इप्टा के नाटकों में लोक संस्कृति के दर्शन होते हैं-मायादेवी,* बोले डॉ. कौशलेन्द्र, कला को इबादत की तरह लें रंगकर्मी

 

कोंच। लोक कला और लोक संस्कृति को सहेज कर ही हम भविष्य के सांस्कृतिक इतिहास को स्वर्णिम बना सकते हैं। इप्टा के नाटकों में न केवल सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया जाता है, बल्कि लोक संस्कृति के भी दर्शन होते है। लोक को बचाकर ही देश को बचाया जा सकता है। आज की युवा व किशोर पीढी पाश्चात्य संस्कृति के वशीभूत हो अपनी लोक परंपराओं व लोकाचारों को भूल रही है, उसको सहेजने की आवश्यकता है। इप्टा इस दिशा में प्रशंसनीय कार्य कर रही है। उक्त विचार सूरज ज्ञान महाविद्यालय कोंच की संरक्षक मायादेवी यादव ने व्यक्त किये।

अमरचंद्र महेश्वरी इंटर कॉलेज में जारी इप्टा की नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला में पहुंचे प्रमुख समाजसेवी चिकित्सक डॉ. कौशलेन्द्र शुक्ल ने कहा कि इप्टा के प्रयासों का फल है कि नगर में विभिन्न विधाओं की कार्यशालाओं का आयोजन हो रहा है। आज नगर में सांस्कृतिक माहौल विकसित हुआ है, उसके लिए इप्टा कोंच के संस्थापकों की दो दशकों की तपस्या है। हम किसी भी मंच पर अभिनय करें, हमारा ध्येय होना चाहिए कि कला को इबादत की तरह लें। सूरज ज्ञान महाविद्यालय कोंच के प्रबंधक अंकुर यादव, सेठ बद्रीप्रसाद महाविद्यालय कोंच के प्रबंधक आशुतोष हूंका, डॉ. दीपक सोनी ने कहा कि ललित कलाओं के माध्यम से हमारे नैतिक गुणों का विकास होता है। हमारे नीति निर्माताओं को चाहिए कि पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा व रंगमंच को अनिवार्य रुप से सम्मिलित किया जाये। इप्टा कोंच के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद नईम, संरक्षक अनिल कुमार वैद एडवोकेट ने इप्टा के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कोंच इप्टा की गतिविधियों से अतिथियों को परिचित कराया। इस अवसर पर केके सोनी, राहुल कश्यप ने भी विचार व्यक्त किए। ने नाटक जमीन, लाला हरदौल, जब रोशनी होती है, के मंचन के माध्यम से अतिथियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का संचालन अमन अग्रवाल ने, स्वागत पारसमणि अग्रवाल ने व आभार ट्रिंकल राठौर ने व्यक्त किया।

 

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