाणित कर रहे हैं।
नियमों में ही खोज डाली भेदी सुरंग
अकेले कालपी तहसील में अढ़ाई सौं से अधिक जेसीबी बेतवा का सीना चीरने में लगी हैं। रास्ता बनाने के लिए एक-दो जेसीबी की परमीशन की आड़ में दर्जनों की संख्या में इन मशीनों को नदी में उतार दिया गया है। नियमों में सेंध का एक नमूना जिले के हमीरपुर बार्डर पर देखने को मिला। चित्रकूट कमिश्नरी के एक अधिकारी ने मौरम माफिया से 20 लाख रुपये की कथित रिश्वत लेकर नदी में पुल बनाने की इजाजत दे दी। जबकि यह इजाजत ठहरे हुए पानी में ही दी जा सकती है। जल धारा को रोककर पुल बनाने का रास्ता साफ करने के लिए इस छूट का सहारा लिया गया। अभी तक कमिश्नरी के उच्चाधिकारियों ने भी इस पर गौर फरमाने की जरूरत नही समझी है।
माफिया राज की इंतहा
इस मामले में माफिया राज की इंतहा है। बिना अनुमति के किसानों को 1 हजार रुपये प्रति ट्रक का लालच देकर खेतों से भी मौरम उठाई जा रही है। इसके लिए खेत से 5 से 6 फीट तक ऊपर की मिटटी हटानी पड़ती है। वन क्षेत्र को भी नही बख्शा जा रहा है। यहां तक की खनिज निदेशक रोशन जैकब ने औचक निरीक्षण में मौके पर इस जंगल राज की झलक देखने के बाद कुछ खनन पटटे निरस्त करके संबंधित कंपनियों को काली सूची में डाल दिया था। लेकिन हैरत की बात यह है कि उनके पीठ फेरते ही वहां फिर खनन शुरू हो गया। जब ग्रामीण भड़के तो मजबूरी में अधिकारियों ने मौके पर जाकर मौरम से भरे ट्रक तो पकड़ लिये लेकिन पटटा धारक के खिलाफ एफआईआर कराने की जिम्मेदारी उन्होंने फिर भी नही निभाई।
अफसरों की गहरी नींद
सैटेलाइट से निगरानी की आशंका से बचने के लिए रात में खनन कराया जाता है जबकि इसकी मनाही है। पूरी रात खनन की हलचल नदी के किनारे के सन्नाटे को चीरती रहती है लेकिन अधिकारियों की नींद नही टूटती।
बेतवा की मौरम से भारी मात्रा में काला धन जमा करने वाले अधिकारियों और नेताओं के खिलाफ न्यायालय के आदेश से सीबीआई द्वारा जांच की जा रही है। इसके बावजूद खनन माफियाओं के मनोबल पर कोई असर इसलिए नही है क्योंकि अधिकारी अभी भी इसके जरिये अकूत रुपये बटोरने के लोभ का संवरण नही कर पाये हैं। दलील यह दी जाती है कि अगर ज्यादा सख्ती करेगें तो मौरम मंहगी हो जायेगी। जिसका खामियाजा जनता को ही भोगना पड़ेगा। खनन क्षेत्र के आसपास के ग्रामीणों ने बताया कि अंधाधंुध खनन के कारण उनके यहां हैंडपंप जबाव देने लगे हैं। सर्दी में यह हाल है तो गर्मी में क्या होगा। यह गांवों के उजड़ने की बारी आने की प्रस्तावना है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पर्यावरण को लेकर स्यापा करने वाली हमारी सरकार की जमीनी हकीकत क्या है यह इसकी एक बानगी कही जा सकती है।






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