(इस ब्लाग के लेखक जाने माने विद्वान और बाबा साहब केन्द्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ में राजनीति विज्ञान विभाग के आचार्य डा0 प्रोफेसर रिपुसूदन सिंह हैं)
एक अभूतपूर्व, अकल्पनीय वैश्विक संकट मे पृथ्वी पर असहाय शांति, मौन हलचल और अव्यक्त अवसाद पसरा है। विकास, समृद्धि और वैश्विक योजनायें रुक गयी हैं। कोरोना वायरस ने 17वीं और 18वीं सदी के बाद उत्पन्न ज्ञान-विज्ञान और तकनीक पर आधारित आधुनिक सभ्यता को ही चुनौती दे डाली है। ऐसे हालात मे कुछ लोग धर्म धारण करने को कह रहे हंै। वैसे विगत दो दशकों में धर्म स्वयं एक वैश्विक संकट बन दुनिया के अनेक देशो मे हिंसा और उन्माद बन व्यक्त हुआ। पश्चिम एशिया मे तो समानधर्मी राज्य ही एक दूसरे की जान के पीछे पड़ गए हंै। यूरोप की छाती अभी भी मध्ययुगीन धार्मिक हिंसा से रक्तरंजित है। धर्म आज एक कॉमन मुद्दा बन कर उभरा है। इस वैश्विक संकट मे अब धर्म के विषय को दकियानूसी, अवैज्ञानिक, और कालग्रस्त मानकर नहीं टाला जा सकता और न ही इसको आदिम, मध्ययुगीन और सामन्ती मूल्य मात्र मानकर। धर्म से वैश्विक स्तर पर आम आदमी जुड़ा है। सदियो से जो उसे बताया गया है वही वह धर्म के नाम पर कर रहा है। उसे समझने के लिए न तो वह तैयार है और न ही ऐसा कोई प्रयास ही किया गया है। धर्म को पवित्र पुस्तको, शास्त्रों और धार्मिक गुरुओं की व्याख्या तक सीमित कर दिया गया है। इस संकट की स्थिति मंे धर्म पर एक समझ बनानी होगी। इस सदी की यह एक वैश्विक मांग है जिसमें एक सक्रिय वैश्विक भागीदारी की जरूरत है। यदि धर्म पर एक वैश्विक जन विमर्श किया जाये तो इसका प्रयोग मानवीय कल्याण के लिए किया जा सकता है। इंसानी सभ्यता को भी सुरक्षित-संरक्षित किया जा सकता है।
सचमुच जो धर्म है, नहीं जा सकता बांधा
धर्म प्रकृति के अनुकूल एक गैरपाशविक अहिंसापूर्ण भावमय आचरण है। इसके पालन हेतु किसी प्रकार के कर्मकांड और स्वांग की जरूरत नहीं है। यह ओढ़ने की नहीं बल्कि स्वतः ग्रहण का अद्भुत संकल्प है। इसे किसी लाचारी या बल प्रयोग के चलते न तो स्वीकार किया जा सकता और न ही छोड़ा ही जा सकता है। धर्म से संस्कृति और सभ्यता का जन्म होता है। पर इसे किसी एक संस्कृति, सभ्यता, परंपरा, विश्वास, राज्य-राष्ट्र की सीमा तक नहीं बांधा जा सकता। पृथ्वी के पार भी फैला है। यह शाश्वत है, विस्तृत है, परिवर्तनशील है और नित नवीन बना रहता है।
मनुष्य धर्म का आविष्कारक, पशु अनुशीलन कर्ता मात्र
चैकाने वाली बात यह है कि धर्म को मानव जाति के अलावा कोई अन्य धारण भी नहीं कर सकता। पशु और वनस्पति जगत प्रतिपल प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करते है। वे धर्म के बिना रह ही नहीं सकते। उन्हें अलग से धर्म की कोई जरूरत भी नहीं। धर्म की जरूरत मानव जाति को ही है। आज का मनुष्य उसी प्रकृति प्रदत्त प्राणी का विस्तार है जो बहुत लंबे समय तक पशु ही था। उसने अपनी पशुता और पाशविकता छोड़ी। पर पशु जगत अपनी पाशविकता आज तक न छोड़ पाया क्योकि वह प्रकृति से आबद्ध है, उससे संचालित और निर्देशित होता। प्रकृति प्रदत्त सीमित विवेक के चलते पशु और वनस्पति जगत अपने जीवन और अस्तित्व के लिए प्रकृति पर पूर्णतः निर्भर है। वे विवेक से नहीं बल्कि नैचुरल इंस्टिक्ट (नैसर्गिक प्रवृत्तियों) से संचालित होते हंै। यही कारण है कि आज तक पशु जगत ने अपनी कोई अपनी सत्ता, संस्कृति और सभ्यता का निर्माण नहीं किया। वह आज भी प्रकृति पर ही आश्रित है और आधुनिक सभ्यता की विभिन्न समस्याओं से मुक्त है।
प्रकृति ने मनुष्य को क्यों दिया विवेक का उपहार
