उरई । राजमाता सिंधिया के प्रभाव के कारण प्रचंड इंदिरा लहर के वाबजूद जालौन-गरौठा संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के दिग्गज उम्मीदवार चौधरी रामसेवक को जनसंघ के उम्मीदवार से अपनी सीट बचाने के लिए कड़ा मुक़ाबला झेलना पड़ा था ।
राजमाता के मानमर्दन में इंदिरा जी नहीं हो पायीं कामयाब
1971 का यह चुनाव तब हुआ जब बांग्लादेश निर्माण की ऐतिहासिक उपलब्धि के नूर से इंदिरा गांधी चमचमा रहीं थी जिसकी चकाचौंध से विपक्ष भी सुध बुध खो कर उनके अभिनन्दन में जुट पड़ा था नतीजतन अटल जी ने उन्हे दुर्गा का अवतार बता कर उनके महिमा मंडन की पराकाष्ठा कर डाली थी ।
इसके साथ इंदिरा गांधी ने गरीब हटाओ का नारा अमोघ अस्त्र की तरह चुनावी फिजा में उछाल दिया था जिसमें सारा विपक्ष उलझ कर रह गया था । इस चुनाव में इंदिरा गांधी को जितनी तलब निरंकुश बहुमत जुटाने की थी उतना ही वे ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया का दर्प कुचलने के लिए कटिबद्ध थीं \
पूरे देश में भले ही इंदिरा गांधी की अपेक्षा ही के अनुरूप 5 वीं लोकसभा के चुनाव में सफलता मिली लेकिन सिंधिया के मानमर्दन की उनकी हसरत धरी रह गई ।
मध्यभारत में जनसंघ ने फहराया था परचम
1971 के चुनाव में जनसंघ को सारे देश में 23 सीटें मिली जिनमें 11 अकेले मध्यप्रदेश की थी क्योंकि इंदिरा गांधी के पूरा ज़ोर लगाने के वाबजूद विजयाराजे सिंधिया के मध्यभारत साम्राज्य की सारी सीटों पर जनसंघ ने अपना परचम लहरा दिया था ।
जालौन में भी विजयाराजे सिंधिया के असर ने काम किया क्योंकि यह जिला उनका मायका होने के साथ साथ सिंधिया साम्राज्य से सटा इलाक़ा था ।
जनसंघ ने बगावत भी झेली
1971 में कांग्रेस के चौधरी रामसेवक तीसरी बार इस क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए । उनके निकटतम प्रतिद्वंदी जनसंघ के उम्मीदवार कुंजीलाल रहे । रामसेवक को 147731 मत मिले जबकि कुंजीलाल ने भी 121843 मत हासिल कर लिए थे ।
ध्यान रहे कि इस चुनाव में जनसंघ के ही एक नेता फुंदीलाल जो 1967 में पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी रहे थे , बगावत करके कुंजीलाल को नुकसान पहुँचाने के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में आ गए थे । उनके द्वारा माहौल खराब किए जाने के बाद भी जनसंघ ने जो प्रदर्शन किया उसे शानदार कहा जा सकता है ।





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