उरई। भारतीय जनता पार्टी हाईकमान जालौन-गरौठा-भोगिनीपुर संसदीय सीट पर सांसद भानु प्रताप वर्मा की उम्मीदवारी के प्रश्न पर गहराते असमंजस से उबर नही पा रहा है। एक ओर शीर्ष नेताओं का एक वर्ग उनके नाम की जबर्दस्त पैरोकारी कर रहा है। दूसरी ओर हाईकमान 1999 और 2009 के चुनावों के इतिहास को दोहराये जाने की आशंका अपने मन से नही निकाल पा रहा है। भाजपा हाईकमान के असमंजस के कारण इस सीट पर पार्टी टिकट के लिए दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है।
कोंच के वार्ड नंबर 16 के सदस्य के रूप में सार्वजनिक जीवन की शुरूआत करने वाले भानुप्रताप वर्मा एक बार विधायक और चार बार लोकसभा सदस्य चुने जा चुके हैं। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने राजनीति के मजबूत खिलाड़ी की छवि अभी तक नही बना पाई है।
जब तक भानु वर्मा के गाड फादर पूर्व मंत्री बाबूराम एमकाम जीवित थे तब तक उनकी सरपरस्ती से भानु वर्मा की बहुत मुश्किलें दूर हो जाती थीं। हालांकि लोग उस समय उनका मूल्यांकन दादा के मिटटी के माधौ के बतौर करने से नही हिचकते थे। दादा का साया न रह जाने के बाद भानु वर्मा निहत्थे हो गये। साथ ही निष्क्रियता और लोगों के प्रति बेरुखी का उनका रवैया और ज्यादा बढ़ गया। माना यह जा रहा है कि इस बार लोग पहले के किसी भी दौर की तुलना में उनके रवैये को लेकर पानी सिर से बहुत ऊपर मान रहे हैं। भाजपा हाईकमान तक भी इसकी खबरें हैं।
इसी रवैये की वजह से केंद्र में और प्रदेश में सरकार होते हुए भी 1999 में भाजपा यहां बसपा के मुकाबले चुनाव हार गई थी। पैदल होने के बाद भानु ने लगातार लोगों से आरजू मिन्नतें की तो लोगों ने पसीज कर 2004 में एक मौका उन्हें फिर दे दिया। लेकिन सांसद बनते ही फिर उनका रवैया ज्यों का त्यों हो गया। नतीजतन 2009 के चुनाव में न केवल इस संसदीय क्षेत्र में भाजपा को पराजय का मुंह देखना पड़ा बल्कि तीसरे नंबर पर पहुंच जाने पर उसकी भारी किरकिरी हुई। ध्यान रहे कि 2009 में जहां सपा के विजयी प्रत्याशी घनश्याम अनुरागी को 2 लाख 82 हजार 816 मत मिले थे और बसपा के तिलकचंद अहिरवार ने 2 लाख 71 हजार 610 वोट बटोर लिये थे वहीं भानु प्रताप वर्मा की स्थिति मात्र 1 लाख 31 हजार 259 मत मिलने से बेहद शर्मनाक हो गई थी।
इसीलिए 2014 के चुनाव में पार्टी ने उम्मीदवारी बदलने का मन बनाकर रामनाथ कोविंद जी को यहां भेज दिया था। हालांकि परिस्थितियां ऐसी बनी जिससे कोविंद जी वापस बुला लिये गये और भानु प्रताप वर्मा को मर्सी के तौर पर एक और मौका दे दिया गया। 2014 में भानु वर्मा आधे गांवों में भी जनसंपर्क नही कर पाये थे लेकिन मोदी के नाम पर जबर्दस्त वोटिंग के चलते उन्हें भारी कामयाबी नसीब हो गई थी।
लोगों का कहना है कि भानु वर्मा इस कामयाबी को सहेज कर नही रख पाये। उल्टे उन्हें इस बार कुछ ज्यादा ही मद हो गया। इसलिए लोगों से उनकी दूरी बहुत हो गई। हालत यह है कि उनके प्रति लोगों में 1999 और 2009 से कहीं बहुत अधिक वितृष्णा है।
फिर भी शीर्ष स्तर पर उनके लिए पैरोकारी करने वाले कम नही हैं। वजह बड़े नेताओं को उनके संसदीय क्षेत्र की जमीनी जानकारी न होना और सुनियोजित ढंग से प्रचारित उनकी साफ-सुथरी छवि का असर है। इसके साथ-साथ भाजपा हाईकमान की दुविधा इसलिए और ज्यादा बढ़ जा रही है कि उनके विकल्प में कोई सटीक नाम सूझ नही पा रहा है। विधायक जिन नामों की सिफारिश कर रहे हैं उनमें तो और ज्यादा खतरा है। क्योंकि इस संसदीय क्षेत्र के विधायकों और सांसद की तुलना का सवाल आता है तो लोग यह कहने को मजबूर हो जाते हैं कि छोटे मियां तो छोटे मियां, बड़े मियां और सुभानअल्ला। धारणा यह है कि चुनाव में विधायकों का चेहरा देखकर तो जो वोट पार्टी को मिल भी रहे होगें वे भी खत्म हो जायेगें।
ऐसे में यह चर्चाएं भी शुरू हो गई है कि भाजपा हाईकमान निर्विवाद उम्मीदवारी के लिए शिखर स्तर से कोई चेहरा चुन सकती है। किसी सर्वोच्च पदाधिकारी के परिवारीजन का नाम भी इस सिलसिले में चर्चाओं में आने लगा है।






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