दूसरी ओर प्रकृति ने स्वरूप मनुष्य को विवेक दिया। पर उसने मानव जाति को अकारण ही विवेक नही दिया, बल्कि इसलिए दिया कि आदम प्राणी इस ब्रह्मांड में सबसे कमजोर था और वह बिना बुद्धि विवेक के जी न पाता। अपने होमो सेपियन (चिंतन स्वभाव) के चलते और लंबे जद्दोजहद के बाद इंसान का जन्म हुआ। मनुष्य का जीवन प्रकृति के समीप था, उसी की उपज था और उसके साथ कदमताल करके वह अपना जीवन जीता था। प्रकृति के संसर्ग में आ मनुष्य ने कालांतर में अपनी बोली और भाषा विकसित की और अपने को साहित्य और संस्कृति के जरिये अभिव्यक्त करने लगा जिससे समाज, संस्कृति और सभ्यता का जन्म हुआ। विवेक के प्रयोग से मनुष्य अपनी पाशविक प्रवृत्तियों को रोकने मे सफल हो गया। पर इंसान बनने के बावजूद भी उसके अंदर की पाशविक प्रवृत्ति बनी रही। कालांतर मे वह बल प्रयोग करने लगा, हिंसक, स्वार्थी, भोगी, लालची, मदग्रस्त, वासनाग्रस्त कामुक हो गया। कभी कभी उसमंे और पशु में कोई अंतर न रह जाता। वह अपने स्वार्थ के लिए ही अपने लोगो के साथ छल और बेईमानी करने लगा, उनको ही मारने लगा, हमले और युद्ध करने लगा। व्यभिचार, विलासिता और लालच मे पड़ वह प्रकृति के साथ भी छेड़छाड़ करने लगा और उसमे रह रहे पशु जगत को भी मारने लगा, उनकी बलि चढ़ाने लगा। ऐसी ही अराजक स्थिति मे मनुष्य को धर्म की जरूरत पड़ी। अब मानव जाति उसके बिना नही बच सकता था। पशु जगत की पशुता उस पर पूर्ण हावी हो गई। उसके अस्तित्व को बचाना बहुत जरूरी हो गया।
मनुष्य सीधे समझ लेता तो न आते अवतार
इन पाशविक प्रवृत्तियों के उभार से मानव जाति को बचाने के लिए समाज के बीच से समय समय पर अनेक श्रेष्ठ लोग निकले जिन्होंने धर्म का मार्ग बताया। सभी अपने अपने ढंग से अपने अपने धर्म की बात करने लगे और उस धर्म के धारण हेतु अपने अपने पंथ, सम्प्रदाय, रिलीजन, और मजहब की संस्तुति भी की। हिन्दू, इस्लाम, इसाई, सिख, बौद्ध, जैन पंथ के रूप मे उभरे जिसमंे अपने अपने रास्ते से धर्म धारण की वकालत की गयी। यदि मनुष्य धर्म को स्वतः और सीधे समझ पाता तो उसे स्वतः धारण कर लेता और फिर उसे किसी रिलीजन, पंथ, मजहब इत्यादि की जरूरत ही नहीं होती। धर्म के नित नए बने रहने के स्वभाव के चलते इसे किसी पंथ, संप्रदाय और फेथ मात्र मे नहीं बांधा जा सकता। उसे किसी भी ढोंग, टोटके, प्रेयर और इबादत की भी जरूरत नहीं। आज के हालात मे हमे एक ऐसे ही वैश्विक धर्म की जरूरत है जो इंसान के लिए धर्म धारण करने में सहायक हो। धर्म धारण होगा तो विश्व मे युद्ध रुकेगा, पर्यावरण संरक्षित होगा, करुणा, सेवा, भाई चारा, न्याय और समानता का भाव जन्म लेगा। युद्ध के सामान की जगह जीवन से संबंधित वस्तुयें बनेगी और इससे पंथो द्वारा तैयार किये गए विश्वासों और पूर्वाग्रहों को भी ठीक से समझने मे सहायता मिलेगी।
तब धरा पर ही निर्मित होगा स्वर्ग
वैश्विक धर्म मनुष्य को स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, मुक्ति, फाइनल जजमेंट के काल्पनिक आश्वासन और मोह से मुक्त कर सकता है और इसी धरा पर स्वर्ग निर्मित करने मे अपना बड़ा योगदान दे सकता है। इस वैश्विक अशांति, अवसाद, और मंदी में एक वैश्विक धर्म की जरूरत हो रही है। मानो धर्म स्वतः पुकार रहा है। धर्म की विशद और सारगर्भित व्याख्या भारतीय मनीषियों ने बहुत ही स्पष्ट तौर पर की है। वेद, पुराण, उपनिषद, स्मृतियाँ, रामायण, महाभारत, त्रिपिटक, अगम सूत्र इत्यादि इससे संदर्भित है। यह आदर्श परंपरा मे ब्राह्मण-न्याय, वैशेषिका, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांता और भौतिक परंपरा मे जैन, आजीविका, अजनना और चार्वाक मंे विभाजित है। इसे नाग-नाथ परंपरा, भक्ति के सगुण और निर्गुण मे भी देखा जा सकता है।
