बाराबंकी |  पिछले लगभग पाँच माह से कोरोना संक्रमण के कारण  सब के जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आ गया है। बड़ी संख्या में प्रवासी कामगार विभिन्न प्रदेशों से जनपद बाराबंकी में भी आए हैं। इनमें से बहुत से कुशल (Skilled) और अधिकांश अर्द्धकुशल या अकुशल हैं। उप्र शासन के राहत विभाग की अगुवाई में विभिन्न विभाग ऐसे लोगों के लिए रोजगार की व्यवस्था कर रहे हैं।
जनपद बाराबंकी में लगभग पैंतालीस से पचास हजार ऐसे लोग बाहर से आए हुए हैं। यह भी देखा गया है कि ऐसे लोगों की वापसी के बाद घर के बँटवारे व कृषि भूमि पर हकदारी के अतिरिक्त छोटे-छोटे पारिवारिक विवाद भी बढ़े हैं। बाहर से आए हुए नवयुवक रोजगार के अभाव में अपनी अनावश्यक भौतिक आवश्यकताओं के चलते अपराध की ओर उन्मुख न हो जाएँ, इस निगरानी की भी आवश्यकता महसूस की गई है। पुलिस अधीक्षक डॉ अरविन्द चतुर्वेदी ने बताया कि इसके मद्देनजर उन्होंने विचार किया कि  बाहर से आए हुए लोगों को बीट व्यवस्था से जोड़ा जाए और ऐसा आपसी संवाद स्थापित किया जाए  जिससे इनकी समस्याओं का प्राथमिकता पर समाधान हो सके तथा उन्हें इस बात का भी एहसास हो जाए कि उन पर पुलिस की निगरानी है। यह भी विचार आया कि हमारे पास उपलब्ध डायल 112 संजाल (Network) को भी इनसे जोड़ा जाये जिससे सेवाओं का आदान-प्रदान और प्रभावी हो सके।
    उनका कहना है कि  आमतौर पर जिले के एसपी या अन्य राजपत्रित अधिकारी जन सुनवाई के दौरान या किसी का फोन आने पर सम्बन्धित इंस्पेक्टर को कॉल करते हैं। शिकायत चाहे नाली विवाद की हो या सहन के बँटवारे की या मेड़ काटने की या बच्चों के आपस में लड़ाई हो जाने की या छेड़खानी की या मुकदमा लिखवाने के बाद प्रतिपक्षियों द्वारा धमकी दिए जाने की या किसी अपराधी द्वारा उगाही करने जैसी गंभीर शिकायतें हों, अधिकारियों के 90% कॉल प्रभारी निरीक्षक के पास ही पहुँचते हैं। वह छोटी-छोटी शिकायतों से लेकर गंभीर शिकायतों से अपने आप को बुरी तरह ओवरलोडेड महसूस करता है। यद्यपि वह उन्हें बीट उपनिरीक्षक या बीट आरक्षी को प्रकरण की गंभीरता के आधार पर बाँटता है। लेकिन उनके अधीनस्थ कर्मी सीधी जवाबदेही (Accountability) महसूस नहीं करते हैं।
वे  इसके लिए भी एक समाधान खोज रहे थे  जिससे यह उत्तरदायित्व निर्धारित किया जा सके। इस संबंध में उन्होंने  ADG डायल 112 असीम अरुण से वार्ता की तो  उन्होंने उत्साहित किया।
     उन्होंने  जनपद के समस्त थानों के हल्कों, उनमें पड़ने वाले गाँवों, मजरों, बीट उपनिरीक्षक एवं बीट आरक्षी के नाम , मोबाइल नम्बर, पी.आर.वी. का नंबर सहित रूट चार्ट, प्रवासी कामगारों का सम्पूर्ण विवरण एकत्र कर *’सहयोग’* नाम का एक ऐप विकसित कराया है। जब कोई आवेदक जन सुनवाई के दौरान या मोबाइल पर अपने गाँव तथा थाने का नाम बता कर समस्या बताता है तो *‘सहयोग ऐप’* के सर्च मेन्यू से उसके बीट उपनिरीक्षक व बीट आरक्षी का नाम व मोबाइल नंबर डिस्प्ले हो जाता है तथा उनके नाम के सामने बने डायलर से सीधे उनसे बात की जा सकती है। उन्हें एस.एम.एस. या व्हाट्सएप के जरिए भी प्रकरण भेजे जा सकते हैं। *’सहयोग ऐप’* के डेटाबेस में उपलब्ध प्रवासी कामगारों के निवास स्थान के आधार पर बीट उपनिरीक्षक, बीट आरक्षी व पी.आर.वी. का संपर्क विवरण स्वतः उनके पास चला जाएगा। इसी प्रकार उक्त पुलिस इकाइयों के पास उनके क्षेत्र में निवास करने वाले प्रवासी कामगारों की डिटेल्स भी चले जायेंगें।
     समय-समय पर कोविड-19 के सम्बन्ध में जागरूकता संदेश, बढ़ते हुए ऑनलाइन साइबर फ्रॉड से बचने के तरीके, यातायात नियमों एवं अन्य आवश्यक जानकारियाँ भी एस.एम.एस. या व्हाट्सएप के माध्यम से भेजी जायेंगी। इस उभयपक्षी संवाद से जनता का डायल 112 सेवाओं और बीट पुलिसिंग के प्रति विश्वास बढ़ेगा। रिपोर्ट जनरेशन के आधार पर एक महत्वपूर्ण डेटा भी तैयार होगा जिसकी एनालिटिक्स से बेहतर पुलिसिंग की कार्ययोजना तैयार की जा सकेगी।

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