अब्राहमिक दर्शन से तुलना करके भारतीय धर्म को जानिए
भारतीय दर्शन इसकी तुलना मध्य एशिया के इस्राइल मे उत्पन्न अब्राहमिक दर्शन से करके बेहतर रूप से समझा जा सकता है। उससे उत्पन्न यहूदी, इसाई और इस्लाम ऐसे ही तीन पंथ थे जिन्हांेने रिलीजन का प्रतिपादन किया। अब्राहमिक दर्शन परंपरा मे फेथ (आस्था) की प्रमुख भूमिका है, वही पर भारत के दर्शन में धर्म की केंद्रीय भूमिका है। प्रकृति के अनुकूल आचरण धर्म है, पाशविक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण धर्म है, प्रकृति मे व्याप्त नित होते परिवर्तन को स्वीकार करना ही धर्म है, न्याय और समानता की स्थापना धर्म है, उसमे उपस्थित विविधता और सौंदर्य, करुणा, दया, परोपकार और सहयोग को अपनाना ही धर्म है। प्रकृति मे विद्यमान सूरज, चाद, ग्रह नक्षत्र में विश्वास करना ही धर्म है। धर्म सर्वत्र है, सर्व उपलब्ध है, सर्वशक्तिमान है। यह मार्गद्रष्टा और मुक्ति गामी है। यह धर्म मात्र फेथ (आस्था) और इन्स्ट्यूशन (अंतःप्रेणना ) मात्र नहीं है। इसमे दर्शन है, चिंतन है, संस्कृति है। यह सत्य को समग्रता मे देखता है और उसके पार भी देखता और जाता है।
धर्म पर क्यों नहीं हो सकती वैश्विक सहमति
आम आदमी उसी को धर्म मानता है जिसे उसके पंथ की किताबें, प्रतिनिधि और उसमे व्याप्त परम्पराएं बताती है। वह फेथ और आस्था, अवतार-ईशपुत्र-नबी को ही धर्म मान बैठता है। धर्म के नाम पर वह देश बनाने लगता, सरकारें बनाता-उखाड़ता और इंसान को एक आदर्श सांचे मे तब्दील कर देता है। वह इंसान को इंसान नहीं रहने देता। वह धर्म को विचारधारा मंे बदल देता और उसे नस्ल और राष्ट्रवाद के पहिये से बांध देता। उसका प्रयोग कर राजसत्ता हथियाने, बाजार निर्मित करने, युद्ध और तबाही मचाने के लिए करता है। आज इस पर चर्चा करनी ही होगी कि क्या यही धर्म है? क्या यही धर्म का लक्ष्य है? आज धर्म पर एक वैश्विक राय बनानी होगी। इस चर्चा से चाहे किसी की सरकार क्यो न हिले, व्यापार क्यो न रुक जाये और किसी की सत्ता या किसी का वर्चस्व क्यो न कमजोर पड़ जाये? इसे फेथ की पवित्रता मानकर नहीं छोड़ सकते। प्रश्न यह है कि धर्म पर एक वैश्विक राय और सहमति क्यो नहीं बन सकती है?
यूएनओ पर इस पहल का भी कार्यभार हो
भूमंडलीकरण के दौर मे यह जरूरी भी है। इसको समझ कर ही एक सर्वस्वीकृत वैश्विक धर्म का निर्माण किया जा सकता है। यदि धर्म मुक्तिकामना है, विस्तृत, वैश्विक, प्रगतिशील, परिवर्तनवादी और समावेशी है तो यह सभी के लिए जरूरी है। यह जीवन केन्द्रित है, मृत्यु केन्द्रित नहीं। यह सकारात्मक है, नकारात्मक नहीं। यदि इससे संपन्नता मिलती, स्वास्थ मिलता, इसी पृथ्वी पर ईश्वर मिलता तो इसे सभी को क्यो न दिया जाये? यदि धर्म प्रत्येक अच्छे मूल्यों यथा करुणा, दया, सहयोग, स्वास्थ, ज्ञान, विवेक, लोककल्याण का धारण मात्र है तो इसे सभी को यथा जनप्रतिनिधि, राज्य संचालक, व्यापारी, धर्म गुरु, चिंतक सभी को धरण करना होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ को इस मुद्दे को उठाना ही होगा जिससे इसका प्रयोग मानव कल्याण और परिवर्तन के लिए किया जा सके। जिस तरह यूएनओ ने पर्यावरण, आतंकवाद, नाभिकीय हाथियोरों को लेकर वैश्विक पहल की है उसे एक वैश्विक धर्म के लिए भी कदम उठाना होगा जिससे धर्म को मनुष्य केंद्रित, प्रकृति केंद्रित, कल्याण और करुणा केंद्रित बनाया जा सके। भूले भटके वायरस को भी इस प्रकृति मे अपनी जगह मिल जायेगी और हम सभी इस संकट से भी मुक्त हो जाएगे।

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